2015 में लगे कई चुनावी झटकों की वजह से बीजेपी ‘फूट डालो, राज करो’ की विध्वंसक नीति पर चल निकली है। इसकी वजह ये है कि 2014 में जिस ‘मोदी लहर’ ने इतिहास रचा, वो धूमकेतू की तरह बेहद अल्पायु वाली साबित हुई। बीजेपी और संघ परिवार में अज़ीब तरह की बदहवासी है। क्योंकि जहाँ ‘विकास’ और ‘गुजरात मॉडल’ की डुगडुगी बजाने से ‘मोदी लहर’ बनी थी, वहीं काँग्रेसी राज के भ्रष्टाचार को लेकर पनपी नकारात्मकता का भी इसमें बड़ा योगदान था। बीजेपी के गुरुकुल यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिन्तकों और विचारकों को मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बन रहे मायूसी भरे माहौल का अहसास बहुत पहले हो गया था। तभी तो जीत के घमंड में डूबे बीजेपी के नेताओं को 10 अगस्त 2014 को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भुवनेश्वर में आगाह किया था।

तब मोहन भागवत ने कहा, ‘कुछ लोग बोल रहे हैं कि पार्टी को सफलता मिली। कुछ लोग बोल रहे हैं कि किसी व्यक्ति को जीत मिली। लेकिन व्यक्ति या पार्टी या संगठन की वजह से ये परिवर्तन नहीं हुआ। आम आदमी ने परिवर्तन चाहा। व्यक्ति और पार्टी तो पहले भी थे तो पहले परिवर्तन क्यों नहीं हुआ? जनता परिवर्तन चाहती थी। इसीलिए जनता ख़ुश नहीं रही तो अगले चुनाव में ये सरकार भी बदल जाएगी। पहले भी राजनीतिक बदलाव तभी हुए जब जनता ने चाहा। भविष्य में भी यही होगा। कभी राजा ये तय करता था कि राज कैसा होगा? आज जनता तय करती है कि राजा कौन होगा? जनता यदि नाराज़ होगी तो विद्रोह बढ़ेगा।’ भागवत का ये बयान प्रधानमंत्री मोदी के एक दिन पुराने उस बयान के सन्दर्भ में था जिसमें मोदी ने अमित शाह को ‘मैन ऑफ़ मैच’ बताया था।

इसके बाद संघ ने ‘विकास’ की आड़ में ‘हिन्दुत्व के एजेंडे’ को परवान चढ़ाने की रणनीति बनायी। ये प्रचारित किया गया कि जिन 31 फ़ीसदी लोगों ने नरेन्द्र मोदी के ‘विकास’ के एजेंडे को तरज़ीह दी है, उन्होंने ‘हिन्दुत्व के एजेंडे’ के प्रति भी हामी भरी है। हालाँकि, संघ जानता है कि ये सच नहीं है। लेकिन वो इसे ही सच के रूप में पेश करना चाहता है। मौजूदा रणनीति भी यही है कि जनता ‘विकास’ और ‘हिन्दुत्व’ को न सिर्फ़ एक समझे, बल्कि इसे एक-दूसरे का पूरक भी माने। यानी, यदि देश को ‘विकास’ चाहिए तो वो ‘हिन्दुत्व’ की बदौलत ही मुमकिन है। ‘विकास’ के लिए जहाँ साल 2014 बहुत शानदार रहा, वहीं ‘हिन्दुत्व’ के लिए साल 2015 बहुत ही ख़राब रहा। ‘हिन्दुत्व’ के हरेक फ़ितूर को जनता ने नकार दिया। फिर चाहे बात लव-ज़िहाद की हो या घर-वापसी की या बीफ़ की या असहिष्णुता की या फिर आरक्षण की समीक्षा की। संघ को इन सभी मोर्चों पर नाकामी ही हाथ लगी।

