इलाहाबाद हाईकोर्ट का हास्यास्पद फ़ैसला: जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई AllahabadHighCourt
इलाहाबाद हाईकोर्ट के
उस फ़ैसले पर तरस आता है जिसमें कहा गया है कि उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की
दशा सुधारने के लिए ये ज़रूरी है कि सभी तरह के सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों को
अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाएँ। अदालत को लगा कि सरकारी स्कूलों की
बदहाली की परवाह सरकारी कर्मचारियों को सिर्फ़ तब होगी, जब ख़ुद उनकी सन्तानें
इससे प्रभावित होंगी। यानी, ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो
क्या जाने पीर पराई’ के सिद्धान्त को ध्यान में रखकर जज साहब
ने फ़ैसला सुना दिया!
एक नज़र में तो ये
व्याख्या उचित लग सकती है। लेकिन ज़रा सोचिए कि यदि अदालतें अन्य मामलों जैसे
हत्या, चोरी, बलात्कार वग़ैरह के मामले में भी ऐसे ही तर्कों के आधार पर फ़ैसले
सुनाने लगेंगी तो फिर क्या होगा! क्या हमारे न्याय-तंत्र
और पूरी व्यवस्था को संस्कृत की सूक्ति ‘सठे साठ्ये समाचरेत’
या अँग्रेज़ी का उक्ति ‘An Eye for An Eye’ या
हिन्दी का मुहावरे ‘जैसे को तैसा’ की तर्ज़
पर चलाया जा सकता है! ये सोचनीय है। हमारा लोकतंत्र इस
सिद्धान्त पर चलता है कि अदालती आदेश सर्वोपरि है। इसकी अवमानना नहीं होनी चाहिए।
लेकिन कुछ भी आदेश देने से पहले क्या अदालतों को ये नहीं सोचना चाहिए कि उसका आदेश
लागू कैसे होगा, उसकी अनदेखी कैसे-कैसे की जाएगी और उसके फ़ैसलों से कैसे-कैसे नये
विवाद और संकट खड़े हो जाएँगे? ये सभी सवाल एक-दूसरे से
जुड़े हुए हैं। इन सभी को मिलाकर ही अदालत के विवेक की अवधारणा बनी है।
हमारी अदालतें और जज
साहबान भी ये अच्छी तरह जानते हैं कि उनके तमाम फ़ैसले लागू नहीं हो पाते हैं।
किसी-किसी मामले में वो अनुपालन (Compliance) रिपोर्ट
की प्रक्रिया को अपनाकर ये सुनिश्चित ज़रूर कर लेती हैं कि अदालती हुक़्म की तामील
हो। लेकिन ज़्यादातर या यूँ कहें कि 99.9 % मामलों ने दशकों
की अदालती क़वायद के बाद जो फ़ैसले आते हैं, उनका अमल हुआ है या नहीं ये देखने का
अदालतों के पास न तो कोई रिवाज़ है और ना ही तंत्र। पीड़ित लोग अदालत का आदेश लेकर
उसे लागू करवाने के लिए क्या-क्या नहीं भोगते हैं! ऐसे
उदाहरण लाखों की संख्या में देश भर में फैले हुए हैं। सबको पता है कि कहाँ और कैसी
अन्धेरगर्दी है! लेकिन व्यवस्था में कोई बदलाव क्यों नहीं
होता! जनता क़दम-क़दम पर सिसकने के लिए क्यों मज़बूर है?
