जी हाँ, ये सच है कि हमारे बैंक ही हमें चूना लगा रहे हैं! बैंक में रखी हमारी रक़म को भी हमारी सरकार, रिज़र्व बैंक और उसके तमाम सहयोगी बैंक ही चूहे की तरह कुतर
रहे हैं! ऐसा अभी अचानक से नहीं हो रहा बल्कि सालों-साल से ये सिलसिला जारी है।
मोदी सरकार और अरूण जेटली की सदारत से पहले मनमोहन सिंह, चिदम्बरम और प्रणब बाबू के वित्त मंत्रित्वकाल में भी ऐसा
ही था। ये अपने आप में देश का सबसे बड़ा और सफ़ेदपोश घोटाला है। इसके बावजूद, न
जाने क्यों, इसका
पर्दाफ़ाश करने की ज़ुर्रत कोई नहीं दिखाता। आज आलम ये है कि हमारे बैंक निरंकुश
जैसा व्यवहार करने लगे हैं। रिज़र्व बैंक, ब्याज़ दर में जो राहत देता है, उसे
हमारे बैंक पूरा का पूरा ग्राहकों तक नहीं पहुँचाते हैं। वो उसका भी एक हिस्सा
हड़प लेते हैं।
देश की सभी वित्तीय संस्थाएँ भारतीय रिज़र्व बैंक के
निर्देशों के मातहत काम करती हैं। परोक्ष रूप से हमारे सारे बैंक, रिज़र्व बैंक के
एजेंट की तरह काम करते हैं। हरेक बैंक को रिज़र्व बैंक के निर्देशों के मुताबिक़
चलना ज़रूरी है। देश की मौद्रिक नीति (Money
Policy) रिज़र्व बैंक की मुट्ठी में होती है। इसे पर्याप्त स्वायत्तता
(Autonomy) हासिल है। केन्द्र सरकार आसानी से इसके काम में
दख़ल नहीं दे सकती। रिज़र्व बैंक ही ग्राहकों के हितों की सुरक्षा करता है।
रिज़र्व बैंक के निर्देशों में ये बातें भी हैं कि बैंक ग्राहकों को अपनी अलग-अलग
योजनाओं पर कम से कम कितना ब्याज़ देंगे? बैंक चाहें तो
न्यूनतम दर से अधिक ब्याज़ अपने ग्राहकों को दे सकते हैं। इसी तरह तमाम बैंकिंग
सुविधाओं की फ़ीस पर भी रिज़र्व बैंक की नकेल रहती है। आपको बैंकिंग में कोई
कोर-कसर दिखे तो समझ लीजिए कि रिज़र्व बैंक अपना काम ठीक से नहीं कर रहा।
अब ज़रा इस बात पर ग़ौर कीजिए कि हमारे बैंक, हमें, हमारी
रक़म (Deposits) पर कितना ब्याज़ देते हैं? कर्ज़ों पर हमसे कितना ब्याज़ वसूलते हैं? बैंक
हमें सबसे कम ब्याज़ बचत ख़ाता पर देते हैं। ये 4% है। यही
हमारी जेब कुतरने का सबसे बड़ा ज़रिया है। क्योंकि अगर महँगाई की दर आठ फ़ीसदी है
तो साल भर में बैंक में पड़ा आपका पैसा चार फ़ीसदी की कमाई करेगा और उसे आठ फ़ीसदी
का नुक़सान होगा। मसलन, अगर आपके बचत खाते में एक हज़ार रुपये हैं तो साल भर में
वो 40 रुपये का ब्याज़ कमाएँगे। जबकि महँगाई या अवमूल्यन (Inflation &
Devaluation) के रूप में उसे 80 रुपये का नुक़सान होगा। यानी साल भर
बाद आपके हज़ार रुपये की औक़ात 960 रुपये हो जाएगी। देश की कुल घरेलू बचत के
लिहाज़ से ये दशा बहुत ख़राब है।
सावधि जमा (Recurring
Deposits) योजनाओं में बचत खाते के मुक़ाबले ज़्यादा ब्याज़ मिलता
है। यदि इसकी ब्याज़ दर आठ फ़ीसदी के आसपास है तो आपकी रक़म को चूना तो नहीं लग
रहा है। लेकिन वो कुछ ख़ास कमा भी नहीं रही। कमोबेश जस की तस है। बस, डूब नहीं रही।
