जब से राहुल गाँधी के हाथों में काँग्रेस की क़मान सौंपने की क़वायद शुरू हुई है। तब से काँग्रेस का बँटाढार ही होता चला जा रहा है। ये
सच्चाई सबको दिख रही है। तो काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भी दिख ही रही होगी। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि पार्टी नेतृत्व पर उठ रहे सवाल-दर-सवाल को लेकर वो क्या कर रही हैं? क्या उन्होंने राहुल के समुचित प्रशिक्षण की व्यवस्था की है? या फिर, उन्होंने राहुल की जगह पर किसी अन्य सार्थक विकल्प को निखारने का कोई क़दम उठाया है? फ़िलहाल, दोनों में से किसी विकल्प पर कुछ भी होता नहीं दिख रहा। दूर-दूर तक कोई सुगबुगाहट भी नहीं है। तो क्या काँग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि वो यूँ ही आईसीयू में ही रहते-रहते दम तोड़ देगी! सोनिया गाँधी के इस बयान को किस नज़र से देखा जाए कि बिहार के चुनाव देश के लिए निर्णायक साबित होंगे? तो क्या 2014 का लोकसभा चुनाव देश के लिए निर्णायक नहीं था?
बात बहुत संजीदा है। काँग्रेस कोई छोटी-मोटी पार्टी नहीं है। 130 साल पुराना अतीत है उसका। बीजेपी ने 2014 में उसे बुरी तरह से धूल-धूसरित भले ही कर दिया हो, लेकिन भीतरख़ाने उसे भी लगता है कि काँग्रेस ही अकेली राष्ट्रीय पार्टी है जो आज नहीं तो कल उसे चुनौती दे सकती है। उठ खड़ी हो सकती है। ख़ुद बीजेपी या नरेन्द्र मोदी या संघ को कोई प्रतिद्वन्दी दिखता है तो वो काँग्रेस ही है। उसके सिवाय बीजेपी को ललकारने का माद्दा अब किसी और में नहीं बचा है। न ही आने वाले वक़्त में ऐसा होता दिखता है। आज देश में जितनी भी पार्टियाँ हैं, उनमें से सिर्फ़ बीजेपी ही ऐसी है जो काँग्रेस को हल्के में नहीं ले रही। उल्टा बीजेपी, काँग्रेस को उसकी औक़ात से ज़्यादा तव्वज़ो भी देती है। वो जानती है कि हाथी कितना भी दुबला हो जाए दरियाई घोड़े से तो ज़्यादा ही तन्दरूस्त दिखेगा।
काँग्रेस के प्रति बीजेपी का रूख किसी ग़लती के कारण नहीं बल्कि उम्दा राजनीतिक दूरदर्शिता की वजह से है। बीजेपी जानती है कि काँग्रेस के पास देश पर राज करने का जो अनुभव है, उसका मुक़ाबला छोटे समय में नहीं किया जा सकता। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहले दिन से ही ये कोशिश है कि वो काँग्रेस की समावेशी राजनीति को अपनाएँ। मोदी और संघ ये अच्छी तरह जानते हैं कि हिन्दुत्व सिर्फ़ वोट बैंक
बनाने के लिए है। धार्मिक ध्रुवीकरण का नुस्ख़ा उन्हें सत्ता तो दिलवा सकता है लेकिन सत्ता को टिकाऊ तो सिर्फ़ विकास और वादों को पूरा करके ही बनाया जा सकता है।
इसीलिए मंचीय भाषणों में कट्टरवादी हिन्दू राष्ट्र की बातों के बजाय विकास के नारे को बुलन्द किया जाता है। उसी का सपना बेचा जाता है।
44 सीटों के सबसे निचले स्तर पर जा सिमटी काँग्रेस आज क्षेत्रीय पार्टियों से भी ज़्यादा कमज़ोर हो चुकी है। इसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। इसी पार्टी ने सबसे लम्बे वक़्त तक आज़ाद भारत पर राज किया। कई बार काँग्रेस की उपलब्धियाँ भारत का गौरव बनीं। कई बार इसकी करतूतों से देश शर्मसार भी हुआ। इसमें भी कोई शक नहीं कि काँग्रेस का अतीत ही आधुनिक भारत का इतिहास भी है। काँग्रेस पर नेहरू-गाँधी परिवार का चाहे जितना दख़ल दिखायी दे, लेकिन देश के इस सबसे पुराने सामाजिक और राजनीतिक संगठन का 130 साल का सफ़रनामा हमेशा इसी परिवार की जागीर नहीं रहा। नेहरू-गाँधी परिवार का दबदबा सबसे लम्बा ज़रूर रहा। इसी परिवार के वारिसों की छत्रछाया में काँग्रेस ने जहाँ अपना सबसे सुनहरा दौर देखा, वहीं सबसे ख़राब दौर भी इसी की अगुवाई में आया।
परिवार ने ही काँग्रेस को हमेशा उबारा भी। क्या वजह है कि काँग्रेस आज कहीं भी संघर्ष करती तक नज़र नहीं आ रही, जबकि पार्टी परिवार की ही मुट्ठी में है?
