भारत के पास पाकिस्तान से सिर्फ़ ‘बातें’ करने के सिवाय और चारा क्या है? Modi Nawaz
इतना तो साफ़ है कि नरेन्द्र मोदी सरकार ये नहीं चाहती कि उसकी
पाकिस्तान नीति के बारे में देश को ज़्यादा कुछ मालूम हो। इसमें कोई बुराई भी नहीं
है। यदि आपके पास कुछ ख़ास या सकारात्मक बताने लायक नहीं है तो फिर ढिढ़ोरा पीटने
से बचने में ही फ़ायदा है। इसीलिए सुषमा स्वराज की पाकिस्तान यात्रा और उससे पहले
बैंकाक में हुई अजीत डोभाल और नसीर जंजुआ की मुलाक़ात की मार्केटिंग नहीं की गयी। ढोल
नहीं पीटे गये। मीडिया की तो छोड़िए, सरकार के ही गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण
अंग को भी इस बात की भनक नहीं लगने दी गयी कि दोनों देशों के बीच भीतर-भीतर क्या
पक रहा है? इसमें कोई ख़ोट भी क्यों
देखा जाना चाहिए!
बीते दस दिनों की दबी-छिपी हलचलों से इतना ही संकेत मिला कि
भारत-पाक के रिश्ते अब भी वहीं नहीं अटके हैं, जहाँ अगस्त में थे। अगस्त में अजीत
डोभाल और सरताज अज़ीज़ के बीच होने वाली बातचीत की भ्रूण-हत्या हो गयी थी। लेकिन
अक्टूबर में पाकिस्तान में लेफ्टिनेंट जनरल नसीर जंजुआ को फ़ौज से रिटायर होते ही
सरताज अज़ीज़ की जगह नया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बना दिया गया। फिर दोनों देशों
के बीच खुसुर-फुसुर शुरू हुई। फ्राँस में मोदी-शरीफ़ की लघु वार्ता ने किसी को भनक
तक नहीं लगने दी कि चन्द रोज़ के भीतर ही डोभाल और जंजुआ, बैंकाक में बतियाने
लगेंगे और पीछे-पीछे विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी इस्लामाबाद की ओर क़दम बढ़ाएँगी।
कुछ ख़ुशगवार है तभी तो सुषमा वहाँ गयीं! वर्ना अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े ‘एशिया के दिल’ (Heart of Asia) नामक बहुराष्ट्रीय मंच में हाज़िरी
लगाने के लिए किसी राज्यमंत्री या अफ़सर को भी पाकिस्तान भेजा जा सकता था।
दस दिनों में भारत-पाक के शीर्ष स्तर की ये तीसरी सीधी मुलाक़ात
रहस्यमयी भले लगे। लेकिन इसे महज़ रस्म अदायगी तो नहीं माना जा सकता। अगस्त के
मुक़ाबले इतना फ़र्क़ तो आया ही है कि अब ‘आतंकवाद’ पर पाकिस्तान और ‘कश्मीर’ पर भारत बातें करने को राज़ी हुए हैं। लेकिन ये रज़ामंदी सिर्फ़ और
सिर्फ़ दोनों देशों के लोगों को भरमाने के लिए है। यही असली लेन-देन यानी ‘Give
& Take’ है। क्योंकि दोनों सरकारों के सामने जहाँ आपसी-मेलजोल
बढ़ाने और सहयोग का नया रास्ता विकसित करने की चुनौती है, वहीं भारतीयों के लिए ‘सीमापार आतंकवाद’ और पाकिस्तानियों के लिए ‘कश्मीर’ ही अब भी सबसे बड़ा मुद्दा है। फ़िलहाल, इन
दोनों शीर्षस्थ मुद्दों पर दोनों ही देशों के पास ‘बातें ही
करते रहने’ के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है।
इसीलिए, नयी रणनीति ये है कि ‘दोनों बड़े मुद्दों यानी आतंकवाद और कश्मीर को
नकारो मत। इन पर अड़ो मत। बातचीत को बहाल करो। बातें करते रहो। इसकी आड़ में अन्य
मुद्दों पर आगे बढ़ो।’ यही वाजपेयी सरकार की नीति थी। इसे ही
मनमोहन सिंह सरकार ने भी आगे बढ़ाया। अब मोदी ने भी यही रास्ता थाम लिया है।
दरअसल, दिल्ली में सत्तासीन होने से पहले मोदी ने पाकिस्तान को लेकर जैसे कठोर
तेवर दिखाये थे, सरकार में आते ही वो वही तेवर दिखाने लगे। इसी से गाड़ी पटरी से
उतर गयी। शायद, अब मोदी को भारत की पाकिस्तान नीति की पेंचीदगियाँ और सीमाओं का
सही अहसास हो गया है। ये नीति ‘दो दुनी चार’ जैसी सीधी-सपाट नहीं है। पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़, राजनीतिक सत्ता का
महज एक मुखौटा हैं। असली ताक़त सेनाध्यक्ष रफ़ील शरीफ़ के हाथों में वैसे ही है,
जैसे पिछले सेनाध्यक्षों के हाथों में होती थी। ख़ुद परवेज़ मुशर्रफ़ बड़े फ़क्र
के साथ क़बूल चुके हैं कि ‘आतंकवाद’, पाकिस्तान