लेकिन इन्हीं नाकामियों के दौरान ही एक क़ामयाबी भी हाथ लगी। संघ-परिवार, देश को बौद्धिक रूप से ऐसे दो हिस्सों में बाँटने में सफल रहा जिसे आसानी से ‘राष्ट्रभक्त या देशप्रेमी’ और ‘राष्ट्रविरोधी या देशद्रोही या गद्दार’ के रूप में पेश किया गया। इससे भी बड़ी बात ये रही कि ‘राष्ट्रभक्तों’ ने अपने हाथ में अघोषित रूप से ये शक्ति ले ली कि ‘राष्ट्रभक्ति का सर्टिफ़िकेट’ सिर्फ़ वही बाँटेंगे! संघवंशियों ने 2015 में हुए हरेक चुनाव में इस सर्टिफ़िकेट को पाने के लिए बीजेपी को वोट देने की शर्त जोड़ दी। लेकिन इससे भी हिन्दुत्ववादियों की दाल नहीं गली। ऐसा क्यों हुआ? यदि हम इस सवाल का जबाव समझ लेंगे तो हमारे लिए मौजूदा दौर की जटिलताओं को समझना मुश्किल नहीं होगा।

संघ परिवार चाहता है कि उसके पिटारे में 30-32 फ़ीसदी कट्टरवादी या अनुदार हिन्दू वोट स्थायी रूप से जुड़ जाएँ। यही संघ का  जन्मजात सपना रहा है। 2014 में बीजेपी को जो वोट मिले उसका बहुत बड़ा हिस्सा उस सत्ता-विरोधी मनोदशा (Anti Incumbency Sentiments) का था जो यूपीए-2 के दौरान सामने आये तरह-तरह के घोटालों से पनपा था। तब जनता को नरेन्द्र मोदी के वादों-नारों में उम्मीद की नयी किरण दिखी थी। यही ‘मोदी लहर’ बनी। इसने काँग्रेस को ऐतिहासिक निम्न तो बीजेपी को ऐतिहासिक शीर्ष स्तर पर पहुँचा दिया। लेकिन मोदी के वादों-नारों की ख़ुमारी 2014 तक ही रही। 2015 में जनता का उससे मोहभंग होने लगा। ज़ुमलों की पोल खुलने लगी। वादों का ख़ोखलापन और उनके पीछे छिपी राजनीति जनता को दिखने लगी।

दरक़ती राजनीतिक ज़मीन को मुट्ठी में रखने के लिए सोशल मीडिया पर विरोधियों का चरित्र हनन करने के लिए झूठ, फ़रेब, मनगढ़न्त दुष्प्रचार वग़ैरह का सहारा लिया गया। इसने उन लोगों को बहुत मायूस किया जो मूलतः हिन्दुत्ववादी नहीं थे, हालाँकि उन्होंने 2014 को मोदी को वोट दिया था। क्योंकि धीरे-धीरे राजनीतिक विरोधियों से हटकर आम लोगों को निशाना बनाने की शुरुआत हुई। इसने मीडिया का भी विभाजन कर दिया। भक़्त मीडिया और आलोचक मीडिया। जल्दी ही आलोचक मीडिया को राष्ट्रद्रोही मीडिया का सर्टिफ़िकेट भी बाँट दिया गया। राष्ट्रभक्तों ने जनता की नब्ज़ टटोलने के बजाय हर उस व्यक्ति को पहले राष्ट्रविरोधी, फिर बिकाऊ मीडिया, फिर काँग्रेस और वामपन्थियों का दलाल, फिर पाकिस्तानी, फिर गद्दार कहना शुरू कर दिया जिन्हें ‘विकास’ में कमी दिख रही थी। जो सरकार को उसके वादों-इरादों की याद दिला रहे थे। इससे संघवंशी ऐसे बौख़लाये कि उन्होंने लक़ीर ख़ींच दी कि जो मोदी या बीजेपी या संघ के साथ नहीं है वो राष्ट्रद्रोही है।