काँग्रेस की सुस्ती की कई वजहें हैं। सबसे बड़ी है –
नेतृत्वहीनता। राहुल गाँधी की कार्यशैली ने इसे पूरी तरह से बेपर्दा किया है। वो 11 साल से सांसद हैं। सरकार में मंत्री बनने से कन्नी काटते रहे तो पार्टी ने उन्हें दनादन महासचिव और उपाध्यक्ष भी बना दिया। शुरुआत में लगा था कि वो काँग्रेस को नये ज़माने का नेतृत्व दे पाएँगे, जैसा उनके पिता राजीव ने किया। लेकिन बीते तीन साल में राहुल ने उम्मीदें जगाने से ज़्यादा मायूस किया। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि उनके पास अच्छे और अनुभवी सलाहकार नहीं हैं। राहुल के पास मुट्ठीभर शहरी नौसिखिए युवाओं की एक टोली है। इनकी समझ किसी स्टेनोग्राफर जितनी ही है। इनके पास विशाल और विविधतापूर्ण भारत को देखने-जानने-समझने की कोई दृष्टि नहीं है। किसी भी बड़ी हस्ती को उन क्षेत्रों के लिए ख़ास सलाहकारों को रखना ज़रूरी है जिसमें वो ख़ुद कम सक्षम हो। लेकिन राहुल को तो अपनी ही पार्टी में मौजूद सूरमाओं की क्षमता के बारे में ठीक से नहीं मालूम।
राहुल का पार्टी के नेताओं से ही बहुत सीमित संवाद है,
कार्यकर्ताओं को कौन पूछे? पार्टी दफ़्तर में वो किसी के लिए भी सुलभ नहीं हैं। उनमें अपने आप सीखने की क्षमता तो बहुत कम है ही, दूसरों को देखकर भी सीखने की ललक नहीं है। वर्ना, वो अपनी माँ सोनिया से कितनी ही गूढ़ बातें आसानी से सीख सकते थे। सोनिया ने कैसे बग़ैर एक्सपोज़ हुए राजनीति और काँग्रेस की संस्कृति की बारीक़ियों को सीखा? ये अपने आप में बेमिसाल है। इसके उलट राहुल गाँधी कब क्या करने लगेंगे, कब देश में रहेंगे और कब परदेस में? इन बातों का पता तो उन लोगों को भी नहीं रहता जो पार्टी में उनका झंडा ढोते हैं। अब उन्हें ये भला कौन समझाए कि भारत में राजनीति करने के स्थापित तौर-तरीक़े क्या हैं? बिल्ली के गले में क्या कोई घंटी बाँध पाया है?
काँग्रेस की दूसरी सबसे बड़ी कमज़ोरी ये है कि वो तेज़ी से बदलते वक़्त के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने में नाक़ाम रही है। 35-40 साल से कम उम्र
वाले लोग काँग्रेस की ख़राबियों के बारे में जितना जानते हैं, उतना उसकी ख़ूबियों के बारे में नहीं। युवाओं से जुड़ने के मामले में काँग्रेस को बीजेपी और आम आदमी पार्टी ने बुरी तरह से पटखनी दी है। इनसे ही उसे सीखना भी होगा। बीते दो-ढाई साल में सोशल मीडिया ने युवाओं को जैसे मुखरित किया है, वैसा पहले कभी किसी तकनीक़ी विकास से नहीं हुआ। काँग्रेस और राहुल इस तबक़े से ख़ुद को जोड़ने में बुरी तरह से विफल रहे हैं। आज सोशल मीडिया की भूमिका किसी खिलाड़ी के फिटनेस जैसी हो चुकी है।
काँग्रेस का परम्परागत वोट-बैंक तार-तार हो चुका है। कभी वो सवर्णों के अलावा पिछड़ों, दलित और मुसलमानों की भी चहेती हुआ करती थी। इसीलिए उसकी नीतियाँ समावेशी थीं। अपने वोट-बैंक पर उसकी इतनी अच्छी पकड़ थी कि विरोधी उसे तोड़ने के लिए तुष्टिकरण का प्रलाप करते थे। देखते ही देखते कई क्षेत्रीय पार्टियों ने काँग्रेस के जनाधार में सेंध लगा दी। आज आलम ये है कि पूरी गंगा-पट्टी में काँग्रेस सिसक रही है। वो इतनी कमज़ोर हो चुकी है कि अपनी नीति और सिद्धान्तों से किसी भी सीमा तक जाकर समझौते कर रही है। बिहार में महागठबन्धन में शामिल होना कदाचित उसकी सबसे बड़ी लाचारी रही। इससे भी ज़्यादा दुःखद ये है कि काँग्रेस ने जितना पाया, वो उसके लिए भी जीतोड़ संघर्ष नहीं कर रही।
