मैंने 26 दिन पहले ‘अख़लाक़’ की भविष्यवाणी की थी…! Akhlaq 1
हिन्दुस्तान
में ये माना जाता है कि किसी व्यक्ति के अच्छे कर्मों का जायज़ा लेना है तो ये
देखिए कि उसके जनाज़े में कितने लोग शरीक़ हुए। इस लिहाज़ से अख़लाक़ को जितने
लोगों की श्रद्धांजलि मिली, वैसी तो बिरलों को ही मिल पाती है। आख़िर, जनाज़े की
भीड़ भी तो श्रद्धांजलि देने वालों की ही होती है। 28 सितम्बर के वाक़ये में भी
अगर कुछ और लोगों को मौत के घाट उतारा गया होता तो भी शायद ही ऐसी अक़ीदत देखने को
नहीं मिलती। सोशल मीडिया पर जितने लोगों ने जिस-जिस ढंग से इस वाक़ये पर अपनी क़लम
चलायी, उसे बाद क्या कुछ और लिखने को बचता है? सैकड़ों
पत्रकारों ने जैसी भड़ास निकाली है, उसका दस फ़ीसदी भी अगर उन्होंने अपने पेशगत
लेखन में दिखाया होता तो शायद ये दिन देखने ही न पड़ते। ख़ैर… इसीलिए, अख़लाक़
की मौत पर मुझे कोई ताज़्ज़ुब नहीं हुआ। मैं इसे शर्मनाक भी नहीं पाता हूँ।
ज़्यादा से ज़्यादा अफ़सोसनाक कह सकता हूँ वो भी सिर्फ़ इसलिए कि इस वक़्त उस जमात
में से किसी न किसी को तो जाना ही था। बदक़िस्मती से वो अख़लाक़ निकला!
अख़लाक़
के बारे में तो मुझे पता नहीं था। लेकिन बिहार के सन्दर्भ में लिखे एक ब्लाग में
मैंने 26 दिन पहले भविष्यवाणी की थी कि चुनाव से पहले ऐसा होकर रहेगा। 11 सितम्बर
2015 को यहीं प्रकाशित अपने ब्लाग बिहार
चुनाव में ‘वोट-कटुआ’ सबका खेल
बिगाड़ेंगे
में
मैंने लिखा था, “एनडीए में बीजेपी के पास भी एक
आज़माया हुआ ‘रासायनिक हथियार’ है। इसे
सुदर्शन चक्र भी कह सकते हैं। ये मतदान से कुछ ही दिन पहले सक्रिय होगा। इसकी पिच
ओबैसी बनाएँगे। इसका काम है धार्मिक ध्रुवीकरण की सनसनाहट पैदा करना। ये सनसनाहट
विरोधी ख़ेमे के पास मौजूद ‘जातीय समीकरण’ वाले हथियार को वैसे ही नष्ट करेगी, जैसे प्रतिरोधक प्रक्षेपास्त्र (antiballistic
missile) काम करते हैं। सैन्य युद्ध में रक्षात्मक भूमिका वाला ये
हथियार सियासी दंगल में रक्षात्मक और हमलावर, दोनों प्रक्षेपास्त्रों का काम एक
साथ करता है। बीजेपी ने इसी अमोघ अस्त्र का शानदार प्रदर्शन पिछले साल लोकसभा
चुनाव में उत्तर प्रदेश में किया था। वहाँ पार्टी ने मोदी लहर बनाने और 80 में से
73 सीटों पर भगवा फ़हराने का चमत्कार इसी दिव्यास्त्र से किया था। तभी तो ‘नेताजी’ पाँच पारिवारिक सीटों और काँग्रेस की ‘माँ-बेटे की जोड़ी’ के अलावा कोई इसके आगे टिक नहीं
पाया।”
मेरी
भविष्यवाणी सही निकली। इसके लिए क्या अपनी पीठ ख़ुद थपथपाऊँ या आत्मग्लानि से डूब
