क्यों काँवड़िए लोगों की दुआएँ और आशीर्वाद के बजाय श्राप बटोरते हैं? kanwariye
भारत में धार्मिक
आस्था को बहुत संवेदनशील विषय माना जाता है। चाहे बात किसी भी धर्म या उपासना
पद्धति की हो। समझदार और बुद्धिजीवी किस्म के लोग धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी
पेंचीदगियों पर चर्चा करने से इसलिए कतराते हैं कि उन्हें लगता है कि हमारा जनमानस
तथ्यों को समझने की मनोदशा में ही नहीं है। लेकिन मेरा मानना है कि प्रयास जारी
रखना चाहिए। इसलिए हमें काँवड़ियों से जुड़े समाज शास्त्र और अर्थशास्त्र को भी
जानना चाहिए।
देश में सावन का
महीना अपनी निराली रंगत लेकर आता है। बारिश का मौसम धरती की खुशबू में कहीं
सोंधापन तो कही मादकता भर देता है। वनस्पति जगत की हरियाली चमचमा उठती है। फ़िज़ा
में उमंग तो दिखती है, लेकिन खुशहाली नहीं। जबकि खुशहाली सावन की बुनियादी ख़ासियत
है। दरअसल. बदलते दौर के साथ सावन में समाहित खुशहाली का हरण हो चुका है। कमोबेश,
वैसे ही जैसे रावण ने सीता का हरण किया था। काश! देश
का बहुसंख्यक हिन्दू समाज और ख़ासकर उनके धार्मिक नेता इसे समझ पाते और अपने
अनुयायियों का सही मार्गदर्शन करते।
बात सिर्फ़ इतना तय
करने की है कि क्या हमारे धार्मिक संस्कार हमें ये नहीं सिखाते कि अपनी खुशी के
लिए हमारा किसी और को जाने या अनजाने में तकलीफ़ पहुँचाना पूर्णतः और विशुद्ध रूप
से अधर्म है, पाप है! हमें इससे बचना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य
से सावन में उमड़ने वाले काँवड़िए और उनके सेवादारों को शायद यही बह्म-ज्ञान नहीं
है। इसलिए काँवड़ियों के मौसम में बहुत बड़ी आबादी दहशत और ख़ौफ़ के बीच जीती है। ये
पूरी तरह से अधार्मिक है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की करोड़ों की आबादी के जनजीवन पर
काँवड़ियों का असर किसी टिड्डी दल के हमले की तरह होता है। दिल्ली और इससे सटे
हरियाणा-राजस्थान के मुख्य मार्गों, गली-मोहल्लों के लिए सावन और कांवड़िए किसी
मानव-निर्मित प्राकृतिक आपदा से कम नहीं हैं। जिनका नियत समय पर आना तय बन चुका
है। क्या हमें इस परिवेश को बदलने के लिए आगे नहीं आना चाहिए?
हरिद्वार के चारों ओर
बसे 20-25 ज़िलों में जो लोग रहते हैं, उन्हें सावन में काँवड़ियों की टोलियों को अपने
आस-पास से गुज़रते हुए देखकर यदि कोई धार्मिक श्रद्धा का अहसास होता है तो वो क्षणिक
ही रहता है। क्योंकि वास्तव में काँवड़ियों की गतिविधियों से उनका जीना मुहाल हो
जाता है। पुलिस और प्रशासन पर अज़ीबोग़रीब सकपकाहट हावी रहती है। जगह-जगह ट्राफिक
जाम रहता है। हर तरफ लोगों में गुस्सा और चिड़चिड़ाहट दिखायी देता है। सड़कों के
किनारे बसे होटल-ढाबे वाले अपना काम-धंधा बन्द कर देते हैं क्योंकि जब कोई उनके
पास रुकेगा ही नहीं तो वो क्या कमाएँगे-खाएँगे! ये
काँवड़ियों के अर्थशास्त्र का बहुत दुःखद पहलू है। करोड़ों लोगों की आमदनी इस मौसम
में शून्य हो जाती है।
सैकड़ों की संख्या
में स्कूलों-कालेजों को मज़बूरन छुट्टियाँ करनी पड़ती हैं, क्योंकि सड़कों पर
ट्राफिक बन्द कर दिया जाता है। लाखों-करोड़ों वाहन सड़कों पर दौड़ते नहीं, बल्कि
रेंगते हैं। वो करोड़ रुपये का पेट्रोल-डीज़ल नाहक जलाने के लिए मज़बूर होते हैं।
इससे देश के उस बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार पर बुरा असर पड़ता जिससे हम
पेट्रोलियम पदार्थों का आयात करते हैं। अनन्त और निरन्तर जाम के दौरान वाहनों से
इतना प्रदूषण होता है, जिसके नुक़सान का आंकलन करना तो अभी हिन्दुस्तान के मिज़ाज़
में ही नहीं है। काँवड़ियों के दबदबे वाले दौर में मुसलमान उनके आसपास फटकने से
बचते हैं, क्योंकि न जाने कौन सी बात साम्प्रदायिक उन्माद की शक्ल अख़्तियार कर ले! ये कैसा धार्मिक आचरण है जो सामाजिक समरसता को ललकारता है!
