फाँसी पर टाँगने का रिकॉर्ड बनाने का सुनहरा मौक़ा Naved Kasab
ज़रा सोचिए कि ऊधमपुर
में ज़िन्दा पकड़े गये पाकिस्तानी आतंकी नावेद उर्फ क़ासिम से भारत सरकार क्या-क्या
सबक़ ले सकती है? क्योंकि ये तो तय है कि
क़ानूनी प्रक्रिया को पूरी करके उसे सूली पर ही लटकाना होगा। उसका ग़ुनाह ही ऐसा
है। याद रखें तो दो तरह का सबक़ हमें अज़मल कसाब से ज़रूर मिला है। पहला, हमें
अबकी बार नावेद को लेकर पाकिस्तान के साथ कैसे पेश आना चाहिए? दूसरा, अज़मल कसाब के ज़िन्दा पकड़े जाने की वजह से भारत सरकार पर जो
वित्तीय बोझ पड़ा था, उसे इस बार कैसे कम से कम रखा जाए? दोनों
सबक़ों पर ग़ौर करने का सबसे माकूल वक़्त यही है।
कसाब 26 नवम्बर 2008
को मुम्बई के विक्टोरिया टर्मिनस पर ज़िन्दा पकड़ा गया था। क़ानूनी प्रक्रिया को
पूरा करके उसे  21 नवम्बर 2012 को फाँसी दी
गयी थी। यानी उस गुनहगार को सज़ा देने में हमें चार साल लगे। अपराध करने से लेकर
सज़ा मिलने तक की अवधि के लिहाज़ से महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथू राम गोडसे का
मामला आज भी एक रिकॉर्ड है, क्योंकि सारी क़ानूनी प्रक्रिया पूरी करके उसे साढ़े
दस महीने बाद सूली पर लटका दिया गया था। इस लिहाज़ से अज़मल कसाब का मुक़दमा शायद
दूसरा सबसे कम वक़्त में ख़त्म होने वाला मामला है। भारत सरकार के पास सुनहरा
मौक़ा है कि वो इस बार गोडसे वाले रिकॉर्ड को तोड़कर दिखाये!
भारत सरकार को चाहिए
कि वो नावेद के मामले में पाकिस्तान से ये क़बूल करवाने में अपना धन-श्रम बर्बाद
करने से बचे कि नावेद उसी का नागरिक है, आतंकवादी है, घुसपैठिया है, उसने भारत पर
हमला किया है और वो उसी ‘पाकिस्तानी आतंकी
विश्वविद्यालय’ से प्रशिक्षित है, जहाँ कसाब ने ‘तालीम’ पायी थी। पाकिस्तान ये सब जानता है। वो जन्मजात
ढीठ है, लतख़ोर है, अपनी फ़ितरत से लाचार है, उसकी आँख कभी नहीं खुलेगी। वो साफ़
मुकर जाएगा कि उसकी सरजम़ीं पर आतंकवाद की फैक्ट्रियों की भरमार है, नावेद के
आक़ाओं का भी उससे कोई वास्ता नहीं है! ताज़्ज़ुब नहीं होना
चाहिए कि कल को सरहद पार से ये बयान आ जाए कि नावेद की सारी साज़िश भारत ने ख़ुद
डिजाइन की है! साफ़ है कि पाकिस्तान को अब और बेनक़ाब करने से
कोई फ़ायदा नहीं है। उसके बेशर्म दोस्तों – चीन और अमेरिका का ज़मीर भी उन्हें कभी
नहीं कचोटेगा। लिहाज़ा, विदेश नीति के इस मोर्चे पर सरकारी मशीनरी को ज़्यादा
दौड़ाने से परहेज़ करने में ही समझदारी है। वर्ना, नाहक़ ही मोटी रकम ख़र्च हो
जाएगी।
एनआईए (राष्ट्रीय
जाँच एजेंसी) को नावेद से चट-पट पूछताछ पूरी करके जाँच ख़त्म करनी चाहिए। फास्ट
ट्रैक कोर्ट में रोज़ाना मुक़दमे की सुनवाई हो। ताकि, यथाशीघ्र अदालत में
आरोप-पत्र दाख़िल हों, आरोप तय हों, सबूतों की पड़ताल हो, ज़िरह हो और सज़ा सुनाई
जाए। इसके लिए हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट जाने और दया-याचिकाओं की औपचारिकताओं को भी
पूरी प्राथमिकता से निपटाया जाए और रिकॉर्ड वक़्त में आतंकी को सूली पर लटकाया
जाए।
ये बहुत ज़रूरी है।
क्योंकि अज़मल कसाब के मामले में हम देख चुके हैं कि कैसे बचाव पक्ष तरह-तरह के
हथकंडे अपनाकर मुक़दमे को लम्बा खींचते हैं! कसाब के
मामले में हम देख चुके हैं कि कैसे उसे इंसाफ़ के मुकाम तक पहुँचाने में भारत
सरकार के कम से कम सौ करोड़ रुपये ख़र्च हुए। ये भारी रक़म है। आतंकवादी के ज़िन्दा