क्यों नक्सली अदालतों के मनमाने फ़ैसले पलक झपकते ही लागू हो जाते
हैं? इन सवालों का ताल्लुक हमारी पूरी न्याय और सरकारी
व्यवस्था से है।
न्यायमूर्ति सुधीर
अग्रवाल की एकल पीठ ने अपने फ़रमान में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से कहा कि वो
ये सुनिश्चित करें कि हरेक निर्वाचित जन प्रतिनिधि, जज, आला अफ़सर और सभी तरह के छोटे-बड़े
कर्मचारियों की सन्तानें अगले सत्र से सरकारी स्कूलों में ही पढ़ें। जज साहब ने उन
कर्मचारियों पर ज़ुर्माना ठेंकने का भी हुक़्म दिया जो इस आदेश को नहीं मानेगा। ये
ज़ुर्माना उस फ़ीस जितना होगा जो कर्मचारी अपने बच्चों को ग़ैर-सरकारी स्कूलों में
पढ़ाने के लिए ख़र्च करते हैं। यही नहीं, अदालती आदेश नहीं मानने वाले कर्मचारियों
को वेतन-वृद्धि और प्रमोशन भी नहीं देने की बात की गयी है।
ज़रा सोचिए कि कितने
लोग इस अदालती आदेश का सम्मान करने के लिए आगे आएँगे! मेरी नज़र में तो कोई नहीं। क्योंकि फ़रमान ही टेढ़ा-मेढ़ा है। मोटी
तनख्वाहें और रिश्वतख़ोर कर्मचारी ज़ुर्माना तो भर देंगे लेकिन आदेश को ठेंगा ही
दिखाएँगे। वेतन-वृद्धि और प्रमोशन को अपना मौलिक अधिकार बताते हुए सुप्रीम कोर्ट
का रास्ता खटखटाएँगे। उन बच्चों पर क्या विधान लागू होगा जिसके माँ-बाप में से कोई
एक सरकारी नौकरी में है, तो दूसरा नहीं? इसीलिए, ऐसे फ़ैसलों
से अदालतों के विवेक और दूरदर्शिता पर ही सवालिया निशान लग जाते हैं। जनता उन पर
हँसती है।
इसमें कोई दो राय
नहीं है कि न सिर्फ़ उत्तर प्रदेश में बल्कि देश भर में सरकारी स्कूलों का बुरा
हाल है। ये दिन-ब-दिन ख़राब ही हो रहा है। अध्यापक कम हैं, जो हैं वो सक्षम नहीं
हैं, स्कूल का भवन और फ़र्नीचर ख़स्ताहाल हैं, शौचालय की दशा शर्मनाक है, शिक्षा
विभाग के अफ़सर लापरवाह हैं, दिन-रात लूट-खसोट में लगे हैं, अध्यापकों की तकलीफ़ों
को कोई सुनने वाला नहीं है। लाखों पद खाली हैं। शिक्षा विभाग के अधिकारी अव्वल
दर्ज़े के भ्रष्ट और निक्कमें हैं। उन्हें दर्ज़नों ऐसे सरकारी काम करने पड़ते हैं
जिनका उनकी नौकरी से कोई ताल्लुक नहीं है। कुलमिलाकर, समस्याएँ अनन्त हैं। सबको
पता हैं। लेकिन जबावदेही किसी की भी नहीं। जैसे चल रहा है, चल रहा है। जनता ने
हुक़ूमतें बदलकर भी देख लिया। लेकिन ज़मीन पर कुछ भी नहीं बदलता। दिनों-दिन हाल और
ख़राब ही हो रहा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का हास्यास्पद फ़ैसला: जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई Judge

हाईकोर्ट का फ़ैसला
ऐसा है, मानों बीमारी मुझे है और अस्पताल में मेरे पड़ोसी के माँ-बाप को भर्ती
करने की बात की जा रही है। अदालत से मेरी तकलीफ़ें देखी नहीं जा रहीं। वो बहुत
व्यथित है। मायूस है। लेकिन उसका फ़ैसला बचकाना, अपरिपक्व और हास्यास्पद है! आश्चर्य होता है कि वो ऐसे फ़ैसले कैसे सुना सकती है! अदालती फ़ैसले की भावना को साकार किया जा सकता है। लेकिन इसे करने के लिए
हमें सबसे पहले ‘समान शिक्षा पाठ्यक्रम’ को पूरी ताक़त से अपनाना होगा। यही छोटे-बड़े और अमीर-ग़रीब के फ़र्क़ को
कम करेगा। पिछले चार-पाँच दशक में हमने खूब देखा कि गाँव-देहात से निकला पहली
पीढ़ी का व्यक्ति तो सरकारी स्कूलों की ही देन है। लेकिन उसकी आगामी पीढ़ियों में
ऐसा नहीं होता। समाज का कोई भी तबका इसका अपवाद नहीं है। यहाँ तक कि सरकारी स्कूल
