उत्तराखंड में विवादित
संवैधानिक प्रक्रिया और क़ानून की अटपटी व्याख्याओं की ऐसी झड़ी लगी है जो बीते दो
हफ़्ते से थमने का नाम ही नहीं ले रही। वहाँ का राजनीतिक तमाशा अभी कम से कम एक
हफ़्ते तो और चलेगा ही। लेकिन जैसे-जैसे सारा घटनाक्रम हुआ है उसने देश की राजनीति
को शर्मसार ही किया है। अभी तक के तमाशे में बीजेपी और केन्द्र सरकार का पलड़ा
भारी है। लेकिन उसकी मार्कशीट में दिख रहे ज़्यादा अंक बुद्धिमत्ता और योग्यता के
नहीं, बल्कि नक़ल करके ज़्यादा अंक पाने वाले छात्र की अनैतिक क़ाबलियत जैसी है।
राजनीति में हमेशा से तमाम अनैतिक व्यवहार होता रहा है। हरेक पार्टी इसे करती रही
है। लेकिन लोकलाज़ की ख़ातिर काफ़ी बातें पर्दे में रहती थी। उत्तराखंड में सारी
राजनीति इतनी बेपर्दा हो गयी कि उसका वीभत्स चेहरा अब हमारे सामने है।
राजनीति में
दाँव-पेंच, खींच-तान, उठा-पटक और जीत-हार उतनी ही सहज है जितनी ज़िन्दगी की किसी
भी प्रतियोगिता या खेल में हो सकती है। हर खेल को मर्यादित रखने के लिए नियमों से
बाँधा गया है। राजनीति के लिए भी ढेरों नियम हैं। लेकिन उत्तराखंड में न सिर्फ़
तमाम नियमों की धज़्ज़ियाँ उड़ गयीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं जैसे राज्यपाल,
विधानसभा अध्यक्ष, केन्द्रीय मंत्रीमंडल, संसद, राष्ट्रपति और न्यायपालिका की
गरिमा और प्रतिष्ठा पर भी आँच आयी। सिर्फ़ इसलिए कि अलग-अलग स्तर पर नियमों का आदर
नहीं किया गया। वर्ना दलबदल, बाग़ी, जोड़-तोड़, ख़रीद-फ़रोख़्त और तख़्ता-पटल की
घटनाएँ पहले भी कोई कम नहीं हुई हैं। इसमें कोई शक़ कि ये सब कुछ एक सर्ज़री की
तरह है, जिसमें ख़ून का बर्बाद होना स्वाभाविक है। उम्दा सर्ज़नों की ख़ासियत ये
भी होती है कि वो मरीज़ का ज़्यादा ख़ून बर्बाद नहीं होने देते।
नैनीताल हाईकोर्ट की
खंडपीठ के सामने केन्द्र सरकार के सबसे बड़े वकील और अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने
बिल्कुल सटीक सवाल उठाया कि ‘जब
प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू है, विधानसभा निलम्बित है, सरकार है ही नहीं तो
फिर वहाँ शक्ति परीक्षण कैसे हो सकता है? लिहाज़ा, किसी भी
अन्य सवाल को तय करने से पहले अदालत को इसी सवाल पर अपना फ़ैसला देना चाहिए।’ फ़िलहाल, यही सबसे बड़ा और अनिवार्य सवाल है। इसके उत्तर के बाद ही अन्य
सवालों की बारी आ सकती है। स्वाभाविक है कि इस सवाल का उत्तर देते वक़्त हाईकोर्ट
को ये तय करना होगा कि क्या उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए सही वजह,
वक़्त और प्रक्रिया को अपनाया गया था?
इन सवालों का उत्तर
देने से पहले हाईकोर्ट को ये भी तय करना है कि क्या 18 मार्च को हरीश रावत सरकार
ने अपना बजट पारित करवा लिया था? इसके
लिए विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल ने सदन को जैसे संचालित किया, क्या वो
उचित था? यदि नहीं, तो क्या उन्होंने आसन की मर्यादा तोड़ी
है? क्या काँग्रेस के नौ बाग़ी विधायकों की सदस्यता ख़त्म
करने का उनका फ़ैसला सही था? क्या इस सवाल को तय करने से
पहले हाईकोर्ट की एकल पीठ का वो अन्तरिम आदेश सही हो सकता है जिसने उपरोक्त सवालों
को तय करने से पहले शक्ति परीक्षण करवा लेने का आदेश दिया? कल्पना
कीजिए कि यदि ऐसे शक्ति परीक्षण में हरीश रावत को विश्वास मत मिल जाता तो उसकी
पवित्रता क्या होती? क्या विश्वास मत पाने से उनकी सरकार
अपने आप बहाल हो जाती?
