बेहाल चेन्नई का नज़ारा देखकर किसके रौंगटे नहीं ख़ड़े
होंगे! किसको दहशत नहीं हो रही होगी! कौन हमारी भ्रष्ट व्यवस्था को शुरू से अन्त
तक नहीं कोसता होगा! कौन ‘ऊपर वाले’ से रहम की भीख़ नहीं माँग रहा होगा! ये सारे काम ऐसे हैं जिन्हें
हम बख़ूबी कर सकते हैं। इसीलिए करते भी हैं। लेकिन क़ुदरत है कि सुनती ही नहीं! ये
क़ुदरत उन लोगों को सद्बुद्धि क्यों नहीं देती जिनकी लापरवाही या भ्रष्ट आचरण से
हमारा ये हाल होता है! क्या भ्रष्टचारी ‘अल्लाह के बन्दे’ नहीं होते? भगवान के भक्त नहीं हैं? क्या ये भ्रष्ट लोग हमारे-आपके मित्र-परिजन नहीं हैं? तो फिर इन्हें हमारी परवाह क्यों नहीं है? नदी-झील-तालाब-जंगल-सड़क-पटरी-फ़ुटपाथ सबको ये लोग क्यों
हड़प लेते हैं? हमें मौत के मुँह
में क्यों ढ़केल देते हैं? सिर्फ़ इसीलिए, क्योंकि हम भी उनके साथ ऐसा ही करते हैं, जहाँ भी मौक़ा पाते हैं।
बाढ़ें,
क्या पहले देश में नहीं आयीं? अति-वर्षा की ये कोई पहली घटना तो है नहीं? लाशों का ज़ख़ीरा भी कोई पहली बार तो लगा नहीं? लाखों-करोड़ों रुपये के जान-माल का नुक़सान भी पहली बार नहीं
हुआ?
तो फिर क्या ज़रूरत है कुछ और सोचने की! जिसकी मौत जिस विधि
लिखी होगी, उसे तो
उसी विधि जाना होगा! जाको राखे साईंयाँ मार सके न कोय! यही तो जीवन का अन्तिम सत्य
है। तो जब तक जियो, जहाँ जियो, दुर्गन्ध
मचाकर जियो! यही है हिन्दुस्तानियों का असली चरित्र! जितना भ्रष्ट हो सकते हो, उतना भ्रष्ट बनकर जियो! यही है हमारा
आध्यात्म-दर्शन-संस्कार और जीवन का लक्ष्य! यही है असली भारत। ऐसे ही हैं असली
भारतवासी! स्वार्थी राष्ट्र-भक्त!
इस सबमें नया क्या है? अलग क्या है? हम ये बातें ख़ूब करते हैं कि नगर नियोजन में ये ख़राबी है,
वो बीमारी है, इतना भ्रष्टाचार है? अस्पतालों को फ़लाँ रोग ने जकड़ रखा है! शिक्षा तंत्र में
ये लूट मची है! नेतागिरी में तो अन्धेर ही अन्धेर है! अबकी बार इसे बदलकर उसे
सत्ता में लाएँगे! अब वही सब ठीक करेगा! हम ख़ुद कुछ नहीं करेंगे। हमें कुछ मत
कहना! हमें अपनी दुकान के आगे अतिक्रमण करने देना। हम विद्यालय में नहीं पढ़ाएँगे, ट्यूशन या कोंचिग में भले पढ़ा लें! हम हर जगह गन्दगी
फैलाएँगे। आपको तकलीफ़ है तो हरेक व्यक्ति के पीछे सफ़ाई कर्मचारी लगा दो। हम
ट्राफ़िक के नियमों को नहीं मानेंगे। हम नाहक हॉर्न बजाएँगे। आप कर क्या लोगे? हम इतने ज़ोर से लाउडस्पीकर बजाएँगे और पटाख़े फोड़ेंगे कि
पाकिस्तान तो क्या अफ़ग़ानिस्तान तक सुनायी दे!

ऐसे ही, हम बिल्डर हैं। हमारा काम है कि जहाँ ज़मीन दिखे, उसे हथिया लो। कालोनी बना दो, मल्टी स्टोरी बना दो, मॉल बना दो। जैसे हो सके, पैसे कमाओ। वर्ना जीडीपी कैसे बढ़ेगी, प्रति व्यक्ति आय कैसे बढ़ेगी? रोज़गार कैसे मिलेगा, डिग्री कैसे मिलेगी, ग़रीबी कैसे दूर होगी? हरेक समस्या का एक ही समाधान है कि कोई मरता है तो मरे, हमारी कमाई मोटी होती रहे!