उधर, काँवड़िए भी
जगह-जगह ऐसी हरक़तें करते चलते हैं, जिससे वो लोगों की दुआएँ और आशीर्वाद बटोरने
के बज़ाय श्राप बटोरते हैं। क्योंकि आपके ‘अच्छे काम’ से भी यदि किसी को तकलीफ़ होगी तो वो दुआएँ भला कैसे देगा! काँवड़ियों की आड़ में जहाँ-तहाँ असामाजिक तत्वों का नंगानाच देखने को
मिलता है। होली के वक़्त दिखने वाला हुड़दंग भी इसी श्रेणी का बन चुका है। फ़र्क
सिर्फ़ ये है कि वो चार-छह दिन का होता है और उसके उद्दंड गेरुआधारी नहीं होते
हैं। कहीं भी काँवड़ियों के लिए सेवा शिविर और विश्रामालय बना लिये जाते हैं। इनके
संचालन के लिए जबरन चंदा वसूला जाता है। उसमें भी तरह-तरह की घपलेबाज़ी होती है।
तक़रीबन वैसे ही जैसे कहीं-कहीं दशहरा, रामलीला और दुर्गापूजा के नाम पर सरेआम
उगाही की जाती है। मामला धार्मिक भावना और आस्था का होता है, इसीलिए लोग इसे जैसे-तैसे
बर्दाश्त करते रहते हैं!
क्यों काँवड़िए लोगों की दुआएँ और आशीर्वाद के बजाय श्राप बटोरते हैं? kanwariye 1

जिस तकलीफ़ की बात
यहाँ हो रही है, वो सबको पता है। लेकिन इसे दुरुस्त करने के लिए कौन आगे आएगा? सरकार से अपेक्षा करना बेमानी है। क्योंकि वो सब कुछ जानते-समझते हुए भी
ख़ामोश रहने के लिए अभिशप्त है। वो हालात को विस्फोटक बनने से पहले कोई कोशिश नहीं
करती। लेकिन यदि कुछ नाग़वार हो गया तो लाठी-चार्ज़, गोली-बारी, कर्फ्यू जैसे कद़म
वो ज़रूर उठाएगी। सरकारी अफ़सरों का नज़रिया और संस्कार ही ऐसा होता है। वो सिर्फ़
अपने सिर आयी बला को टालने के काम करते हैं। इसके इतर उनकी औक़ात कुएँ के मेंढ़क
जैसी ही होती है। वो आने वाली समस्याओं से निपटने की तो सोचते हैं लेकिन समस्या
पैदा ही न हो, ऐसे उपाय अपनाना उनके चरित्र में ही नहीं होता।
अदालती दखलंदाज़ी भी
एक रास्ता हो सकता है। लेकिन कोर्ट भी अपने भरसक कोशिश करती है कि ‘बर्रे के छत्ते में हाथ’ नहीं ही डालना पड़े तो
अच्छा हो। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘डाक-बम’ के नाम पर होने वाली ‘डीजे’ रोक
लगाकर एक तो अच्छा काम किया। लेकिन ज़रूरत बहुत कुछ किये जाने की है और वो भी
यथाशीघ्र।  एक के बाद एक, धार्मिक मौक़ों
पर पैदा होने वाली भगदड़ और उनमें मारे जाने वाले की मिसालों से क्या वैसे सबक
लिये गये हैं, जो अपेक्षित थे? क्या आपको ऐसा लगता है!
