अमेरिका ऐसी महाशक्ति है जो अपने फ़ायदे के लिए जितनी शिद्दत
से अन्तर्राष्ट्रीय नियम-क़ायदों को बनवाता है
, उतनी ही आसानी से उसमें
रद्दोबदल करने के लिए राज़ी भी हो जाता है। अमेरिका के लिए राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
है। इसी से उसकी नैतिकता परिभाषित होती है। इतिहास गवाह है कि उसके राष्ट्रीय हित
भी अलग-अलग दौर में बदलते रहे हैं। इसीलिए जो बातें उसके राष्ट्रीय हितों से मेल
नहीं खातीं
, उसमें उसे कोई नैतिकता
नहीं दिखती। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने में अमेरिका
को अपना कोई राष्ट्रीय हित नहीं दिखा, इसीलिए ये नैतिक और तार्किक माँग दशकों से
अटकी पड़ी है। लेकिन जब बात अमेरिकी व्यापारिक हितों की हो तो उसका रवैया बेहद
उदार और लचीला हो जाता है।
2009 में परमाणु क़रार को लेकर भारत के प्रति अमेरिका ने ऐसी
ही उदारता दिखायी थी। तब अमेरिका ने एक ओर भारत की परमाणु नीति के अप्रसार से
जुड़े पहलुओं को मान्यता दी, तो दूसरी ओर उसका इरादा परमाणु ऊर्जा उत्पादन से
जुड़ी अमेरिकी कम्पनियों के लिए भारत को एक प्रमुख व्यापारिक सम्भावना के रूप में पेश
करने का भी था। इसीलिए तब अमेरिका ने भारत को परमाणु अप्रसार सन्धि (
NPT) से
नहीं जुड़े होने के बावजूद वो सहूलियत दी थी, जो किसी ग़ैर-एनपीटी देश को नहीं मिली
है। उसी कड़ी में अब भारत को नाटो के सदस्य देशों जैसा दर्ज़ा देने की तैयारी है। परमाणु
क़रार की तरह इसके लिए भी अमेरिकी काँग्रेस (संसद) से मंज़ूरी लेने के लिए बाक़ायदा
एक प्रस्ताव पेश किया गया है।
इस प्रस्ताव को अमेरिका-भारत रक्षा तकनीक और साझेदारी क़ानून
(
US-India
Defense Technology and Partnership Act
) में संशोधन के लिए पेश
किया। इसे भारतीय मामलों की उपसमिति (
House India Caucus) के उपप्रभारी सांसद
जॉर्ज होल्डिंग ने पेश किया, ताकि भारत को नाटो (
North Atlantic Treaty
Organization) देशों जैसे साझेदारों की तरह हथियारों और रक्षा
तकनीक़ की ख़रीदारी में बराबरी का दर्ज़ा दिया जा सके। प्रस्तावित संशोधन को
काँग्रेस की मंज़ूरी मिलने के बाद अमेरिका की नज़र में भारत को उन 28
देशों के समकक्ष माना
जाएगा जो नाटो संधि से परस्पर जुड़े हुए हैं। जिन्हें अमेरिका से रक्षा तक़नीक और
हथियार वग़ैरह ख़रीदने में कम झंझट झेलनी पड़ती है।
कहने को तो ये क़वायद भारत-अमेरिकी रक्षा सहयोग और आपसी हितों
को बढ़ावा देने के इरादे से की जा रही है। लेकिन इसका असली मक़सद अमेरिकी रक्षा
उद्योग को सहूलियत देने का ज़्यादा है और भारत को
‘दोस्ती का
तोहफ़ा’ देने का कम! भारत से दोस्ताना ताल्लुक़ात रखने को
लेकर अमेरिका की नज़र हमेशा व्यावसायिक ही रही है। इसीलिए वो हमारे तमाम ऐतराज के
बावजूद पाकिस्तान को सैनिक सहायता देता रहा है। अभी पिछले महीने ही अमेरिका से
ख़बर आयी थी कि उसने
पाकिस्तान
को आठ F16 लड़ाकू विमान देने का फ़ैसला कर लिया है।
कौन नहीं जानता कि F16 लड़ाकू विमानों से पाकिस्तान अपने आँगन में फल-फूल रहे
आतंकवाद से लड़ेगा या वक़्त आने पर भारत के ख़िलाफ़ ही उसका इस्तेमाल होगा! इससे बड़ा ढोंग और क्या हो सकता है कि एक
ओर अमेरिका दुनिया से आतंकवाद मिटाने की बात करता है और दूसरी ओर पाकिस्तान में चल
रहे आतंकवादी कारख़ानों को ‘कुपोषण’ से
बचाने के लिए वहाँ की सरकार को 70 करोड़ डॉलर की फ़ौजी मदद देता है। ये कोई अनोखी
बात नहीं थी। अमेरिकी दोगलेपन के क़िस्सों से इतिहास अटा पड़ा है। लेकिन इसमें भी कोई शक़
नहीं कि भारत को नाटो देशों जैसा दर्ज़ा देने की पहल ये बताती है कि पुराना दौर अब
नहीं रहा!
