सावधान! ज़रा देखिए, कहीं सत्ता में बैठे लोग आपकी जेब तो नहीं तराश रहे..! 1614 580x395

शायद ही कोई ऐसा
परिपक्व व्यक्ति हो, जिसका कभी जेबक़तरों से वास्ता न पड़ा हो। यानी, जेबक़तरों के
बारे में तक़रीबन हरेक शख़्स के पास निजी अनुभव है। फिर भी ज़रा सोचिए, जेबक़तरा
कैसे काम करता है? ‘हाथ
की सफ़ाई’ क्या होती है? जादू भी तो
हाथ की सफ़ाई ही है, तो क्या उसे जेबतराशी माना जा सकता है?
बेशक, ये सब अलग-अलग बातें हैं। इसीलिए सबकी व्याख्याएँ भी अलग हैं।
‘हाथ की सफ़ाई’ एक उम्दा मानवीय कौशल
है। सिक्के के दो पहलुओं की तरह ‘जादू’
और ‘जेबतराशी’ इसी के दो रूप हैं। ‘हाथ की सफ़ाई’ का सकारात्मक चेहरा ‘जादू’ के रूप में अचम्भित करके हमारा मनोरंजन करता
है। जबकि नकारात्मक स्वरूप के तहत ‘जेबतराशी’ चोरी-छिपे और धोखा देकर हमारी सम्पत्ति को हड़पती है। हमें दुःखी करती
है। कई बार तबाह भी करती है।
जेबक़तरे हमारा ध्यान
भटकाकर अपना काम करते हैं। भीड़भाड़ वाली जगह इनके लिए सबसे मुफ़ीद होती है। मौके का
फ़ायदा उठाना इनका शग़ल होता है। नाजायज़ ढंग से हमारे सामान को हड़पना इनका मक़सद
होता है। जेबक़तरे कम से कम दो लोगों के दल के रूप में काम करते हैं। एक असामान्य
धक्का-मुक्की करके हमारी नज़र को भटकाता है तो दूसरा इसी मौके को ताड़कर हमारी जेब
तराश देता है। कई बार जेबक़तरों का गिरोह हमारे सामान को आपस में ही एक-दूसरे को
सरका देते हैं। ताकि यदि किसी पर आपको शक़ हो तो भी उसके पास से आपका सामान बरामद
नहीं होगा। इसी तरह, यदि आपने किसी जेबक़तरे को रंगे-हाथों पकड़ लिया तो उसके अन्य
साथी उसे निकल भागने में सहयोग देंगे। मार-पिटाई की नौबत आयी तो यही साथी उसका
बीच-बचाव करेंगे। इसी दौरान, आपके पर्स वग़ैरह से उन चीज़ों को निकालकर फेंक दिया
जाएगा जिससे हड़पे गये सामान से आपका वास्ता तय होता हो।
सावधान! ज़रा देखिए, कहीं सत्ता में बैठे लोग आपकी जेब तो नहीं तराश रहे..! khalid 300x221अब ज़रा ये समझिए कि सत्ता
में बैठे लोग कहीं आपकी उस सम्पदा को तो नहीं हड़प रहे जिसका ताल्लुक आपकी
रोज़ी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे बुनियादी मुद्दों से है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘राष्ट्रवाद’ की आड़ में कोई आपको फ़ालतू या कम
गम्भीर मुद्दों की भीड़ में उलझाकर आपके सरोकारों की जेबतराशी करने की फ़िराक़ में
हो? यदि ऐसा है तो ये समझिए कि आपके ईर्द-गिर्द खड़ा वो कौन
है जो आपका ध्यान असली मुद्दों से भटकाना चाहता है, ताकि
उसके कुछ साथी आपके सरोकारों की जेबतराशी कर सकें? ऐसे
जेबतराश कौन हो सकते हैं? उनका क्या मंसूबा हो सकता है? फ़िलहाल, राजनेता के रूप में यही जेबतराश हमें जेएनयू से उठे गुबार में
उलझाये रखना चाहते हैं। 

देश में शायद ही कोई
ऐसा महत्वपूर्ण व्यक्ति हो जिसने जेएनयू में हुई राष्ट्रविरोधी नारेबाज़ी का
समर्थन किया हो। यानी, जिस घटना की चौतरफ़ा निन्दा और भर्त्सना हो चुकी है, जिसमें
क़ानून ने अपना काम किया है, क़ानून को ही जिसे आगे भी बढ़ाना है, क़ानून को ही
इसकी कमी-बेसी को दुरुस्त भी करना है। तो फिर वो लोग कौन हैं जो लगातार ‘चींटी मारने के लिए तोप चलाने’ की बातें करने पर आमादा हैं? उन लोगों का मक़सद
क्या है जो किसी न किसी झूठ के बहाने कम महत्वपूर्ण मुद्दे को लगातार गरमाये रखना
चाहते हैं? वो लोग कौन हैं जो हाथ में तिरंगा थामे, भारत
माता की जयजयकार करते हुए सड़कों पर घूमकर लोगों को ‘राष्ट्रवादी’ या ‘राष्ट्रद्रोही’ होने का
सर्टिफिकेट बाँधने की मुहिम पर निकले हुए हैं? कहीं यही लोग
तो वो जेबक़तरे नहीं, जो आम जनता से उसके सरोकारों वाले मुद्दों पर बहस और चर्चा
के मौकों को हड़पने वाली जेबतराशी कर रहे हैं?