की सरकारी नीति है और आतंकी पाकिस्तानी हीरो हैं।


दूसरी ओर, भारत भी अपनी कश्मीर-नीति को लेकर भारी दबाव में
रहता है। किसी भी भारतीय सरकार के लिए पाकिस्तान की माँग के मुताबिक़, कश्मीर में
जनमत-संग्रह (Referendum) के लिए
राज़ी हो पाना नामुमकिन है। फ़ारूख़ अब्दुल्ला के मशविरे के मुताबिक, नियंत्रण
रेखा को अन्तर्राष्ट्रीय सीमा का दर्ज़ा भी नहीं दिया जा सकता। क्योंकि भारत का
साफ़ मानना है कि पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से पर नाजायज़ कब्ज़ा कर रखा है।
उसे पाक-अधिकृत कश्मीर को छोड़ना ही होगा। दोनों देश 1947 से अपने-अपने इसी नज़रिये
पर अड़े हुए हैं। इसीलिए बातचीत के तमाम दौर भी झगड़े को नहीं सुलझा पाते।
पाकिस्तान का सारा अर्थशास्त्र कश्मीर से जुड़ा हुआ है। वहाँ
सेना के सारे दबदबे की जड़ में कश्मीर है। बहुसंख्यक पाकिस्तानी समाज धर्मान्ध है,
जाहिल है और ग़रीब है। सामन्तवादी ढर्रा सर्वोपरि है। ग़रीब-अमीर के बीच विकराल
खाई है। लोकतांत्रिक संस्थाओं, परम्पराओं और मूल्यों का पाकिस्तान में वैसा विकास नहीं
हो पाया, जैसी तरक्की भारत में हुई है। पाकिस्तानी सेना के वर्चस्व और निरंकुशता की
यही सबसे बड़ी वजह है। दूसरी ओर, भारतीय सेना हमेशा पूरी तरह से राजनीतिक नेतृत्व
के मातहत रही है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि जब भारत और पाकिस्तान अपने
शीर्षस्थ मुद्दों पर सिर्फ़ बातचीत करते रहने के लिए ही अभिशप्त हैं तो फिर ऐसी
क़वायद का फ़ायदा क्या?
दरअसल, दोनों देशों के बीच नियमित बातचीत जारी रहने से अन्य
मुद्दों पर सहयोग और समाधान का रास्ता खुलता है। इसे दोनों ओर की जनता के बीच आपसी
मेलजोल यानी ‘People to People Contact’ बढ़ाने के रूप में पेश किया जाता है। इसी रास्ते पर चलकर दोनों देशों ने
एक-दूसरे के साथ व्यापार का रास्ता खोला, जो शुरुआती दौर में ही है। लेकिन उधर के
ट्रक इधर आते हैं तो इधर की ट्रेन उधर जाती है। वीज़ा नियमों को आसान बनाने की
कोशिश हुई है। कच्छ सेक्टर में सर-क्रीक इलाके से जुड़े सीमा विवाद का निपटारा
करने में मदद मिली है। अन्तर्देशीय नदियों से जुड़े मसले सुलझाये गये हैं। सियाचिन
क्षेत्र में सैनिकों की संख्या को घटाने का मुद्दा भी एक अरसे से इसी क़वायद का
हिस्सा बना हुआ है। दोनों देशों के कलाकारों के बीच मेल-मिलाप बढ़ाना और क्रिकेट
कूटनीति को भी इसी नीति का हिस्सा माना गया है।
भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत होती रहे, दोनों बातचीत से
विवाद सुलझाएँ, इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है? लेकिन अगर मोदी सरकार को हर तीन महीने पर शीर्षासन करने से
बचना है तो उसे कम से कम दो काम तो करने ही होंगे। पहला, पाकिस्तान के फ़ौजी
हुक़्मरानों को बातचीत की मेज़ पर लाना होगा। इस बार नसीर जंजुआ के रूप में एक नयी
कोशिश तो दिख रही है। नसीर को जनरल रफ़ील का भरोसेमन्द समझा जाता है। दूसरा, घरेलू
मोर्चे पर कुछ पुराने मिथक या सिद्धान्तों को ख़त्म करना होगा कि आतंकवाद और
बातचीत एक साथ नहीं चल सकती। या, तीसरे देश में बातचीत करना ठीक नहीं। या, जब तक
सीमा पर गोलियाँ चलती रहेंगी, हम बात नहीं करेंगे। या, जब सीमा पर जवान मारे जा रहे हों
तो क्रिकेट नहीं खेला जा सकता। या, हुर्रियत नेताओं की पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मुलाकात
हुई नहीं कि बातचीत बन्द। साफ़ है कि मोदी सरकार को घरेलू ज़मीन पर यशवन्त सिन्हा,
शिवसेना और तमाम विपक्षी नेताओं के चिर-परिचित तेवरों का स्थायी समाधान करना होगा।
सबको बताना होगा कि भारत के पास पाकिस्तान से सिर्फ़ ‘बातें’ करने के सिवाय और चारा क्या है? पाकिस्तान तो न बातचीत बन्द कर देने से सुधरेगा और ना ही
युद्ध से!
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