यदि नहीं, तो ज़रा सोचिए कि इस विकराल सामाजिक और धार्मिक बीमारी से
हमें कौन और कैसे उबारेगा?
हमारे तमाम धार्मिक
नेता, साधु-सन्त, शंकाराचार्य, महामंडलेश्वर और अखाड़ों के महन्त वगैरह ही इस
बीमारी का व्यावहारिक इलाज़ बता सकते हैं। विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों को इस सामाजिक बुराई पर नकेल कसने के लिए आगे आना
होगा। इन्हें समझाने-बुझाने और संस्कारित करके की ख़्वाहिश केन्द्रीय गृह मंत्रालय
में होनी चाहिए। बीजेपी की हुक़ूमत से अच्छा वक़्त इस काम के लिए कभी हो नहीं
सकता। बीजेपी, आरएसएस, वीएचपी जैसे संगठन जब आम लोगों की परेशानी के प्रति
संवेदनशीलता दिखाएँगे, तभी वो मुसलमानों से भी आग्रह कर सकते हैं कि कैसे वो मुहर्रम
के जुलूस को ऐसे संचालित करें जिससे किसी को तकलीफ़ ना हो, या ज़ुमे की नवाज़ को
सड़कों पर करना बन्द किया जाए! सड़कों को घेरकर
पूजा-पंडाल बनाने वाले भी उतने ही ग़ैरवाज़िब हैं जितना ज़ुमे की नमाज़ के लिए
सड़कों पर आ उतरने वाले। ऐसा ही हाल देश भर में जगह-जगह निकलने वाली शोभा-यात्राओं
और अन्य उत्सवों के दौरान भी होता है।
हम बेशक, धार्मिक
गतिविधियों पर रोक नहीं लगाएँ, क्योंकि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत है। लेकिन
इन्हें देश-काल और परिस्थिति के मुताबिक, संवारना और निखारना बेहद ज़रूरी है। हमें
त्योहारों को गरिमावान बनाना सीखना होगा। धार्मिक नेताओं की मदद लेकर, सबको एक
जैसी सहूलियत देने या न देने की सहमति क्यों नहीं विकसित की जानी चाहिए? सरकार और प्रबुद्ध समाज के अलावा इस काम को कौन अंज़ाम देगा! क्या ज़रूरी क़ानूनी रद्दोबदल या संकल्प दिखाने के लिए हमें किसी निर्भया
कांड की ही ज़रूरत होगी!

नरेन्द्र मोदी जैसे
दूरदर्शी राजनेता की हुक़ूमत के दौरान यदि ऐसी सामाजिक विकृतियाँ दूर नहीं हुईं तो
फिर कभी नहीं होंगी। बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय तक जब उनकी हुँकार पहुँचेगी तो
जनान्दोलन खड़ा हो जाएगा। बहुसंख्यक हिन्दू यदि बदलने का संकल्प दिखाएँगे तो
मुसलमान और अन्य धर्मावलम्बी भी साथ खड़े होंगे। वर्ना, एक ना एक दिन यथास्थितिवाद
की मौजूदा नीति जान-माल का बहुत बड़ा सौदा करके भारतीय समाज पर बहुत बड़ा कलंक
लगाएगी!
काश! हम समझ पाते कि हम ज्वालामुखी पर बैठे
हैं! वक़्त की माँग है कि ये मुद्दा प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ बन जाए। जैसे उन्होंने देशवासियों को
अपने इर्द-गिर्द सफ़ाई रखने के लिए झकझोरा है वैसे ही सभी धर्मों के उपासकों के
लिए सार्वजनिक स्थानों के धार्मिक इस्तेमाल के लिए ज़रूरी क़ायदे-क़ानून बनाये
जाने चाहिए। लोग परम्पराओं को निभाएँ, लेकिन बगैर किसी को तकलीफ़ दिये! देश की सर्वांगीण प्रगति के लिए भी ऐसा दृष्टिकोण संजीवनी साबित होगा!
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