काला धन हाथ लगे या नहीं, मोदी सरकार के तेवरों में कंजूसी तो नहीं है..! Narendra Modi Arun Jaitley 300x167
देश के बेईमान धन्ना सेठों और काला धनख़ोरों के प्रति मोदी सरकार कितनी सख़्त हो सकती? वित्त मंत्री अरूण जेटली ने इसका ब्यौरा दिया कि ‘पनामा पेपर्स’ के ख़ुलासे के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें हिदायत दी कि ‘सभी जाँच एजेंसियों के घोड़े खोल दीजिए। एक भी बेईमान बख़्शा नहीं जाएगा। क्योंकि सरकार की नज़र में कोई पवित्र गाय (Holy Cow) नहीं है।’ एक नज़र में सरकार का ये तेवर तसल्ली देता है। लेकिन अगले पल ही ख़्याल आता है कि क्या ख़ुद को पाक-साफ़ बता रहे सदी के महानायक अमिताभ बच्चन झूठ बोल रहे होंगे? क्या रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन भी तो किसी गफ़लत की ओर इशारा नहीं कर रहे? राजन ने कहा है कि कई बार विदेश में पैसा रखने की वाज़िब वजह भी होती है। यानी, ज़रूरी नहीं कि जिन लोगों पर अँगुली उठी है, वो सभी दोषी हों!
पत्रकारों का काम है ख़ुलासा करना। उन्होंने अपना काम किया। अब बारी जाँच एजेंसियों की है, जिन्हें सच्चाई की तह तक जाना है, सबूत जुटाने हैं, अदालती कार्रवाई को अंज़ाम देना है और दोषियों को सज़ा दिलानी है। काले धन को लेकर जिस तरह का ख़ुलासा ‘पनामा पेपर्स’ ने किया है, वो कोई नया नहीं है। इससे पहले भी लिश्टेन्सटेन लिस्ट, आईसीआईजे (International Consortium of Investigative Journalists) लिस्ट और एचएसबीसी लिस्ट के अलावा वित्त मंत्रालय को कई अन्य स्रोतों से छिटपुट ब्यौरा मिलता रहा है। तो क्या वजह है कि हमारी जाँच एजेंसियों और ‘क़ाबिल’ नौकरशाही आज तक किसी बेईमान को सलाख़ों के पीछे नहीं पहुँचा पायी? ख़ासकर तब, जबकि मोदी-राज की तो शुरुआत ही काले धन पर जस्टिस एम बी शाह की अगुवाई में विशेष जाँच दल बनाकर हुई थी? यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट की भी काले धन पर सीधी नज़र है।
विदेशी काले धन के लिए पिछले साल जो योजना आयी, उसमें 30 सितम्बर तक, 644 लोगों ने 4,126 करोड़ रुपये की सम्पत्ति घोषित की। इस पर 60 फ़ीसदी टैक्स चुकाना था। 31 दिसम्बर तक इस ख़ाते में 2,428 करोड़ रुपये सरकारी खज़ाने में पहुँच गये। काले धन के दावों को देखते हुए मोदी सरकार की ये उपलब्धि कुछ मायूसी भरी लग सकती है। लेकिन पिछली सरकारें तो ये भी नहीं कर पायीं। रोचक ये भी है कि 2,428 करोड़ रुपये लोगों ने सरकारी नीति का फ़ायदा उठाकर जमा करवाये। इसमें नौकरशाही की किसी सख़्ती का हाथ नहीं है। तो क्या एड़ी-चोटी एक करने के बावज़ूद हमारी निकम्मी नौकरशाही ये पता नहीं लगा पा रही कि आख़िर काला धन किस बिल (बैंक) में छिपा है? क्या काले धन को भी साँप सूँघ गया है?
बीते तीन दशकों के दौरान विदेश में रखे गये काले धन का पता लगाने के लिए पूर्व सरकारों ने 80 से ज़्यादा देशों के साथ क़रार किये। इसके बावज़ूद काले धन का ऐसा सुराग़ नहीं मिला, जैसा 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले दावा किया गया था। मान लिया कि वाजपेयी सरकार के अलावा यूपीए, नेशनल फ़्रंट, थर्ड फ़्रंट वाली सरकारें बड़ी ढीली थीं, इसलिए वो काले धन पर कुछ नहीं कर सकीं। लेकिन मोदी सरकार तो बहुत कड़क है, उसकी नीयत साफ़ है, हौसले बुलन्द हैं। तो फिर इसकी काले धन वाली एसआईटी ने कौन से झंडे गाड़ दिये!
काले धन को ढूँढ़ना इतना ही आसान होता तो पुरानी सरकारें भी कुछ न कुछ तो ढूँढ़ ही लेंती। दिक़्क़तें हैं, इसीलिए वक़्त लगना भी स्वाभाविक है। लिहाज़ा, तसल्ली रखिए। सरकार को वक़्त दीजिए। बस, एक ही बात और पूछना है कि क्या काला धन वहाँ है भी, जहाँ सरकार उसे ढूँढ रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो सरकार की छापेमारी से पहले बार-बार अपना ठिकाना बदल रहा हो! शायद सरकार की नीयत को देखते हुए ऐसी मायूसी भरी बातें नहीं होनी चाहिए! अभी तो मोदी सरकार के तीन साल और बाक़ी हैं। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि विजय माल्या के बाद और किन-किन धन्ना सेठों पर गाज़ गिरने वाली है!