मरूँ कि किस मनहूस घड़ी में मैंने भविष्यवाणी की थी? बिहार
में पहले दौर का मतदान 12 अक्टूबर को है। अख़लाक़ नामक ‘रासायनिक
हथियार’ या अचूक ‘सुदर्शन चक्र’ ठीक दो हफ़्ते पहले चलाया गया। पाँचों दौर का मतदान सम्पन्न होने के बाद सुदर्शन
चक्र वापस संघ रूपी कृष्ण की तर्जनी पर पहुँचकर टिक जाएगा। अख़लाक़ ने ‘धार्मिक ध्रुवीकरण’ की जो सनसनाहट पैदा की वो इतनी तेज़
है कि बिहार का हरेक हिन्दू मतदाता झनझना रहा होगा। जिस तक भी झनझनाहट नहीं पहुँची
होगी, वो आने वाले दिनों में उस तक पहुँचा दी जाएगी। जातिवाद के दावानल में फँसे
बिहार में ये दिव्यास्त्र सबको पछाड़ देगा।
बीजेपी
विरोधी सारे जातिवादी समीकरण नेस्तनाबूत हो जाएँगे। बीजेपी के मुस्कुराने के लिए पर्याप्त
कमल खिल जाएँगे। हर आँकड़ा रिकॉर्ड होगा। आठ नवम्बर को मेरी भविष्यवाणी का अन्तिम
चरण भी सम्पन्न होगा। इस दरम्यान, किसी भी तरह की कोर-कसर को पूरा करने के लिए
शीर्ष रणनीतिकार के रूप में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अपना घर-परिवार त्यागकर पटना
में यूँ नहीं धूनी रमा रहे हैं! अमित बिहार से विजयी
होकर लौटेंगे। नये मुख्यमंत्री के राज्याभिषेक की तैयारियाँ होंगी। बिहार ‘दोहरी दिवाली’ मनाएगा। श्रीमद् भागवत का ‘बिहार अध्याय’ सम्पन्न होगा। लालू-नीतीश में से कोई भी
वानप्रस्थ नहीं जाएगा। सभी श्राद्ध-तर्पण और गंगा-स्नान के उपरान्त थोड़ा विश्राम करके
फिर से जीवन-लीला में लीन हो जाएँगे। वक़्त आने पर आगामी राजनीति के लिए वर्ज़िश
शुरू होगी।
आठ
नवम्बर से बिहार में भगवा फहराएगा। लेकिन तब भी क्या देश ये समझ पाएगा कि साम्प्रदायिकता
एक ऐसा सियासी खेल है, जो कभी अकेले नहीं खेला जाता।
दूसरे खिलाड़ी का होना ज़रूरी है। अख़लाक़ का काम-तमाम करने के बाद त्रिशूल भाँजते
गौभक्त दो दिन तक ख़ासे निराश रहे कि अभी तक दूसरा खिलाड़ी अखाड़े में ताल ठोंककर
क्यों नहीं आया? मीडिया को उकसाने के लिए टीवी वालों के
कैमरे तोड़े गये। मानो, विज्ञापन किया जा रहा हो कि भाई, अब तो आ जाओ। ख़ैर…
सब्र रंग लाया। देर से ही सही, दूसरा ख़िलाड़ी आ गया। उसकी टीम में भी एक से एक
ओलम्पियन हैं।
जनाब
आज़म ख़ान और जनाब ओबैसी जब से ख़िलाड़ी बने हैं, उन्होंने कभी मायूस नहीं किया। ज़हर
का ज़हर से और नफ़रत का नफ़रत से मुँहतोड़ जबाव देना इसके लिए वैसे ही बायें हाथ
का काम रहा है, जैसा संगीत सोम जैसे सदी के उस महानायक का जो साम्प्रदायिक
फ़िल्मों का रजनीकान्त है। केन्द्रीय पर्यटन और संस्कृति राज्यमंत्री महेश शर्मा,
