काश! उबेर रेप कांड से सरकारें भी सबक़ लें और ऐसा त्वरित न्याय सबको मिले UberRepist
कभी-कभी अपवाद भी बहुत अच्छे लगते हैं। इससे ये यक़ीन होता है कि चमत्कार भी
मुमकिन है। उबेर रेप कांड ने निश्चित रूप से आज़ाद भारत के न्यायिक इतिहास में
अपनी सर्वोच्च जगह बना ली है। बलात्कार के इस मामले में हमारी सड़ान्ध मार रही
न्याय व्यवस्था ने अपराध होने के 11 महीने के भीतर दोषी को सज़ा सुना दी! वाह! ये है इंसाफ़!
गर्व करने लायक! शायद, ये देश का इकलौता मामला
है जिसमें वास्तव में इंसाफ़ हुआ है। बाक़ी जिन लाखों-करोड़ों मामलों में हमारी
अदालतें फ़ैसले देती रही हैं, यदि वो ज़रा सी भी देरी से आया फ़ैसला था तो इंसाफ़
की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता। क्योंकि क़ानून का सर्वमान्य सिद्धान्त है कि ‘Justice
delayed is justice denied’ यानी ‘इंसाफ़ में
देरी भी नाइंसाफ़ी है’। इसके व्यावहारिक पहलू के मुताबिक़,
देश में शायद ही किसी को इंसाफ़ मिलता हो, सिवाय इस अपवाद के।
अब एक आदर्श हमारे सामने है। हमें इससे सबक लेना चाहिए। उबेर रेप कांड की जाँच
से जुड़े सभी पुलिस अफ़सरों की औपचारिक और सरकारी तौर पर भी प्रशंसा होनी चाहिए। क्योंकि
ये भी किसी चमत्कार से कम नहीं है कि निहायत भ्रष्ट, सुस्त और लापरवाह समझी जाने
वाली दिल्ली पुलिस की एक टोली ने 19 दिन के भीतर अपराधी को गिरफ़्तार किया, उससे
पूछताछ की, मुक़दमा चलाने के लिए ज़रूरी सबूत और 28 गवाह जुटाये तथा 19 दिन के
रिकार्ड वक़्त में जाँच पूरी करके अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया। वाकई में क़माल
हो गया! क़माल करने वालों ने भले ही अपना फ़र्ज़ निभाया
हो लेकिन उनकी निष्ठा ने मिसाल तो बनायी है। जाँच दल को कम से कम पुलिस पदक तो
अवश्य मिलना चाहिए।
अगला चमत्कार हमारी अदालत ने दिखाया। सरकारी वकील भी इसका हिस्सा रहे हैं।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कावेरी बावेजा ने भी सराहनीय काम किया। इन सभी ने अपनी
पेशेवर दक्षता और निष्ठा का प्रदर्शन किया। इन्हें भी समुचित सम्मान ज़रूर मिलना
चाहिए। इनकी उपलब्धियाँ भी वैसे ही पेशेवर रही हैं जैसे वैज्ञानिकों को उनकी
श्रेष्ठता, खिलाड़ियों को उत्कृष्ता और सैनिकों को अदम्य साहस तथा वीरता के लिए
सम्मानित किया जाता है। लगे हाथ, भारत सरकार को ये भी पता करना चाहिए कि कहीं ये
मामला जाँच को शीघ्र पूरा करने और सज़ा के मुक़ाम तक पहुँचाने के लिहाज़ से गिनिज़
बुक में तो अपनी जगह नहीं बना लेगा! यदि ऐसा हो तो योग-दिवस की उपलब्धियों के बाद ये नया वाकया होगा, जब मोदी
सरकार की अगुवाई में भारत कोई विश्व रिकार्ड बनाएगा! सम्भवतः
जन-धन योजना के तहत खोले गये करोड़ों बैंक ख़ातों ने भी दुनिया में कोई रिकार्ड
बनाया होगा।
इस मामले से ‘फास्ट
ट्रैक कोर्ट’ का वो सपना भी पहली बार साकार होता दिखा, जिसे वाजपेयी
सरकार के क़ानून मंत्री के रूप में अरूण जेटली ने दिखाया था। अदालतों में मुक़दमों
के तेज़ी से निपटारे के लिए ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ का नुस्ख़ा जेटली की ही देन था। अफ़सोस सिर्फ़ इतना है कि जिस शानदार न्यायिक
सुधार की शुरुआत उन्होंने की, उसे आगामी क़ानून मंत्रियों नये मुक़ाम तक पहुँचाने का
कोई ख़ास प्रयास नहीं किया। ऐसी ढिलाई के लिए जेटली के बाद बने सारे क़ानून मंत्री
बराबर के ज़िम्मेदार हैं। बहरहाल, अब भी ये सबक़ तो लिया ही जा सकता है कि निचली
अदालतों में भारी तादाद में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स का जाल तब तक बिछाया जाता रहे जब
तक कि हमारी न्यायपालिका हरेक मामले का निपटारा उबेर रेप कांड की तरह निपटाने लायक
न बन जाए। बेशक, ये बहुत बड़ा लक्ष्य है। लेकिन सरकार तो होती ही है बड़े सपनों को
साकार करने के लिए। मोदी सरकार को इसे हुक़ूमत के उस बुनियादी काम की तरह देखना
चाहिए जैसे बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य वग़ैरह की बातें होती हैं। काश!
