काश! मोदी ने यही सूझबूझ ‘बिहार’ में दिखायी होती तो तस्वीर कुछ और होती ModiLoksabha
अच्छे राजनेता में नसीहत लेने, सीखने और सुधारवादी बनने की बेज़ोड़ ख़ूबियाँ होती हैं। इसे
ही ‘Course
Corrections’ कहते हैं। प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी में भी शुक्रवार को यही गुण उस वक़्त जमकर दिखायी दिये जब वो लोकसभा
में संविधान पर हुई चर्चा के तहत बोल रहे थे। घंटे भर के इस सम्बोधन के बाद लगा कि
मोदी जी के भाषणों की यदि ऐसी ही दिशा बिहार चुनाव के दौरान दिखायी देती तो आज
वहाँ तस्वीर कुछ और ही होती! बहरहाल, देश के मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक माहौल में शुक्रवार का
दिन पूरी तरह से मोदी के नाम रहा। पहले लोकसभा में, फिर घर पर विपक्षी नेताओं
सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के साथ जीएसटी से जुड़े गतिरोध
पर सीधी बातचीत करके। लेकिन मुमकिन है कि मोदी भक्तों को ये ख़ुशगवार भाषण उतना
नहीं भाया होगा, जैसा अभ्यास उन्हें बीते डेढ़ साल से होता रहा है।
मोदी का ये भाषण पिछले साल लाल क़िले की प्राचीर से हुए उनके पहले सम्बोधन से
उम्दा था। क्योंकि ये समावेशी था। इसमें उनके व्यक्तित्व की हर छटा दिखायी दी। एक
राजनेता की, सदन के
नेता की,
प्रधानमंत्री की, प्रधान सेवक की और संघ के एक दूरदर्शी और वाचाल प्रचारक की।
इसमें सबको साथ लेकर चलने वाली भावना थी। बुज़ुर्गों, पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों
और सत्तारूढ़ पार्टियों के प्रति कृतज्ञता और आदर का भाव था। बहुमत के अहंकार में
विरोधियों को ललकारने वाला तेवर नहीं था। बल्कि ये अहसास था कि देश को यहाँ तक
लाने में हर छोटे-बड़े व्यक्ति का योगदान रहा है। सबको जोड़कर देखें तो घनघोर पारिवारिक
फ़िल्म की पटकथा उभरती है, जिसमें नौ-दुर्गा जैसी देवी के हर स्वरूप है और विष्णु
के बारह-अवतार वाली हरेक बात! मज़े की बात ये है कि इस कॉकटेल में ‘जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ जैसी बात भी थी!
काश! मोदी ने यही सूझबूझ ‘बिहार’ में दिखायी होती तो तस्वीर कुछ और होती Modiwithaudiance
मोदी समर्थकों और ख़ासकर हिन्दुत्ववादियों को इस भाषण को बारम्बार सुनना
चाहिए। इसमें प्रधानमंत्री साफ़-साफ़ समझा रहे हैं कि वो भक्तों की ख़्वाहिश के
मुताबिक़ क्या-क्या कर सकते हैं और क्या नहीं? मोदी ने बहुत कुशलता और शालीनता से कट्टरपन्थियों को समझाया कि वो कहाँ,
क्यों और कैसे भटक रहे हैं? क्या ग़लतियाँ कर रहे हैं? हरेक सवाल का जवाब मिलेगा। आगे के लिए नसीहत मिलेगी। बशर्ते
कोई समझना चाहे। मुमकिन है कि भक्तों को ये सुनकर मायूसी हो कि मोदी जी, संविधान
को सर्वोच्च और सर्वोपरि मानने की सीख दे रहे हैं, बता रहे हैं कि संविधान कैसे बेहतरीन
बना! उन्होंने काँग्रेस का नाम ज़ुबान पर लाये बग़ैर
उसकी तारीफ़ की, ‘संविधान को बनाने में सभी की भूमिका रही।
उस समय जिनके नेतृत्व में देश चलता था, उनकी विशेष भूमिका रही।’ मौजूदा राजनीति की लाचारी भी बतायी कि आज ‘चुनावी
दल-भक्ति’ ने हमें बहुत संकीर्ण बना दिया है।
बाबा साहेब भीवराव अम्बेडकर की तो मोदी जी इतनी प्रशंसा की जितनी शायद
उन्होंने बतौर प्रचारक, संघ के महापुरुषों की भी नहीं की होगी। बुनियादी तौर पर
काँग्रेसी और गाँधीवादी रहे अम्बेडकर का ऐसा गुणगान संघ का कोई प्रचारक करे, तो
ताज़्ज़ुब होना स्वाभाविक है। मोदी के शब्दों में विरोधियों से भी अच्छाईयों को
सीखने और उससे प्रेरणा लेने का भाव था। शायद, उनमें अब ये दृष्टि भी आ चुकी है कि
कैसे काँग्रेस ने इतने बहुलतावादी देश में इतने लम्बे वक़्त तक अखंड राज किया। ज़ाहिर
है जिन प्रतीकों को सबसे ज़्यादा पतित समझने के लिए मोदी को संस्कारित किया था, उन्हें
अब तोड़ने की चेष्टा है। ये मोदी का नवाचार है। मोदी पहले भी काँग्रेसी प्रतीकों
में सकारात्मकता देखते रहे हैं। लोकसभा में राजनाथ सिंह ने भी महात्मा गाँधी की
तारीफ़ अनायास तो नहीं की होगी।
शायद, बीजेपी अब सिद्धान्त रूप में ये स्वीकार करना चाहती है कि अपने दौर में देश
के तमाम बेहतरीन लोगों ने ही काँग्रेस और संविधान को बनाया था। उन्होंने तरह-तरह
के त्याग किये। उनके नेतृत्व में देश ने तमाम उपलब्धियाँ हासिल कीं। काँग्रेसी
हुक़ूमतों की कमियाँ भी असंख्य रही होंगी। लेकिन 60 साल में उसकी जो उपलब्धियाँ
रहीं, उसे प्रधानमंत्री जैसी शख़्सियत की ओर से सरेआम पहचाना जाना, क्या भक्तों को
अच्छा लगा होगा? काश! लगता। क्योंकि देश किसी पार्टी की बपौती नहीं है। न ही हो सकती है।
मोदी ने देशवासियों को एक और बहुत ही सकारात्मक सन्देश दिया कि हर वक़्त ये
सोचना बन्द करें कि उनके अधिकार क्या-क्या हैं? बल्कि अपने ग़िरेबान में झाँककर देखें कि हमारे कर्तव्य क्या-क्या हैं?