ये बहुत बड़ा बदलाव है। क्योंकि ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत बड़ी है, जिन्होंने मोदी के ‘विकास’ को तो वोट दिया था लेकिन उनके अघोषित ‘हिन्दुत्व’ को नहीं। इन लोगों को ‘राष्ट्रद्रोही’ कहे जाने से उनके क़रीबी भी हिन्दुत्ववादियों से ख़फ़ा होने लगे। बिहार चुनाव में मुँह की ख़ाने के बाद संघवंशियों की नयी रणनीति दलितों और पिछड़ों को सबक सिखाने की बनी। ये भी तय हुआ कि शिक्षण संस्थाओं में पल रहे दलितों और पिछड़ों के नेतृत्व को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की बदौलत अपनी मुट्ठी में लिया जाए। जहाँ विरोध हो, वहाँ केन्द्र सरकार से परोक्ष मदद ली जाए। जो विद्यार्थी परिषद के सुर में सुर न मिलाये उसे ‘राष्ट्रद्रोही और गद्दार’ का सर्टिफ़िकेट दे दिया जाए। इसी पटकथा ने हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में ‘अनुकूल’ नतीज़े दिये। समाज वैसे-वैसे दो-फाड़ होने लगा जैसा सोचा गया था।

कन्हैया की गिरफ़्तारी और रिहाई, पटियाला हाउस कोर्ट में वकीलों का उपद्रव, कन्हैया को अन्तरिम ज़मानत देने वाले आदेश और हरियाणा में लगी जाट आन्दोलन की आग ने कहानी में नये मोड़ भी पैदा किये। जेल से आने के बाद मीडिया
ने कन्हैया को जैसे नायक की तरह देखा, उससे भी संघवंशियों के हौसले बुलन्द हैं। उन्हें लगता है कि पाँच राज्यों के चुनाव में ‘राष्ट्रवादी उन्माद’, बीजेपी का कायाकल्प कर देगा। कन्हैया के मामले में जिन लोगों को ये लगा कि सरकार ‘चींटी मारने के लिए तोप’ चला रही है, उन्हें तो राष्ट्रवादियों ने गद्दारों के सरगना का ख़िताब बाँटना शुरू कर दिया। ये समाज को बुरी तरह से बाँटने की क़वायद है। क्योंकि काँग्रेस जहाँ मुसलिम तुष्टिकरण के आरोपों से घेरी जाती रही है, वहीं संघियों पर आरोप लग रहा है कि वो ‘फूट डालो, राज करो’ वाली उस नीति पर चल पड़ी है, जिससे अँग्रेज़ों ने भारत को ग़ुलामी में जकड़ रखा था।

अब तक जो संघवंशी मुसलमानों को काटने की बातें करते थे, अब वो हिन्दू राष्ट्रद्रोहियों और गद्दारों का भी सिर क़लम करने के लिए इनाम घोषित करने लगे हैं। साफ़ है कि अब हिन्दू समाज भी दो-फाड़ हो गया है। एक वो जो विकास, हिन्दुत्व, मोदी और राष्ट्रवाद के साथ हैं और दूसरा वो, जिन्हें ये लोग अपने जैसा मानने का सर्टिफ़िकेट नहीं दे रहे हैं। क्योंकि राष्ट्रभक्तों की नज़र में ‘गद्दार हिन्दू’ भी देश में मुसलमानों की तरह ही अवांछनीय हैं। भारत के मौजूदा माहौल और 1947 के बाद वाले पाकिस्तान से बहुत समानता है। पाकिस्तान में भी पहले हिन्दुओं का सफ़ाया किया गया। अब उन मुसलमानों का क़त्लेआम होता है जो कट्टरपन्थी मुसलमान नहीं हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या राष्ट्रभक्तों का इरादा भारत में भी ‘हिन्दू ISIS’ या ‘हिन्दू तालिबान’ जैसा माहौल बनाने का है? यही भारतीय समाज का विभाजन है। भले ही आपको यक़ीन हो या न हो! फिलहाल, बोलिए ‘भारत माता की जय’ और ‘भारत माता के कपूतों का नाश हो!’

 

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