इससे बेहतर ब्याज़ फ़िक्स्ड डिपोज़िट यानी मियादी जमा में है। जो नौ से साढ़े नौ
फ़ीसदी है। वरिष्ठ नागरिक मामूली सा ज़्यादा भी पा लेते हैं। यानी अवमूल्यन के
लिहाज़ से बैंक में रखी आपकी रक़म ज़्यादा से ज़्यादा दो-ढाई फ़ीसदी ब्याज़ ही कमा
सकती है। रिज़र्व बैंक, बग़ैर जोख़िम के हमें इतनी गारन्टी ही दे पाता है। कई वित्तीय
गतिविधियों में ज़्यादा फ़ायदा मुमकिन है, लेकिन घाटे का जोख़िम भी है। जितना
ज़्यादा जोख़िम, उतनी अधिक कमायी की सम्भावना तो होती है, लेकिन उसी हिसाब से रक़म
डूबने की आशंका भी होती है। ग्राहकों की बैंक में जमा रक़म पर जोख़िम उठाना ही बैंक
का अहम काम है।
बैंक जोख़िम उठाने की प्रक्रिया के तहत जमाकर्त्ताओं की
रक़म को कर्ज़ के रूप में देते हैं। कर्ज़ पर ज़्यादा ब्याज़ लेते हैं। लिये जाने
वाले ब्याज़ और दिये जाने वाले ब्याज़ के बीच का अन्तर ही बैंक की कमाई का अहम
ज़रिया है। कर्ज़ देते वक़्त बैंक दस-साढ़े दस फ़ीसदी से लेकर 36 प्रतिशत या इससे
ज़्यादा भी ब्याज़ ले सकते हैं। सबसे कम ब्याज़ दर छोटे स्तर के घर-कर्ज़ पर होता
है, जबकि सबसे अधिक ब्याज़ क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन जैसी चीज़ों पर होता है। किसानों
को सरकार मामूली ब्याज़ दर पर भी कर्ज़ देती है। लेकिन उस हालत में या तो सरकारें
बैंक को होने वाले घाटे की भरपायी करती हैं या फिर बैंक उसे ख़ुद झेलता है।
विभिन्न कर्ज़ों पर जोख़िम का ख़्याल रखते हुए बैंक अलग-अलग ब्याज़ वसूलते हैं।
बैंकों का ढर्रा ऐसा है कि ग़रीबों को कर्ज़ मिलने में बहुत मुश्किलें होती हैं।
जबकि बड़ी कम्पनियाँ और उद्यमी ख़ासी सहूलियत से भारी कर्ज़ पा जाते हैं। यही लोग
कर्ज़ चुकाने में बैंकों को सबसे ज़्यादा गच्चा भी देते हैं। 

ऐसे गच्चे Non
Performing Assets (NPA) बनते हैं। ये सालाना
छह फ़ीसदी से बढ़ रहा है। आज सारे बैंकों का NPA क़रीब पाँच
लाख करोड़ रुपये है। NPA का मतलब है, बैंक का वो कर्ज़ा
जिसकी उगाही नहीं हो पाती है। डूबी रक़म की उगाही में हमारे बैंक बहुत कमज़ोर हैं।
ख़ासकर, उन हस्तियों के मामले में जो बैंक के बड़े अफ़सरों को ‘सेट’ करके भारी भरकम कर्ज़ लेने में सफ़ल होते हैं। NPA भी बैंकों का सफ़ेदपोश घोटाला ही है। वैसे रिज़र्व बैंक के पास इसकी भी लग़ाम
है। लेकिन व्यवहार में लग़ाम बहुत ज़्यादा ढीली है। NPA
घोटाले का दूसरा पहलू ये है कि बैंक अपने घाटे की भरपायी उन ग्राहकों से करते हैं
जो बैंकिंग अनुशासन के प्रति निष्ठावान रहते हैं। यानी करे कोई, भरे कोई। इसे यूँ
भी कह सकते हैं कि घोटाला रईसों का और मार ग़रीबों पर।

बैंकों की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा NPA की भेंट चढ़ जाता है। इसीलिए बैंक हमें इतना
कम ब्याज़ देते हैं कि हमारी मूल रक़म में ही चूना लगता रहता है। बैंकों की दलील