इस लिहाज़ से प्रधान सेवक ने नौकरशाही में बैठी अपनी पूरी
सेवक-मंडली को एक ही झटके में बुरी तरह से आड़े-हाथों ले लिया। मोदी जी की ये बेजोड़
नसीहत है। सच पूछिए, तो देश को नयी ऊँचाईयों पर ले जाने का सारा मंत्र इसी बात में
समाहित है। भारत का यही सबसे कमज़ोर पहलू है कि हमें अपने फ़र्ज़ का होश नहीं रहता
और दूसरों में ऐब ढूँढते निकल पड़ते हैं। जिस दिन ये प्रवृत्ति बदलेगी, उस दिन
भारत महाशक्ति और विश्व-गुरु दोनों बन जाएगा।
काश! मोदी ने यही सूझबूझ ‘बिहार’ में दिखायी होती तो तस्वीर कुछ और होती Lohiya Nehru
नेहरू-लोहिया प्रसंग का हवाला देकर नरेन्द्र मोदी ने भक्तों को सहनशीलता की
नसीहत दी। उन्होंने समझाया कि विरोधियों को समुचित जगह (Space) देने का नेहरू का तरीक़ा
क़ाबिले-तारीफ़ था। ये भी बताया कि ‘बहुमत का मतलब निरंकुशता
नहीं है। लोकतंत्र को तो आमसहमति से ही चलना चाहिए। ये चल भी इसी से पाएगा। बहुमत
तो सिर्फ़ आख़िरी विकल्प होता है। इसका इस्तेमाल बहुत मज़बूरी में ही होना चाहिए।’ सवाल ये है कि हिन्दुत्ववादियों को ये सकारात्मक बातें कैसे हज़म होंगी?
मोदी ने परोक्ष रूप से राहुल गाँधी की उस सोच की भी तारीफ़ की,
जिसके मुताबिक़ सज़ायाफ़्ता नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका गया। अभी तक देश-विदेश में
मोदी के भाषण ऐसे होते थे, मानो वो हर वक़्त चुनावी रैली में ही हों। लेकिन लोकसभा
में वो बात-बात पर अपनी भुजाएँ फड़फड़ाते नहीं दिखे।
भाषण के बाद बीजेपी के ही एक सांसद ने कहा कि ये कुछ ज़्यादा ही शाकाहारी था।
यहाँ तक कि बग़ैर प्याज़-लहसुन वाला। शायद, मोदी पहली बार इतना नरम थे। मुमकिन है
अम्बेडकर के बारे में विस्तार से पढ़ने की वजह से उनका मन-मानस बदल चुका था।
मुमकिन है कि इसकी वजह, भाषण के फ़ौरन बाद जीएसटी पर सोनिया और मनमोहन से होने
वाली उनकी मुलाक़ात भी रही हो। इसीलिए प्रधानमंत्री निवास पर हुई 35-40 मिनट की
चर्चा में भी मोदी ने अपना बाहुबल दिखाने से ज़्यादा ज़ोर विरोधियों को सुनने और
उनसे सीखने पर रखा। भले ही ऐसा किसी मज़बूरी में हुआ हो या सद्बुद्धि आने की वजह
से, लेकिन देश के लिए ये बहुत सुखद है। मुमकिन है कि मोदी ने समझ लिया हो कि देश
को ‘काँग्रेस विहीन’ करने का
नारा देना उनकी नादानी थी। यही सही राजनीति भी है।
लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी को कई झटके लग चुके हैं। देश उसे ऐसे दोराहे पर
लाकर खड़ा कर चुका है, जहाँ मोदी को ये तय करना होगा कि यदि वो अपनी छवि एक क़ाबिल
प्रधानमंत्री की बनाना चाहते हैं तो उन्हें विकास (Development) के अपने एजेंडे पर लौटना ही होगा। मुमकिन है कि
इसके लिए उन्हें संघ से पंगा लेना पड़े। क्योंकि संघ का हिन्दुत्ववादी एजेंड़ा और ‘विकास’ साथ-साथ नहीं चल सकते। शायद मोदी ने जनमानस
में पसरा ये सन्देश पढ़ लिया है कि जनता ने उन्हें एक ईमानदार शासन के लिए सत्ता
सौंपी है। किसी तालिबानी सोच को देश पर थोपने के लिए नहीं। इसमें भी कोई शक़ नहीं,
सन्देश पढ़ने की उनकी क्षमता ने ही उन्हें इतनी ऊँचाई तक पहुँचाया है। शायद, मोदी
को अब तक बिहार से उभरा सबसे बड़ा सन्देश भी समझ में आ गया है कि मतदाताओं को अनाप-शनाप
चरित्र-हनन बर्दाश्त नहीं है। वो भुलक्कड़ और अहसान-फ़रामोश भी नहीं है। उसे सबका योगदान
याद रहता है। वर्ना वो जिसे एक बार लतिया देती, उसे दोबारा पुचकारती क्यों!
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