हमारा बैंक-बैलेंस बढ़ता रहे, सम्पत्तियाँ बढ़ती रहें? ज़रा सोचिए, क्या हम अपना काम ईमानदारी से करते हैं जो अन्य
लोग भी करेंगे! हिन्दुस्तान की असली बीमारी यही है।
क्यों होता है ऐसा? क्यों ये नदी के अविरल बहाव जैसा है? क्यों यही भारत का चरित्र और स्वभाव बन चुका है? इसीलिए अपनी व्यवस्था और राजनीति को भ्रष्ट
कहने से पहले कहिए, ‘हम भ्रष्ट हैं, हम चोर हैं, हम बेईमान
हैं!’ भारत को सिंगापुर या बीजिंग या न्यूयार्क कौन बना देगा? भारत को तो भारतवासी ही चला रहे हैं। जैसे हम हैं, वैसा ही हमारा
चाल-चलन है। इसीलिए कितनी ही तबाही हो जाए, हमें कोई सबक़ नहीं लेना! जब तक हम ख़ुद को बदलने के लिए
आगे नहीं आएँगे। तकलीफ़ें उठाने के लिए तैयार नहीं होंगे। तब तक हमारे देश की सूरत
नहीं बदलने वाली। हम दिनों-दिन अव्यवस्था के दलदल में और धँसते ही जाएँगे।
पाँच-सात दिन में चेन्नई का क़हर भी थमेगा ही। बारिश बन्द
होगी ही। शहर से पानी भी निकल जाएगा। महामारी भी फैलेगी। थोड़ी-बहुत राहत भी
मिलेगी। तरह-तरह की लूटपाट भी होगी। कुछ लाख करोड़ रुपये का बीमा भी मिल जाएगा।
फिर लोगों की ज़िन्दगी उसी ढ़र्रे पर लौट जाएगी, जहाँ चेन्नई के पानी-पानी होने से पहले थी! ऐसा ही देश भर
में हमेशा होता रहा है। फिर इन्तज़ार शुरू होगा अगली आपदा का। उसे भी हम वैसे ही
भुनाएँगे जैसे दालों के जमाख़ोरों और कालाबाज़ारियों ने इस बार जनता को लूटा है! जिस
रफ़्तार से हम अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं, उससे तो लगता नहीं कि सौ साल बाद भी हिन्दुस्तान सुधर
पाएगा। इससे भी बदतर दिन देखना, हमारी पीढ़ियों के नसीब में है! किसी की हिम्मत है
तो रोककर दिखा दे!
प्राकृतिक आपदाओं के वक़्त हवाई जहाज़ से जायज़ा लेने का
रिवाज़ भी ख़त्म होना चाहिए। काश! सुप्रीम कोर्ट जनहित में इस पर रोक लगा दे। सर्वेक्षण
के बावजूद लाखों-करोड़ों रुपये के नुकसान के आगे हम कुछेक सौ या हज़ार करोड़ ही तो
ढीले कर पाते हैं। इतना तो बग़ैर उड़ान भरे भी दिया जा सकता है। उड़ान में होने
वाले धन-श्रम की तो बर्बादी रूकेगी! भारत में सबसे बेचारा हमारा प्रधानमंत्री होता
है,
उसे ही देश चलाने से लेकर झाड़ू लगवाने तक की अपेक्षाओं पर
ख़रा उतरना पड़ता है। जबकि हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हरेक मसला ‘राज्यों का विषय’ है। दस-बीस दिन में चेन्नई शान्त होने लगेगा। स्कूल-कालेज, दफ़्तर-दुकान, फैक्ट्री-ऑफ़िस-ट्राफ़िक सब ‘सामान्य’ हो जाएगा। बाक़ी नगर नियोजन की
जितनी भी बीमारियाँ हैं वो सभी काँग्रेस के भ्रष्टाचार की वजह से हैं! जनता कहीं
है ही नहीं। न पहले थी, न अब है और न आगे होगी!
कभी हड़प्पा और मोहन जोदाड़ो जैसी सभ्यताओं के वंशजों की
आबादी, आज़ादी से लेकर अब तक साढ़े तीन गुना बढ़ गयी है। लेकिन ज़रा सोचिए, इस दौरान हमने कितने नये शहर बसाये और कितने ही पुराने
शहरों का अन्धा-धुन्ध विस्तार किया! यही ‘अन्धा-धुन्ध’ आज हमें तबाह कर रहा है। जबकि शहर का अर्थ ही है, एक
नियोजित बस्ती यानी A Planned
Habitation. हमें अपनों को ही लूटने के सिवाय और कोई प्लानिंग नहीं आती।
हम सीखना भी नहीं चाहते। चाणक्य फिर याद आते हैं, ‘हमें दूसरों की ग़लतियों से सीखना आना चाहिए। ख़ुद ग़लतियाँ
करके सीखेंगे तो पूरी उम्र भी कम पड़ेगी!’
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