अक्सर ये बात कचोटती है कि क्या भारतीय समाज अपने ज्ञान-विज्ञान
और उद्यमिता को निखारने के लिए सही दिशा में आगे बढ़ रहा है? जवाब है, ‘कतई नहीं!’ वजह है, ‘हमारी
दिग्भ्रमित नीतियाँ!’ यदि ऐसा नहीं होता तो चोटी के
वैज्ञानिकों का मायूसी भरा बयान, क्यों सामने आता! ख़्याति
प्राप्त वैज्ञानिक भला क्यों, अपनी ही जमात के सम्मेलन को ‘सर्कस’ का नाम देते! ख़ुद को कोसना कोई आसान बात नहीं होती!
मैसूर में हुए 103वें भारतीय विज्ञान काँग्रेस को एक नोबेल
वैज्ञानिक ने जहाँ सर्कस कहा, वहीं दूसरे ने सवाल किया कि ‘इन्वेंट इन इंडिया’ और ‘डिस्कवर
इन इंडिया’ से
पहले ‘मेक इन इंडिया’ कैसे हो सकता है! बहरहाल, ऐसे कोई संकेत नहीं है कि भारतीय
शासन व्यवस्था पर ऐसी मार्गदर्शक टिप्पणियों का कोई असर पड़ा हो। इसीलिए, दिल्ली
में भारी तामझाम के बीच हुए ‘स्टार्टअप’ महोत्सव से भी कई बड़े सवाल उभरे हैं।
1914 में शुरू हुए इंडियन साइंस काँग्रेस
एसोसिएशन के आज दुनिया भर में 30 हज़ार से ज़्यादा सदस्य हैं। सभी सदस्य विज्ञान
की अलग-अलग विधाओं के छोटे-बड़े वैज्ञानिक हैं। ज़्यादातर सदस्य विश्वविद्यालयों
और शोध संस्थानों से जुड़े हुए हैं। सदस्यों के अपने-अपने वैज्ञानिक क्रियाकलापों
के बारे में एक-दूसरे से चर्चा करने के उद्देश्य से ब्रिटिश वैज्ञानिकों प्रो. जे
एल साइमनसेन और प्रो. पी एस मैक्मोहन ने एसोसिएशन के सालाना जलसे की परम्परा शुरू
की थी। साल के पहले हफ़्ते में देश के किसी न किसी विश्वविद्यालय में आयोजित होने
वाले इस सबसे बड़े वैज्ञानिक विमर्श में आज़ादी के बाद से प्रधानमंत्री के ही
मुख्य अतिथि होने की परम्परा है। हरेक प्रधानमंत्री ने इस रवायत को निभाया।
लेकिन ये भी सही है कि करोड़ों रुपये के ख़र्च से होने वाले
विज्ञान काँग्रेस का आयोजन देखते ही देखते महज़ रस्म-अदायगी या परम्परा को ढोने की
क़वायद बन गया। इसकी वजह है – भारत में प्रमाणिक शोध और अनुसंधान का अकाल तथा ऐसे
माहौल की ग़ैरमौज़ूदगी जो इन्हें उकसाये और बढ़ावा दे। हालाँकि, वैदिक काल से लेकर
गुप्त काल तक भारत में क़ुदरती तौर पर कई वैज्ञानिक प्रतिभाएँ उभरीं। दुनिया को कई
वैज्ञानिक उपलब्धियाँ देने का श्रेय भी भारत को है। उस दौर में सारे शोध और
अनुसंधान स्वतःस्फूर्त और मानव सुलभ कौतूहल की देन थे। लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के
बाद इन्सान की ज़रूरतों में बहुत तेज़ी से बदलाव आया। विज्ञान और तकनीक भी
परिभाषित हुए। यानी, ऐसी प्रक्रिया जिसकी नक़ल उतारी जा सके या जिसे बारम्बार किया
जा सके, वही विज्ञान है!
पौराणिक क़िस्से-कहानियों को विज्ञान नहीं माना गया।
क्योंकि उनकी ऐसा वैज्ञानिक व्याख्या सुलभ नहीं है जिसकी नक़ल उतारी जा सके।
इसीलिए, पुष्पक विमान को हवाई जहाज़ नहीं माना गया। न ही महाभारत के संजय को
टेलीविज़न जैसी मान्यता मिली। भगवान गणेश के सिर पर हाथी का सिर जोड़ने को भी
कॉस्मेटिक सर्ज़री नहीं माना गया। कुन्ती के गर्भधारण को परखनली शिशु तकनीक का
प्रतीक नहीं माना गया!