पकड़े जाने का ये आर्थिक पहलू भी देश के लिए कम दुःखदायी नहीं है! सरकार चाहकर भी ऐसे दोषियों को सरेआम चौराहे पर खड़ा करके ग़ोली नहीं मार
सकती। उसे मुक़दमे की पूरी कार्यवाही को अंज़ाम देना पड़ता है। इसमें भी जनता के
ख़ून-पसीने की कमाई ही ख़र्च होती है। ये रक़म विकास और ज़रूरत के अन्य कामों पर
परोक्ष रूप से अपना असर तो डालती ही है! जो एक मायने में
पैसों की बर्बादी जैसा ही है। लिहाज़ा, इस बर्बादी को यथा-सम्भव घटाना चाहिए।
अज़मल कसाब को
ज़िन्दा और सुरक्षित रखने के लिए मुम्बई के आर्थर रोड जेल में 2011 की एक ख़बर के
मुताबिक 8 करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे। जे जे अस्पताल में इलाज़ के लिए रखने के
वक़्त कसाब को जिस स्पेशल सेल में रखा गया था, उसे बनाने पर डेढ़ करोड़ रुपये
ख़र्च हुआ था। उसके इलाज़ पर होने वाला ख़र्च भी लाखों से ऊपर था। आर्थर रोड जेल
को इमारतों और आसपास के इलाके को इतना मज़बूत बनाया गया कि यदि कोई रॉकेट लॉचर भी
वहीं जा गिरे तो जेल और कसाब सुरक्षित रहें। कसाब को ऐसी सुरक्षा में रखा गया था,
जैसी राष्ट्राध्यक्षों की होती है। तत्कालीन महाराष्ट्र के गृह मंत्री जयन्त पाटिल
और केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने ख़ुद इन कामों की मॉनिटियरिंग की थी। तब का
अनुमान है कि कसाब की सुरक्षा पर रोज़ाना साढ़े तीन लाख रुपये ख़र्च होते थे। अब
तो ये और बढ़ा ही होगा। कसाब का अदालत या अस्पताल आना-जाना जिस विशेष वाहन में
होता था, वो डेढ़ करोड़ रुपये में बना था।
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मुक़दमे की सुनवाई
करने वाले जज साहब और सरकारी वकील की विशेष सुरक्षा का इंतज़ाम भी था। इसका बोझ
सरकारी ख़जाने पर ही पड़ा था। सरकारी वकील के ख़र्चों के अलावा कसाब के वकील का भी
ख़र्च सरकार ने ही उठाया था। यहाँ तक कि मुक़दमा जब मुम्बई हाईकोर्ट और सुप्रीम
कोर्ट में गया तो भी उसका सारा बोझ सरकार को ही उठाना पड़ा। दया-याचिकाओं के
निपटारे का बोझ भी जनता के मत्थे ही पड़ा। इसमें कसाब को आर्थर रोड जेल से पुणे के
यरवदा जेल तक ले जाना, वहाँ फाँसी देना, दफ़नाना और एहतियात के नाम पर जो कुछ
पुलिस बन्दोबस्त हुआ था, उन सारी गतिविधियों की क़ीमत का यदि सही हिसाब लगाया
जाएगा तो चार साल तक उसे ज़िन्दा रखने का ख़ामियाज़ा सौ करोड़ रुपये को पार कर
जाएगा!

कसाब की पूरी
हिफ़ाज़त करना और भरपूर प्रामाणिकता के साथ उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाना बहुत ज़रूरी
था। वो भारतीय दण्ड विधान के लिए अनिवार्य था। सरकार की भी लाचारी थी कि वो हरेक
ख़र्चे उठाती। कमोबेश, वैसे ही जैसे हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने उस पुलिस
बन्दोबस्त के लिए 20 लाख रुपये का बजट मंज़ूर किया था, जिसकी ज़रूरत याक़ूब मेनन
को फाँसी दिये जाने से लेकर दफ़नाने तक के काम के दौरान पड़ी। सरकारें ऐसे ख़र्चों
को ख़त्म तो नहीं कर सकती, लेकिन सूझबूझ से कम ज़रूर कियाजा सकता है। हमारी पूरी
व्यवस्था ने अगर कसाब से कुछ सबक़ लिया है तो उसे नावेद के मामले में अपनाना
चाहिए। ये सुनहरा मौक़ा है कि सरकार नावेद को उसकी करनी का फल देने में पूरी तेज़ी
दिखाये और इसी बात का रिकॉर्ड बनाया जाए!
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