साफ़ है कि हाईकोर्ट
का 29 मार्च वाला अन्तरिम आदेश अपने आप में ही लचर, अपरिपक्व और अदूरदर्शी था।
संविधान के बुनियादी नियमों की अनदेखी करके दिये जाने वाले ऐसे अन्तरिम आदेश ही
न्यायपालिका की शान में बट्टा लगाते हैं। इसीलिए 24 घंटे के भीतर ही ऐसे आदेश को बड़ी
बेंच ख़ारिज़ कर देती है। लेकिन इस सारे घटनाक्रम का ये मतलब कतई नहीं है कि पूरे
मामले में बीजेपी और केन्द्र सरकार का आचरण साफ़-सुथरा है। पहली गड़बड़ी तो ये है
कि 18 मार्च को जब विधानसभा में संवैधानिक संकट (Constitutional
Breakdown) पैदा हो गया था तो राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को बहुमत
साबित करने के लिए 10 दिन का वक़्त क्यों दिया? राज्यपाल से
फ़ौरन रिपोर्ट मंगवाकर राष्ट्रपति शासन लगाने का काम क्यों नहीं हुआ? हरीश रावत के स्टिंग को ही राष्ट्रपति शासन के लिए ‘निर्णायक
क्षण’ क्यों मान लिया गया? यदि केन्द्र
सरकार और बीजेपी को रावत सरकार के अल्पमत में होने का इतना ही इत्मिनान था तो उसने
9 दिन बर्दाश्त करने के बाद 10 वें दिन तक का सब्र क्यों नहीं दिखाया?
बीजेपी अच्छी तरह
जानती थी कि दलबदल विरोधी क़ानून के तहत सदस्यता गँवाने से बचने के लिए काँग्रेस
के कम से कम 12 विधायकों का बाग़ी होना ज़रूरी था। क्योंकि 71 सदस्यों वाली
विधानसभा में काँग्रेस के 36 सदस्य थे। अब यदि बाग़ी 9 विधायकों ने वित्त विधेयक
(बजट) के पक्ष में वोट नहीं दिया तो बेशक सरकार अल्पमत में आ गयी। लेकिन तकनीकी
रूप से वो अभी गिरी नहीं है। अब ये मुख्यमंत्री के विवेक पर है कि वो अपनी सरकार
को गिरा मानकर ख़ुद इस्तीफ़ा दे दें। या फिर वो शक्ति परीक्षण की चुनौती का सामना
करें। हरीश रावत ने चुनौती वाले रास्ते को इसलिए चुना क्योंकि अपनी ही सरकार के
पक्ष में वोट नहीं देने की वजह से 9 विधायकों की सदस्यता का जाना तय था। ऐसा होता
तो विधानसभा की प्रभावी संख्या 71 से घटकर 62 हो जाती। तब उन्हें 33 वोट से ही
विश्वास मत मिल जाता।
लेकिन ऐसा होता तो
बीजेपी का पूरा खेल ही ख़राब हो जाता। इसीलिए बीजेपी ने ये दलील दी कि हरीश रावत
सरकार बजट पास नहीं करवा सकी। इससे राज्य में 1 अप्रैल के बाद सरकार कोई पैसा नहीं
खर्च कर सकती थी। बीजेपी की दूसरी दलील ये थी कि बजट का पास नहीं होना ही अपने आप
में सरकार का गिर जाना है। लिहाज़ा, विश्वास मत का मौक़ा देने का कोई तुक़ नहीं हो
सकता। संविधान और क़ानून इस व्याख्या पर ख़ामोश हैं कि ‘बजट का पास नहीं होना’
क्या सरकार का स्वतः गिर जाना है या सरकार को बाक़ायदा विश्वास मत से ही गिरा हुआ
माना जाएगा। उम्मीद है कि इस ख़ामोशी पर अब हाईकोर्ट या सम्भवतः सुप्रीम कोर्ट से
ही अन्तिम फ़ैसला आये।
इसमें कोई शक़ नहीं कि
पूरे प्रसंग में केन्द्र सरकार की कार्रवाई बहुत देर से हुई। क्योंकि पहले बीजेपी
की मंशा राष्ट्रपति शासन लगाने की नहीं बल्कि अपनी सरकार बनाने की थी। इसीलिए इसमें
देरी होता देख आनन-फ़ानन में मोदी सरकार को संसद के बजट सत्र का सत्रावसान करने का
फ़ैसला लेना पड़ा। ताकि अब अध्यादेश लाकर उत्तराखंड की वित्तीय औपचारिकताओं को
निभाया जा सके। क्योंकि संसद के सत्र में रहते सरकार अध्यादेश नहीं ला सकती। सत्र
में सरकार को प्रस्ताव को क़ानून की तरह पारित करवाना पड़ता।  जो बहुत मुश्किल काम होता। क्योंकि राष्ट्रपति
शासन को लोकसभा के अलावा राज्यसभा की भी मंज़ूरी चाहिए। इस सारे काम को 31 मार्च
से पहले कर पाना मुमकिन नहीं था। कुलमिलाकर, उत्तराखंड में चल रहे राजनीतिक तमाशे
का अभी तो सिर्फ़ मध्यान्तर (Interval) हुआ है। पिक्चर अभी बाक़ी है। अब दुआ कीजिए कि काश, इस बार दलबदल की बीमारी का पुख़्ता इलाज़ भी हो जाए!
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