में पढ़ाने वाले अध्यापक भी अपनी सन्तानों को वहीं नहीं पढ़ाना चाहते।
हर तबक़ा बारहवीं तक
तो अपनी सन्तानों को अँग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में और उसके बाद शीर्ष सरकारी
संस्थानों जैसे आईआईटी वग़ैरह में पढ़ाना चाहता है। जो ऐसा नहीं कर पाते हैं वो
ख़ुद को अभागा समझते हैं। समाज का ढाँचा ऐसा बन चुका है कि अँग्रेज़ी माध्यम वाले
लोग शासक वर्ग की नुमाइन्दगी करते हैं जबकि अन्य तरीक़ों से शिक्षित लोगों की दशा
शासित वर्ग जैसी है। सामन्ती सोच का आज भी हम पर ग़ज़ब का असर है। अँग्रेज़ी
माध्यम वाले व्यक्ति को रोज़गार पाने में कम दिक्कत होती है। अँग्रेज़ी माध्यम में
बारहवीं तक पढ़े व्यक्ति को भी ठीक-ठाक काम मिल सकता है, लेकिन संस्कृत या दर्शन
शास्त्र या उर्दू में एमए कर चुके व्यक्ति के लिए चपरासी बन पाना भी आसान नहीं है।
पूरा शिक्षा तंत्र ही दशकों से अपनी ओवरहालिंग के लिए हाहाकार मचा रहा है। लेकिन
कोई सुनने वाला नहीं है।
समान शिक्षा
पाठ्यक्रम के लागू होने से समाज की सामन्ती सोच पर चोट पहुँचेगी। इसके बाद ही
स्कूलों को एक जैसी सुविधाओं से सजाने का सपना साकार हो सकता है। लेकिन ज़रा सोचिए
कि जब पूरी सरकारी व्यवस्था ऐसा करने निकलेगी तो उन शिक्षा माफ़ियाओं का क्या होगा
जो सारे सिस्टम में बहुत महत्वपूर्ण जगहों पर बैठे हैं! क्या सरकारी स्कूलों के सुधर जाने से इनका गोरखधंधा ख़त्म नहीं हो जाएगा! क्या इनके निहित स्वार्थ सरकारी स्कूलों को सुधरने देंगे! कौन करेगा ये सब! क्या कभी कर भी पाएगा! ये सारे सवाल सबके मन में आते हैं।
दरअसल, आज़ादी के बाद
धीरे-धीरे समाज के सम्पन्न वर्ग ने अपने लिए अलग विशिष्ट व्यवहार की चाहत को पालना
शुरू किया। अगर आपके पास पैसा है तो आप अपने बच्चों को महँगे स्कूलों में पढ़ाइए,
बीमार पड़ते हैं तो महँगे अस्पतालों में इलाज़ करवाइए। ये सरकारी नहीं हैं तो अपना
प्राइवेट ही खोल लीजिए। धन्धा कीजिए। पैसा कूटिए। जायज़ हो या नाजायज़ अगर आपके
पास पैसा है तो आपके तमाम कष्ट दूर हो सकते हैं। लिहाज़ा, जायज़ से ज़्यादा
नाजायज़ तरीक़े से कमाने को अपना कौशल बनाइए। इसे ही हम ‘हॉय पैसा, हॉय पैसा’ और भ्रष्टाचार की जड़ के रूप
में देखते हैं। समाज की तरक्की के लिए पैसा कमाना, सुविधा जोड़ना जैसी सोच ज़रूरी
है। लेकिन नैतिक-अनैतिक का फ़र्क़ किये बग़ैर सिर्फ़ पैसा कमाने को ही जीवन की
प्राथमिकता बनाने से आज हमारा ये हाल हुआ है।

पूरी व्यवस्था को अब
महज उपदेशों से नहीं बदला जा सकता। अब हमें व्यवस्था को दूरदर्शी, प्रगतिशील और
पारदर्शी नीति के अलावा भारी निवेश से ही सुधारना पड़ेगा। याद कीजिए वो दौर जब
टेलीफोन बहुत बड़ी चीज़ होती है। आज सबके हाथ में मोबाइल है। टेलीग्राम तो सिधार
ही गया। ये सब संचार के क्षेत्र में भारी निवेश की बदौलत ही बदल पाया। बैंकों में
जाने का अनुभव, आटोमोबाइल सेक्टर में उपलब्धता और विकल्प जैसे कितने ही उदाहरण
हैं, जहाँ 20-25 साल के दौरान पूरी की पूरी तस्वीर ही बदल गयी। अब बारी बाक़ी
बुनियादी क्षेत्रों की है। इसमें से एक को ही लेकर हाईकोर्ट ने चिन्ता जतायी है।
गड़बड़ सिर्फ़ इतना है कि जज साहब जो रास्ता सोच रहे हैं, वो सही रास्ता है ही
नहीं। इसीलिए जल्द ही आप उनके आदेश को भी बदलता हुआ देखेंगे।
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