मौजूदा क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद तक भी ये आवाज़ पहुँचती।
काश! उबेर रेप कांड से सरकारें भी सबक़ लें और ऐसा त्वरित न्याय सबको मिले supreme court 580x395

कहने को भारत में क़ानून का राज (Rule
of Law) है। लेकिन कौन नहीं जानता कि देश में क़ानून का हाल क्या है? लोगों में क़ानून का लिहाज़ कैसा है? क़ानून का
ख़ौफ़ कितना है? न्याय तंत्र कारगर नहीं होगा तो चारों ओर
वैसी ही अव्यवस्था दिखायी देगी, जैसा अनुभव हमें रोज़मर्रा में होता है। वाकई में,
क़ानून का राज तब तक हो ही नहीं सकता, जब तक अदालती इंसाफ़ की प्रक्रिया निष्कलंक
नहीं हो जाती। आज हमारी अदालतों में 3.15 करोड़ मुक़दमे विचाराधीन हैं। देश में
क़रीब 16 हज़ार जज हैं। हरेक लाख व्यक्ति पर एक जज है। जबकि विधि आयोग की सिफ़ारिश
है कि इसे कम से कम पाँच जज प्रति लाख तो होना ही चाहिए। साफ़ है कि जजों और
अदालतों की सारी क़िल्लत सरकारों और ख़ासतौर पर राज्यों की लापरवाही की वजह से है।
देश में 12 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड वकील हैं। 950 से ज़्यादा लॉ स्कूल हैं।
इनमें क़रीब पाँच लाख विद्यार्थी वकालत की पढ़ाई करते हैं। लेकिन अदालतों में
वकालत करने के लिए बमुश्किल 60-65 हज़ार नये वकील ही हर साल जुड़ते हैं। अब ज़रा
जजों के मुक़दमों के निपटाने की रफ़्तार को भी समझते चलें। हमारा सुप्रीम कोर्ट
1950 में बना। आठ जजों से शुरू हुए सुप्रीम कोर्ट में आज 30 पद हैं। अभी वहाँ 66
हज़ार मुक़दमें विचाराधीन हैं। इसने 65 साल में 40 हज़ार मामलों का फ़ैसला किया
है। यानी इसकी औसत रफ़्तार रही, 615 मामले सालाना। अब फ़र्ज़ कीजिए कि सुप्रीम
कोर्ट में और जज बढ़ा दिये जाएँ। इससे वो सालाना एक हज़ार मुक़दमे निपटाने लगें,
तो भी लम्बित मामलों के अम्बार ख़त्म करने में उसे 60 साल और लग जाएँगे। वो भी तब
जबकि इस दौरान एक भी नया मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचे ही नहीं!
देश के 24 हाई कोर्ट्स में 1017 स्वीकृत पदों के मुक़ाबले 640 जज हैं। चार सौ
पद इसलिए खाली हैं कि भर्तियाँ सही वक़्त पर नहीं हुई। हाई कोर्ट्स में 45 लाख से
ज़्यादा मुक़दमे अटके पड़े हैं। ज़िला अदालतों की हालत तो महा-दयनीय है। वहाँ भी
मुक़दमों के ढेर के मुक़ाबले जजों और अदालतों की संख्या बेहद अपर्याप्त और शर्मनाक
रूप से कम है। 600 से ज़्यादा ज़िला अदालतों में पौने तीन करोड़ मुक़दमों को
इंसाफ़ का इंतज़ार है। वहाँ भी जिस रफ़्तार से इंसाफ़ मिलता है, उससे तो सौ साल तक
भी विचाराधीन मुक़दमों का अम्बार नहीं हो सकता है। साफ़ है कि हमारा न्याय-तंत्र आईसीयू
में है। ये ख़ुद ही बहुत ज़्यादा बीमार है। औरों की बीमारी क्या ठीक करेगा! अदालतों की ऐसी दुर्दशा के लिए केन्द्र और
राज्य सभी की सरकारें बराबर से ज़िम्मेदार हैं। कोई एक क़सूरवार नहीं है। इलाज़ भी
सरकारें ही करेंगी। सबने उसी की ओर टकटकी लगा रखी है। इसीलिए, जहाँ देश की हरेक
अदालत में चौतरफ़ा निराशा का आलम हो, वहाँ उबेर रेप कांड में 11 महीने के भीतर
इंसाफ़ का हो जाना, क्या किसी चमत्कार से कम है!
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