है कि बचत खातों में बहुत कम रक़म होती है। इससे उनका संचालन ख़र्च (Operating
Cost) ख़ासा बढ़ गया है। लेकिन ज़ीरो बैलेंस वाले खाते तो अभी प्रधानमंत्री
जन-धन योजना के तहत खुलने शुरू हुए हैं। उससे पहले को खाते में कम से कम एक हज़ार
रुपये रखने की शर्त थी। बैंकों के बीच एक अघोषित मिलीभगत भी होती है। इसीलिए जब रिज़र्व
बैंक, ब्याज़ दर बढ़ाता है तो बाक़ी बैंक चटपट उसी अनुपात में कर्ज़ महँगा कर देते
हैं। लेकिन जब ब्याज में कटौती होती है, तो बैंक अहम हिस्सा ख़ुद ढकार लेते हैं। पूरा
राहत ग्राहकों को नहीं देते। बैंकों के इस गड़बड़झाले को तमाम क़ाबिल लोग और
सरकारें अच्छी तरह समझती हैं। लेकिन सभी तमाशबीन बने रहते हैं।
बीते दस महीने में यानी इसी साल रिज़र्व बैंक ने ब्याज़
दरों में 125 बेसिस प्वाइंट्स (bps) यानी सवा फ़ीसदी की कमी की। लेकिन हमारे बैंकों ने रियायत का बड़ा हिस्सा
ख़ुद हड़प लिया। मियादी जमा पर दिये जाने वाला ब्याज़ 130 बेसिस प्वाइंट्स कम कर
दिया। जबकि कर्ज़ों की ब्याज़ में राहत का 70 से 80 फ़ीसदी फ़ायदा ही ग्राहकों तक
जाने दिया। यही है बैंकों का हमारी जेब को दोनों ओर से करतने का तरीक़ा। बैंक
व्यावसायिक संस्था हैं। उन्हें अपने ढंग से व्यवसाय करने की छूट है। बशर्ते वो एकाधिकारी
प्रवृत्ति (Monopoly) से दूर रहें। माना जाता है कि बैंकों की
आपसी प्रतिस्पर्धा ही इस पर अंकुश लगाने के लिए पर्याप्त है। लेकिन व्यवहार में
देखा गया है कि ग्राहकों के लिए ब्याज़ दर तय करते वक़्त चुनिन्दा बड़े बैंकों के
बीच कुछ न कुछ साँठ-गाँठ हो जाती है। जनता की जेब क़तरने का
ये बड़ा ही सयाना तरीक़ा है।
वैसे तो बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में 1991 की उदारीकरण के
बाद बहुत बदलाव आया है। आज बैंकिंग काफ़ी ख़ुशगवार और सहुलियत भरी हो चुकी है।
एटीएम और नेट-बैंकिंग ने तो क्रान्ति ला दी है। लेकिन ब्याज़ दरों के ज़रिये हमारे
बैंक जिस तरह से और जितने बड़े पैमाने पर हमारी जेब काटते हैं। उसका भी पुख़्ता
इलाज़ बहुत ज़रूरी है। कम ब्याज़ दर से बचत हतोत्साहित होती है। इसका सीधा असर देश
के विकास पर पड़ता है। बैंक ही बचत को उपयोगी बनाते हैं। राष्ट्र निर्माण और विकास
में घरेलू बचत की अहम भूमिका है। जिस तरह हम दो-दो पैसे बचाकर अपने लिए तरह-तरह की
चीज़ें जुटाते हैं, उसी तरह देश भी घरेलू बचत से स्कूल, अस्पताल, सड़क जैसा
बुनियादी ढाँचा खड़ा करता है। विकास की तेज़ गति के लिए निवेश ज़रूरी है जो टैक्स,
घरेलू बचत, विदेशी निवेश (विदेशियों की बचत) और सम्पत्तियों को बेचकर हासिल होती
है। घरेलू बचत से तैयार होने वाली परिसम्पत्तियाँ (Assets) ही टिकाऊ विकास का आधार बनती हैं। इसीलिए हमारे
बैंकिंग कारोबार का बेहतरीन होना बहुत ज़रूरी है।
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