अब भारत से EVM का अलविदा होना ज़रूरी है!

EVM के पक्ष में दलील भी थी कि इससे मतपत्र वाले काग़ज़ों की भारी बचत होती है। लेकिन अब साफ़ दिख रहा है कि ये बचत भारतीय लोकतंत्र के लिए काफ़ी भारी पड़ी है।

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जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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जनाब झूठली साहब और नोटबन्दी का पंचनामा!

ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

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राम मन्दिर: अब संघ की साज़िश सुप्रीम कोर्ट को डराकर जनता को उल्लू बनाने की है!

संघ को पता है कि विकास लापता है। अर्थव्यवस्था बेहद ख़राब दौर में है। बैंक तबाह हैं। उद्योग-कारोबार बदहाल हैं। रोज़गार के अवसर नदारद हैं। किसान बेहाल हैं। बचायी गयी बेटियाँ अपने नसीब को कोस रही हैं। सीबीआई अपने पतन से शर्मिन्दा है। राफ़ेल घोटाले की वजह से मोदी सरकार के लिए दलदल बनकर तैयार हो चुका है। अब सम्भलने का वक़्त भी नहीं बचा। लिहाज़, राम मन्दिर को आख़िरी हथियार के रूप में आज़माने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है।

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गाय की आत्मकथा: जानवर से पशु, आस्था और साम्प्रदायिक पाखंड बनने का सफ़र

ज्यों-ज्यों उम्र हम पर हावी होने लगती है, त्यों-त्यों हमारा जीवन नरक हो जाता है। पेट भरने के लिए हमें सड़कों पर भटकता पड़ता है। आते-जाते वाहन और इंसान सभी हमें दुत्कारते रहते हैं। सड़क पर दिखने वाली हरेक गाय कहने को पालतू है, लेकिन उसके पालनहार उसके साथ कितनी क्रूरता से पेश आते हैं, ये ज़रा कोई हमसे पूछे। साफ़-सुथरा चारा खाने वाले, कैसे कूड़े-कचरों में मुँह मारकर पॉलीथीन की थैलियों समेत सड़े-गले को खाकर अपना पेट पालते हैं, क्या इंसान इसे कभी समझ पाएगा? गायों का बुढ़ापा जितना कष्टकारी जीवन शायद ही किसी और प्राणी का होता हो।

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अब भारत से EVM का अलविदा होना ज़रूरी है!

EVM के पक्ष में दलील भी थी कि इससे मतपत्र वाले काग़ज़ों की भारी बचत होती है। लेकिन अब साफ़ दिख रहा है कि ये बचत भारतीय लोकतंत्र के लिए काफ़ी भारी पड़ी है।

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सरासर झूठ है कि ‘नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को हुआ 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा’

‘ख़बर’ लिखने वाले रिपोर्टर और उसे सम्पादित तथा प्रकाशित करने वाले सम्पादक ने ख़बर में इस बात का कोई ब्यौरा नहीं दिया कि आख़िर ये तय कैसे हुआ कि नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा हुआ है? मज़े की बात ये भी है कि भक्ति-भाव में डूबे तमाम मीडिया संस्थानों ने आव देखा न ताव और झूठ को फैलाने की भेड़-चाल में शामिल में गये! दर्जनों वेबसाइट्स ने इस ‘भ्रामक और झूठी ख़बर’ को कॉपी-पेस्ट करके अफ़वाह को फैलाने में अपना योगदान देना शुरू कर दिया! पढ़िए पूरा विश्लेषण....

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