अमेरिकी रक्षा सचिव एस्टन कॉर्टर अगले महीने भारत आने वाले
हैं। निश्चित तौर पर, भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के नाम पर दोनों देशों के बीच कई संवेदनशील
क़रार होंगे। ताकि अमेरिका के रक्षा उपकरणों और हथियारों के निर्माण से जुड़ी
कम्पनियों को नया धन्धा मिल सके। अमेरिकी व्यापार और क़माई बढ़ सके। इसीलिए एस्टन
कॉर्टर के आगमन से पहले
Arms Export Control Action में संशोधन किया जा रहा
है। दरअसल, भारत में हथियार ख़रीदने की प्रक्रिया में कई बार अमेरिकी कम्पनियों को
झटका झेलना पड़ा है। भारतीय रक्षा ख़रीद के लिए होने वाले
‘ग्लोबल
टेंडरों’ में अमेरिकी कम्पनियाँ अक्सर पिट जाती हैं। क्योंकि
इज़राइल, फ्राँस, रूस तथा तमाम यूरोपीय निर्माताओं के मुक़ाबले अमेरिकी सामान की
हल्की क्वालिटी का दाम ज़्यादा होता है।
इसीलिए, अमेरिका ने अपनी हथियार निर्माता कम्पनियों की मदद
करने के लिए क़ानून को संशोधित करने का रास्ता चुना है। अमेरिकी कम्पनियों की ये
शिकायत थी कि उन्हें भारत से सौदा करते वक़्त अपने ही देश में बहुत सारी मंज़ूरी
की ज़रूरत पड़ती है। इसमें ख़ासा वक़्त लगता है। लिहाज़ा, अमेरिकी सरकार इस समस्या
को ख़त्म करवाये। इसी ज़रूरत को पूरा करने के लिए संसदीय समिति ने प्रस्ताव रखा कि
भारत को नाटो जैसा
‘मित्र देश’ का दर्ज़ा
दिया जा सकता है। नाटो का हिस्सा नहीं होने के कारण भारत ऐसी हैसियत का हक़दार
नहीं हो सकता। इसीलिए, अब क़ानून बनाकर भारत का ‘स्टेटस’ बदला जा रहा है। इससे भारत को झुनझुना थमाया जाएगा कि अमेरिका की नज़र
में उसकी हैसियत ऊँची हुई है!
दरअसल, बीते एक दशक में भारत और अमेरिकी के बीच आर्थिक सहयोग
ने नयी बुलन्दियाँ हासिल की हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा व्यापार अब 14 अरब डॉलर
से ऊपर है। जबकि दस साल पहले ये 30 करोड़ डॉलर था। अमेरिका अच्छी तरह जानता है
कि  पाकिस्तान को लगातार मिलती रही अमेरिकी
सैनिक सहायता को लेकर भारत में बहुत नाराज़गी रहती है। इसीलिए अमेरिकी काँग्रेस
में संशोधन लाते वक़्त सांसद जॉर्ज होल्डिंग ने ऐसी बातें भी कहीं, जिससे भारतीय
ख़ुश हो सकें। होल्डिंग ने पाकिस्तान को
F16 लड़ाकू विमान देने के ओबामा प्रशासन के फ़ैसले पर ऐतराज़
जताया कि ‘मैं नहीं जानता कि
ऐसी बिक्री से हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा या दक्षिण एशिया की सुरक्षा या हमारे
साझेदारों में से किसे फ़ायदा होगा? सवाल ये भी है कि
पाकिस्तान ने ऐसा क्या आचरण किया है जिससे ये माना जाए कि उसे अमेरिकी करदाताओं के
पैसों से मदद करना ज़रूरी है? इसीलिए, मैंने ऐसे रक्षा सौदों
का हमेशा विरोध किया।’
अमेरिकी बयानबाज़ी जो
भी हो लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त किसी से छिपी नहीं है। ऐसा नहीं है कि भारतीय
रणनीतिकारों को अमेरिका के दोमुँहेपन का अहसास नहीं है। इसीलिए नाटो के सदस्य देश
जैसे दर्ज़े को लेकर भारत ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। वैसे भी नाटो की असली ताक़त
उसके उस मसौदे में है जो कहता है कि किसी भी नाटो देश पर होने वाला हमला सभी सदस्य
देशों पर हमला माना जाएगा। अब चूँकि भारत, नाटो का सदस्य नहीं है, इसीलिए महज़ नाटो
का दर्ज़ा हमारे लिए तोहफ़ा नहीं हो सकता। ये विशुद्ध रूप से अमेरिका अपना
हित-साधने के लिए ही कर रहा है। अलबत्ता, इससे हमें कोई नुक़सान नहीं है। फ़ायदा
सिर्फ़ इतना हो सकता है कि परमाणु क़रार के बाद इस दर्ज़े से पाकिस्तान कुछ
भुनभुनाये। लेकिन उसकी भुनभुनाहट भी तो ढोंग ही होती है।
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