ग़रीब सवर्णों को आरक्षण: इस लॉलीपॉप से भी मोदी सरकार का भला नहीं होगा

ताज़ा विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी को लेकर सवर्ण हिन्दुओं में ये धारणा फैलने लगी कि मोदी सरकार के जाने का वक़्त आ गया और इसने न तो राम मन्दिर को लेकर अपना वादा निभाया और ना ही आरक्षण को लेकर। सवर्णों के ऐसे आक्रोश को देखते हुए ही बीजेपी के पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी है। पार्टी को इसका भरपूर आभास भी हो रहा है। इसीलिए ‘ग़रीब सवर्णों को आरक्षण’ के ज़रिये मोदी सरकार ने तुरुप का पत्ता फेंका है! सरकार ने अब भागते भूत की लंगोटी के रूप में सवर्ण आरक्षण के लॉलीपॉप को आज़माने की जुगत निकाली है।

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गाय की आत्मकथा: जानवर से पशु, आस्था और साम्प्रदायिक पाखंड बनने का सफ़र

ज्यों-ज्यों उम्र हम पर हावी होने लगती है, त्यों-त्यों हमारा जीवन नरक हो जाता है। पेट भरने के लिए हमें सड़कों पर भटकता पड़ता है। आते-जाते वाहन और इंसान सभी हमें दुत्कारते रहते हैं। सड़क पर दिखने वाली हरेक गाय कहने को पालतू है, लेकिन उसके पालनहार उसके साथ कितनी क्रूरता से पेश आते हैं, ये ज़रा कोई हमसे पूछे। साफ़-सुथरा चारा खाने वाले, कैसे कूड़े-कचरों में मुँह मारकर पॉलीथीन की थैलियों समेत सड़े-गले को खाकर अपना पेट पालते हैं, क्या इंसान इसे कभी समझ पाएगा? गायों का बुढ़ापा जितना कष्टकारी जीवन शायद ही किसी और प्राणी का होता हो।

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ग़रीब सवर्णों को आरक्षण: इस लॉलीपॉप से भी मोदी सरकार का भला नहीं होगा

ताज़ा विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी को लेकर सवर्ण हिन्दुओं में ये धारणा फैलने लगी कि मोदी सरकार के जाने का वक़्त आ गया और इसने न तो राम मन्दिर को लेकर अपना वादा निभाया और ना ही आरक्षण को लेकर। सवर्णों के ऐसे आक्रोश को देखते हुए ही बीजेपी के पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी है। पार्टी को इसका भरपूर आभास भी हो रहा है। इसीलिए ‘ग़रीब सवर्णों को आरक्षण’ के ज़रिये मोदी सरकार ने तुरुप का पत्ता फेंका है! सरकार ने अब भागते भूत की लंगोटी के रूप में सवर्ण आरक्षण के लॉलीपॉप को आज़माने की जुगत निकाली है।

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सरासर झूठ है कि ‘नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को हुआ 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा’

‘ख़बर’ लिखने वाले रिपोर्टर और उसे सम्पादित तथा प्रकाशित करने वाले सम्पादक ने ख़बर में इस बात का कोई ब्यौरा नहीं दिया कि आख़िर ये तय कैसे हुआ कि नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा हुआ है? मज़े की बात ये भी है कि भक्ति-भाव में डूबे तमाम मीडिया संस्थानों ने आव देखा न ताव और झूठ को फैलाने की भेड़-चाल में शामिल में गये! दर्जनों वेबसाइट्स ने इस ‘भ्रामक और झूठी ख़बर’ को कॉपी-पेस्ट करके अफ़वाह को फैलाने में अपना योगदान देना शुरू कर दिया! पढ़िए पूरा विश्लेषण....

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