बिहार में चुनाव प्रचार परवान पर हो और काँग्रेस का शीर्ष
नेतृत्व यानी राहुल गाँधी अमेरिका दौरे पर रहें तो इससे कार्यकर्ताओं में क्या ऐसा
जोश आ जाएगा कि वो बीजेपी के उफ़ान का मुक़ाबला कर सकें? ये प्रसंग राहुल की नादानी से कहीं ज़्यादा
काँग्रेस के हथियार के कुन्द पड़ जाने का है। बिहार चुनाव में काँग्रेस का
प्रदर्शन जैसा भी रहता, लेकिन यदि राहुल गाँधी दो महीने तक पटना में रहते और बिहार
में ही घूमते रहते तो ज़रा सोचिए कि काँग्रेस के कार्यकर्ताओं और समर्थक मतदाताओं
का हौसला कितना बुलन्द होता? इस मामले में राहुल को अमित शाह
से फ़ौरन सीख लेनी चाहिए। उसे ज़िन्दगी भर के लिए गाँठ बाँधकर रखना चाहिए।
काँग्रेस को दो और मोर्चों पर जमकर काम करने की ज़रूरत है।
पहला – पार्टी में वफ़ादारों की एक ऐसी टोली की पहचान करना जिसे वो राज्यों में
सशक्त क्षत्रपों के रूप में उभार सके। उसे ये समझना होगा कि भारत जैसे विशाल देश
में पार्टी को दिल्ली से नहीं चलाया जा सकता। क्षत्रपों के साथ एक जोखिम जुड़ा
होता कि कहीं वो कल को ख़ुद-मुख़्तारी न करने लगें। जैसा कि मोरारजी देसाई, जय
प्रकाश नारायण, चरण सिंह, देवी लाल, विश्वनाथ प्रताप सिंह, शरद पवार, नारायण दत्त
तिवारी और ममता बनर्जी जैसे नेताओं ने किया। ऐसे संकट से सिर्फ़ वफ़ादारों की
बदौलत ही बचा जा सकता है। ये संकट औरों के सामने भी आता रहा है। लालू ने राबड़ी को
यूँ ही क़मान नहीं दी थी। दूसरी ओर, नीतीश ने माँझी को आज़माया तो उसका क्या
अन्ज़ाम हुआ, ये हम देख चुके हैं। किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के लिए क्षत्रपों का
कोई विकल्प नहीं है। कई क्षेत्रीय पार्टियों का प्रसार चन्द राज्यों से बाहर
इसीलिए नहीं हो पाया, क्योंकि उनका नेतृत्व भी काँग्रेस की ही तरह केन्द्रीकृत (Centralized) बना रहा।
काँग्रेस की अगली ज़रूरत समाज के उस प्रबुद्ध (Elite) वर्ग से ख़ुद को जोड़ने की है जो कभी
पार्टी की सबसे बड़ी ताक़त हुआ करती थी। लेकिन देखते ही देखते वो हाशिये पर जा
पहुँची। पार्टी को अपनी विचारधारा में यक़ीन रखने वाले डॉक्टर, इंज़ीनियर,
अध्यापक, वकील, सैन्य अधिकारियों वग़ैरह से ख़ुद को जोड़ना होगा। उन्हें पार्टी
में खींचकर लाना होगा। नेता बनाना होगा। ऐसे ही छात्र संगठनों में जान फूँकनी
होगी। मुसलमान अब भी काफ़ी हद्द तक उसके साथ हैं। हालाँकि, कहीं-कहीं उन्होंने
दूसरे विकल्पों को भी जगह दी है। जैसे – मुलायम, लालू-नीतीश, ममता, शरद वग़ैरह को।
दलितों और पिछड़ों को साथ लाने के लिए पार्टी को इसी तबक़े से नये नेतृत्व को आगे
लाना होगा। उन्हें नया क्षत्रप भी बनाना होगा। फ़िलहाल, तो ऐसा कोई संकेत नहीं
दिखता कि काँग्रेस या राहुल गाँधी ख़ुद को नये ज़माने की चुनौतियों के हिसाब से
तैयार कर रहे हैं। ये राहुल की कार्यशैली ही है कि वो सोशल मीडिया, कार्टून और
व्यंग्यकारों के चहेते पात्र बने हुए हैं। वैसे ये भी नहीं माना जा सकता कि यही
आलम हमेशा रहेगा। ‘सब दिन होत न एक समाना!’ काँग्रेस को नींद से तो जागना ही होगा। अपने लिए भी और देश के लिए भी।
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