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प्रधानमंत्री की ताक़त और इरादे में कितना दम हो सकता है कि इसका असर तो विजय माल्या जैसे बेहद शातिर धन्ना सेठ ने दे दिया। चन्द रोज़ पहले ही तो नरेन्द्र मोदी ने असम में एलान किया था कि ‘बैंकों का पैसा किसी को हड़पने नहीं दिया जाएगा। पाई-पाई वसूली जाएगी।’ लगता है कि मोदी के उसी तेवर से माल्या की सिट्टी-पिट्टी ग़ुम हो गयी। वो बैंकों का पैसा लौटाये या न लौटाये लेकिन कह तो रहा है कि छह महीने में 4000 करोड़ रुपये लौटा दूँगा। ये झाँसा भी हो सकता है। क्योंकि इतना पैसा वो लाएगा कहाँ से? बैंकों से अब उसे क़र्ज़ा मिलना मुश्किल है, छह महीने में वो इतना पैसा कमा सकता नहीं, इतना पैसा उसने अपने पास दबाकर भी नहीं रखा होगा, तो क्या माल्या अब अपनी सम्पत्तियाँ बेचकर कलंक धोएगा? लेकिन सम्पत्तियाँ बेचना होता तो अब तक बेच न लिया होता!
काला धन दो तरह का है। एक विदेश में रखा गया और दूसरा देश में छिपाया गया। देसी काले धन के बारे में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने बजट के बाद एक इंटरव्यू में समझाया था कि पिछली बार जब 1997 में नरसिम्हाराव सरकार Voluntary Disclosure of Income Scheme (VDIS) लायी थी तो उससे सरकार को क़रीब 10 हज़ार करोड़ रुपये मिले थे। उस योजना को जब जनहित याचिका के ज़रिये सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी तो सरकार ने आश्वासन दिया कि वो आख़िरी योजना रहेगी। इससे भविष्य की सरकारों के लिए नयी VDIS को लाने का रास्ता बन्द हो गया। इसके बावजूद मोदी सरकार Income Tax Disclosure Scheme के नाम से तीन महीने तक काले धन पर टैक्स चुकाने की एक योजना चलाएगी, जिसमें 1 जून से 30 सितम्बर 2016 के दौरान 45 फ़ीसदी टैक्स चुकाकर बेईमान धन्ना सेठ जेल जाने से बच सकते हैं।
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2 नवम्बर 2014 को प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ में कहा था कि देश को उनके इस वादे पर भरोसा रखना चाहिए कि वो विदेश से काला धन वापस लाकर रहेंगे। तो क्या ये नहीं माना जाए कि मोदी ज़ुबान के पक्के हैं? कहा है तो ज़रूर करके दिखाएँगे। नरेन्द्र मोदी की बातों पर क्या इसलिए यक़ीन नहीं करना चाहिए कि वो हरेक भारतीय के प्रधानमंत्री हैं, सिर्फ़ उन 31 प्रतिशत लोगों के नहीं, जिन्होंने उन्हें वोट दिया था? इसी तरह, 5 फरवरी 2015 वाले अमित शाह के उस बयान को भी नज़रअन्दाज़ करना मुश्किल है कि हरेक व्यक्ति के ख़ाते में 15-15 लाख रुपये पहुँचाने वाली बात ज़ुमला थी।
ये किसी से छिपा नहीं है कि देश में काले धन का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल ‘रियल स्टेट सेक्टर’ में होता था। अभी वहाँ मन्दी है क्योंकि काले धन का प्रवाह अवरुद्ध माना जा रहा है! प्रापर्टी के दाम बढ़ नहीं रहे। कहीं-कहीं तो गिर रहे हैं! डेवेलपर्स, ख़रीदारों के लिए तरस रहे हैं। धन्ना सेठों के काले धन को सफ़ेद बनाने में सिद्धहस्त ‘चार्टड एकाउन्टेंट्स’ कष्ट में हैं। आमतौर पर जनवरी से मार्च के बीच उनकी मोटी कमाई होती थी। अपने ‘क्लाइंट्स’ के काले धन को गोरा करने पर उनकी भी जेबें हरी होती थीं। लेकिन इस बार उनके चेहरे मुर्झाये हुए हैं। क्या इसलिए कि अब नितिन गडकरी जैसों की भी हिम्मत नहीं है कि वो अपने ड्राइवर को करोड़पति बना दें!
प्रापर्टी के बाद काले धन का दूसरा सबसे बड़ा अड्डा ग़ैर सरकारी संगठन (NGO), तरह-तरह के ट्रस्ट और बेनामी कम्पनियाँ रही हैं। 21 फरवरी को छत्तीसगढ़ की बारगढ़ रैली में मोदी ने कहा था कि ‘सरकार को अस्थिर करने और मुझे बदनाम करने के लिए साज़िशें रची जा रही हैं। यूरिया का दुरुपयोग करने वाले उद्योगपति इसलिए ख़फ़ा है क्योंकि उन्होंने नीम चढ़े यूरिया (Neem Coated Urea) को बढ़ावा दिया। विदेशी अनुदान का बेज़ा इस्तेमाल कर रहे NGO इसलिए नाराज़ हैं क्योंकि सरकार ने उनसे हिसाब माँगा है।’ फिर 27 फरवरी को कर्नाटक की बेलगावी रैली में मोदी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हल्ला बोलने की वजह से मैं प्रभावित लोगों की आँखों का काँटा बन गया हूँ।’ साफ़ है कि प्रधानमंत्री की इन बातों को झूठा कैसे मान लें!
मुकेश कुमार सिंह से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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