मेरे एक मित्र ने
फ़ेसबुक पर लिखा, ‘यदि भारत माता के नाम पर वकीलों से पिट रहे पत्रकारों के साथ खड़ा होना
ग़ुनाह है तो मैं ‘राष्ट्रद्रोही’ हूँ।’ दूसरे मित्र ने लिखा है, ‘देशद्रोही शक्तियों से
कोई समझौता नहीं होना चाहिए। बिल्कुल नहीं। लेकिन जो गुंडे पत्रकारों पर हमला कर
रहे हैं, वो भी देशद्रोही जैसे हैं। इन्हें भी फ़ौरन पकड़ें।’ तीसरे मित्र लिखते हैं, ‘आजकल सारे मीडिया से डर
लगता है। कोई फ़ेसबुक पर दूसरे को ग़ाली और धमकी दे रहा है तो कोई ट्वीटर,
व्हाट्सअप और इंस्टाग्राम पर। यहाँ तक कि यूट्यूब भी जेएनयू से सम्बन्धित वीडियो
ही सुझाता (Suggest) है। और, अपने न्यूज़ एंकर्स – कोई अपना
गला फाड़कर ‘नेशन वान्ट टू नो’ का राग
आलाप रहा है तो दूसरा ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की दुहाई दे रहा है। ऊपर से एक ‘महारानी’ अपनी बिरादरी की पित्त और अग्नाशय (Bile & Pancreas) की शक्तियों के ज़रिये राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रही हैं। ऐसा लगता है कि ये
नहीं होते तो मेरा इंडिया, ‘ब्लैकहोल’
हो गया होता। और, अपने नेतागण… इनकी तो सोते-जागते सिर्फ़ एक ही वाणी है…
सत्यमेव जयते। और, ज़ुबानी दस्त (Verbal
Diarrhea) से पीड़ित दिल्ली के मुख्यमंत्री के बारे
में तो क्या कहें… यार बस करो, बहुत बचा लिया भारत माता को। क्या भारत में और
कोई मुद्दा ही नहीं बचा? भगवानजी अब तो रिसेट (Reset)
बटन दबा दो, प्लीज़…।’

चौथे मित्र ने पूरे
प्रसंग को तार-तार कर दिया। उन्होंने लिखा, ‘मुट्ठीभर कश्मीरी कार्यकर्ताओं ने जेएनयू में जो पाक-समर्थित और भारत
विरोधी नारेबाज़ी की है, वो निश्चित रूप से निन्दनीय है। हालाँकि, ये आलम श्रीनगर
और कश्मीर घाटी का एक नियमित वाकया है। लेकिन मौजूदा हल्ला-बोल की बदौलत राजनीतिक
सत्ता ने बड़ी चतुराई से देश का ध्यान अन्य बेहद महत्वपूर्ण मुद्दों से भटका दिया
है। ये मुद्दे हैं – बेरोज़गारी, ग़रीबी, किसानों की समस्याएँ, आर्थिक मन्दी और आम
आदमी की रोज़मर्रा की समस्याएँ। पूरे देश को इस गरमा-गरम बहस में उलझाया जा रहा है
कि कौन औरों से बड़ा देशभक्त है। मानों सभी एक-दूसरे से पूछ रहे हों कि भला, उसकी
साड़ी मेरी साड़ी से ज़्यादा सफ़ेद क्यों! ये पूरी बहस ही
निरर्थक और अनावश्यक है। समय, श्रम और दिमाग़ की बर्बादी है।

देशभक्ति के नाम पर
वकीलों की महिला पत्रकारों से की गयी हाथापाई, निश्चित रूप से किसी सभ्य समाज की
निशानी नहीं है। जो लोग नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती
हैं, उन्हें इस शर्मनाक और अप्रिय घटना की निन्दा करनी चाहिए। देश के सामने रेलवे
और आम बजट है। हमें अपने क़ीमती वक़्त को ऐसे मुद्दों पर नहीं बर्बाद करना चाहिए
जिन्हें अनावश्यक रूप से तूल देकर विकराल बनाया गया है। हमें यही ऊर्जा कुछ सार्थक
राष्ट्रीय मुद्दों की चर्चा में लगाना चाहिए। अन्त में, बक़ौल अमेरिकी डेमोक्रेट
एडलाई स्टेवेंशन, ‘भावनाओं का क्षणिक और उन्मादी प्रदर्शन ‘देशभक्ति’ नहीं हो सकता। ये तो जीवन भर के शान्तिपूर्ण
और सतत समर्पण से पैदा होता है।’

चार मित्रों के ये विचार हमें बहुत कुशलता से समझा रहे हैं कि कौन, कैसे, कब
और कहाँ हमारी जेब तराश रहा है? अब
ये हमें तय करना है कि हम ख़ुद को जेबतराशों से कैसे सुरक्षित रखें! मज़े की बात ये है कि सत्ता-पक्ष के जो मठाधीश ये समझ रहे हैं कि ऐसे खोखले
मुद्दों से वो अपनी सियासत चमका लेंगे, उनका भ्रम पाँच राज्यों में होने वाले
विधानसभा चुनावों के वक़्त वैसे ही टूट जाएगा, जैसे कि कुछ महीने पहले बिहार में ‘बीफ़ राजनीति’ और ‘आरक्षण की
समीक्षा’ का शिगूफ़ा खेत हुआ था! बीजेपी,
शायद अब भी ये नहीं समझ पायी है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के मुद्दों की ताक़त
अलग-अलग होती है। वो अब भी बाँटने वाली विपक्षी मानसिकता के भरोसे है। जबकि सत्ता
पक्ष की पहचान जोड़ने वालों की बननी चाहिए। जेबतराशी का एक चेहरा ये भी है।
ट्विटर और फेसबुक पर हमसे जुड़ें: सावधान! ज़रा देखिए, कहीं सत्ता में बैठे लोग आपकी जेब तो नहीं तराश रहे..! facebook16 10  सावधान! ज़रा देखिए, कहीं सत्ता में बैठे लोग आपकी जेब तो नहीं तराश रहे..! twitter bird 16x16 10