केजरीवाल और राहुल गाँधी की हैसियत तो इस फ़िल्म में चरित्र अभिनेताओं जैसी थी। जनाब
आज़म ख़ान साहब की सरकार तो दंगों को उत्तर प्रदेश में ‘राजकीय खेल’ का दर्ज़ा पहले ही दे चुकी है। खेल
भावना का तकाज़ा है कि मिल-जुलकर खेलिए। एक-दूसरे के हाथ मज़बूत कीजिए। वही हो रहा
है। पिक्चर अभी बाक़ी है। पूरे अक्टूबर हाउस-फुल रहेगी। पाँच नवम्बर को सिनेमाहॉल
से विदा होगी। अगले चुनाव तक इसका Sequel यानी अगला भाग तैयार
होगा।
‘अख़लाक़’ पर एक रोचक टिप्पणी मिली, “मुझे संघ के बिना मोदी मंज़ूर हैं। यह सम्भव नहीं
है। मुझे गाँधी परिवार के बिना काँग्रेस सहर्ष स्वीकार है। यह भी मुमकिन नहीं। मुझे
एक ऐसे राजनीतिक नेतृत्व की तलाश है, जो देश का पॉलिटिकल
कल्चर बदलने की ख़्वाहिश रखता हो। लेकिन अब वो क्या बदलेंगे, ‘दिल्ली में पक्की नौकरी लगने के बाद वो ख़ुद बदल गये हैं, जी।’ तो फिर बचा कौन? कोई नहीं।
कभी सोचा नहीं था कि भारत जैसे घनघोर राजनीतिक देश में ऐसी सियासी दरिद्रता झेलनी
होगी।” तभी नेपथ्य से कोई चीखा कि ट्विटर पर ‘मोदी जी कुछ बोलिए’ की माँग ट्रेंड हो गयी। जी में
आया कि ट्वीट करूँ कि मोदी जी जैसे वाचाल ‘जन-नायक’ से बोलने की अपेक्षा रखने वालों को मैं पूरी विनम्रता से नादान कहना
चाहूँगा! आख़िर, ‘मौनं सम्मति लक्षणं’ को
उनका बयान क्यों नहीं माना जा रहा! इसमें हर्ज़ क्या है? ऐसा
ही रूख तो उन्होंने ‘मोदी-गेट’ पर
दिखाया था तो कौन सा पहाड़ टूट गया देश पर! अभी कौन सी सुनामी आ गयी! उन्मादी भीड़-तंत्र
ने कोई पहली बार तो अपना पराक्रम दिखाया नहीं है। ये आख़िरी भी क्यों होगा?
न जाने कितने लाख लोग हिन्दुस्तान में इसी तरह काल-कलरव हो गये!
मीडिया बड़ी शिद्दत से उन्हें जगाने का दुस्साहस कर रहा है,
जो सो नहीं रहे हैं! क्यों हो रहा है ये स्यापा?
मोदी
जी के बोल देने से, ख़ेद प्रकट करने से, क्या संघ
भक्तों का दीन-ईमान बदल जाएगा? यदि हाँ तो वो ज़रूर बयान
देंगे! आज नहीं तो कल। देर है, अन्धेर नहीं होगी…! क़िताबों में बहुत सुन्दर उपदेश आज भी हैं… सर्वे
भवन्तु सुखिनः… वसुधैव कुटुम्बकम… असतो
मा सदगमय… और, वहीं ये भी तो लिखा है ‘पर
उपदेश कुशल बहुतेरे…!’ अब क्या मोदी हमें ये बताएँगे कि
हिन्दुओं सा उदार तथा समावेशी, और कौन हो सकता है? राम को
मानो तो हिन्दू, श्याम को मानो तो हिन्दू, शिव को मानो तो हिन्दू, शक्ति को मानो
तो हिन्दू, और किसी को भी न मानो तो भी हिन्दू…! पता नहीं,
द्वन्द कहाँ है, कहाँ से आया?
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