हालाँकि, भारतीय जनमानस में ऐसे क़िस्सों को वैज्ञानिक उपलब्धियाँ बताने वालों की
भरमार है। लेकिन कदाचित, ऐसे नज़रिये ने ही हमें दुनिया से होड़ लगाकर आगे निकलने
के लिए प्रेरित नहीं किया। भारतीयों पर ये अहंकार ही हावी रहा कि हम दुनिया के
ज्ञान और आध्यात्म के गुरु हैं!
ऐसा नहीं है कि क़ुदरती तौर पर भारत में शानदार वैज्ञानिक
उपलब्धियाँ नहीं हासिल की गयीं। ऐसा भी नहीं है कि आधुनिक काल में भारत ने कई
ख़्यातिनाम वैज्ञानिक दुनिया को न दिये हों। लेकिन इस बात से भी इन्कार नहीं किया
जा सकता कि गुप्त काल से लेकर 20वीं सदी तक भारतीय का विज्ञान उपलब्धि-विहीन ही
रहा। पश्चिमी देशों के मुक़ाबले हम विज्ञान, तकनीक, शोध और अनुसंधान में काफ़ी
पीछे रह गये। आज़ादी के बाद वैज्ञानिक श्रेष्ठता हासिल करने के लिए शोध और
अनुसंधान के बड़े-बड़े संस्थान स्थापित हुए। इससे वैज्ञानिकों का काम पेशेवर बनता
गया। उन्हें नयी तकनीकों को विकसित करने का लक्ष्य और चुनौतियाँ मिलने लगीं।
वैज्ञानिकों को संरक्षण और बढ़ावा देने की नीतियाँ बनने लगीं।
भारत ने भी अंतरिक्ष विज्ञान, परमाणु ऊर्जा और सुपर
कम्प्यूटर जैसे क्षेत्रों में शानदार काम किया। लेकिन किसी भी क्षेत्र में हम दुनिया
में सबसे आगे नहीं है। हमारा कोई उत्पाद ऐसा नहीं है, जिसकी पूरी दुनिया में तूती
बोलती हो। क्योंकि हमारे यहाँ शोध और अनुसंधान का युगान्तरकारी काम नहीं हो रहा
है। आज़ादी के बाद भारत अपने वैज्ञानिक पिछड़ेपन को दूर करने की वैसी कोशिश नहीं
कर सका, जैसी हमसे अपेक्षित थी। भारतीय क्षमता का आदर करने वाले वैज्ञानिकों में
इन्हीं पहलुओं को लेकर बहुत पीड़ा है। इसीलिए, भारतवंशी नोबेल वैज्ञानिक वेंकटरमन
रामाकृष्णन ने विज्ञान काँग्रेस जैसी क़वायद को सर्कस कहा। रामाकृष्णन को 2009 में
नोबेल मिला था। वो इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में संरचनात्मक जीवविज्ञान
के प्रोफ़ेसर और प्रतिष्ठित ब्रिटिश रॉयल सोसाइटी के अध्यक्ष हैं।

रामाकृष्णन जैसे ज्ञानी, अनुभवी और प्रखर लोगों पर किसी
दुर्भावना के प्रेरित होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। वो हमें अपने भीतर झाँकने
की प्रेरणा दे रहे हैं। उन्हें गुस्सा है कि भारत वो भी नहीं कर रहा, जो वो कर
सकता है। वो दूसरों से अच्छी नीतियाँ तक तो सीख नहीं पा रहा, तो उससे भी अच्छा भला
कैसे बना पाएगा! रामाकृष्णन से
पहले चार अन्य नोबेल विजेताओं और फ़ील्ड्स मैडल नामक गणित का सर्वोच्च सम्मान पा
चुके वैज्ञानिकों ने मैसूर में ही कहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस तरह
से ‘मेक इन इंडिया’ के तहत उच्च तकनीक
वाले उत्पादों के भारत में निर्माण या उत्पादन की कल्पना कर रहे हैं वो दीर्घावधि
में तब तक असम्भव है, जब तक कि भारत, विज्ञान के बुनियादी शोध और अनुसंधान पर सतत
निवेश करके कौतूहल का समाधान ढूँढ़ने वाला माहौल बनाने के लिए तैयार नहीं होगा।
ये पाँच वैज्ञानिक हैं – 2004 में भौतिकी का नोबेल पाने
वाले कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डेविड ग्रॉस, 2011 में रसारन शास्त्र का नोबेल
पाने वाले इस्राइली वैज्ञानिक डान सेक्टमैन, 2012 में भौतिकी का नोबेल पाने वाले
फ्रांसिसी वैज्ञानिक सर्ज़ हरोके, 2012 में मेडिसिन का नोबेल पाने वाले ब्रिटिश
वैज्ञानिक जॉन गुर्डेन और 2014 में फ़ील्ड्स मैडल पाने वाले भारतवंशी गणितज्ञ
मंजुल भार्गव। डेविड ग्रॉस का बीते तीन दशकों भारतीय वैज्ञानिक समुदाय से क़रीब से
जुड़े हुए हैं। वो टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ फ़ंडामेंटल रिसर्च के तहत स्थापित
इन्टरनैशनल सेंटर फॉर थ्यूरेटिकल साइंस की सलाहकार समिति के अध्यक्ष भी है। डेविड
ग्रॉस का मानना है कि ‘सिर्फ़
वही  नयी तकनीक और उत्पाद बाज़ार में टिक
सकते हैं जो प्रकृति के रहस्यों को सुलझाने वाले शोधों और अविष्कारों पर आधारित
होंगे। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी को ‘मेक इन इंडिया’ की जगह ‘डिस्कवर, इनवेंट एंड मेक इन इंडिया’ का नारा गढ़ना चाहिए। क्योंकि जिसे हम बुनियादी विज्ञान कहते हैं, वही
आगे चलकर एप्लाइड साइंसेंस एंड टेक्नोलॉजी बनता है।’
डेविड ग्रॉस का कहना है कि भारत को सिर्फ़ ‘एसेम्बलिंग’ के ज़रिये
प्रतिस्पर्धा में नहीं लाया सकता। उसके लिए नये उत्पाद और तकनीक की ख़ोज करनी
होगी, जो विज्ञान की शिक्षा को स्तरीय बनाये बग़ैर सम्भव नहीं है। भारत के पास
प्रतिभाओं की कमी नहीं है। लेकिन जब आप दक्षिण कोरिया, चीन, अमेरिका और यूरोप की
तरह विज्ञान पर निवेश करने लगेंगे, तभी आप प्रतिस्पर्धा में आएँगे। पिछले दस साल
से विज्ञान काँग्रेस में हरेक प्रधानमंत्री वादा करते हैं कि हम शोध और अनुसंधान
का बजट बढ़ाएँगे लेकिन ये कमोबेश आज भी पहले जैसा ही है। जीडीपी का महज 0.8 फ़ीसदी! सर्ज़ हरोके का कहना है कि राजनेताओं को अल्पकालिक चुनावी फ़ायदों से अलग
हटकर ‘बुनियादी विज्ञान के विकास’ जैसे
दीर्घकालिक लक्ष्य में निवेश करना होगा। तभी तस्वीर बदल पाएगी।
इसी तरह, स्टार्टअप को दी गयी तमाम
सहुलियतों की तो तारीफ़ हो सकती है। लेकिन इसे बढ़ावा देने के लिए ग़रीब जनता से वसूले
जाने वाले टैक्स के इस्तेमाल की आलोचना भी हो रही है। क्योंकि स्टार्टअप्स के लिए
वेंचर कैपिटल का बहुत विकसित विकल्प पहले से मौजूद है। स्टार्टअप में रक़म डूबने
का भी बहुत जोख़िम रहता है। रक़म डूबी तो उद्यमी से ज़्यादा नुकसान सरकारी ख़ज़ाने
का होगा। भारत में इन दिनों जिस तरह के स्टार्टअप की बाढ़ आयी हुई है, उसका सबसे
कमज़ोर पहलू ये है कि ज़्यादातर मामलों की बुनियाद कोई वैज्ञानिक ख़ोज़ नहीं है। सिर्फ़
सर्विस सेक्टर वाले एप्स की धूम है। वैसे इसमें कोई ख़राबी नहीं है। लेकिन इससे
भारत दुनिया में अपनी धाक शायद ही जमा सके। बहरहाल, काश! इन आलोचनाओं को हमारी व्यवस्था राष्ट्रीय
सरोकार के रूप में देख पाती।
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