‘झूठ के हलवाईयों’ के नये पकवान का नाम है ‘परिवारवाद’। ये वंशवाद का नया पर्याय है। पकवान बहुत शानदार है। जिस तरह, बिहार को ‘जंगलराज’ से मुक्त करवाकर ‘विकास’ के हवाले करने का पकवान बनाया गया था, बिल्कुल उसी तरह और उसी नीयत से आसन्न चुनावों के मद्देनज़र उत्तर प्रदेश को मुलायम सिंह और गाँधी-नेहरू के ‘परिवारवाद’ से मुक्त कराने की दुहाई दी जा रही है। ‘सदियों’ पुरानी इस पुरानी भगवा शराब को नयी बोतलों में परोसने के लिए पतंजलि के विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है!

‘काँग्रेस मुक्त भारत’ की तर्ज़ पर ‘परिवार मुक्त उत्तर प्रदेश’ रूपी नये पकवान को बनाने के लिए तरह-तरह के ख़ानसामों को कमर कसकर अख़ाड़े में उतरने का हुक़्म दे दिया गया है। शराब की अवैध भट्टियों के नेटवर्क की तरह ‘झूठ के तमाम हलवाईयों’ को अपना-अपना बारदाना लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात किया जा रहा है! वैसे तो सभी पार्टियाँ अपने नये-पुराने हथियारों को धो-माँजकर चमका रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल तो ये है कि ‘परिवारवाद’ वाला पकवान बॉक्स ऑफ़िस पर सुपरहिट कैसे होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘परिवारवाद’ तो सिर्फ़ मुखौटा होगा। असली खेल तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को ही खेलना है। वर्ना 2014 की सारी उपलब्धियों पर पानी फिर जाएगा।

भगवा की एक मुसीबत और है कि ‘परिवारवाद’ की आँच में वो ख़ुद किसी से कम नहीं झुलस रहा। नेहरू-गाँधी का भी आधा ख़ानदान यानी मेनका-वरूण तो मुद्दतों से उसी के क़ब्ज़े में हैं। मेनका तो ससुराल से निकाली गयी बेटी की तरह थी ही। वरूण की तो परवरिश ही ननिहाल में हुई है। बादल-ठाकरे-मुफ़्ती जैसे ‘परिवारवादियों’ से भगवा को कभी कोई एलर्ज़ी नहीं हुई। अपने ही घर में सिन्धिया, जसवन्त, यशवन्त जैसे कितने ही परिवारवादी फल-फूल रहे हैं। लेकिन लालू, मुलायम और सोनिया के परिवार से आँखों में किरकिरी होती है! कभी शेख़ अब्दुल्ला-नवीन पटनायक-चन्द्रबाबू नायडू (NTR) जैसे परिवारवादी भी नहीं अख़रते थे क्योंकि उनका गोद में उठना-बैठना होता रहता था।

समस्या विकट है! इसीलिए झूठ के हलवाईयों से कहा गया है कि पकवानों की बड़ी रेंज (Menu) तैयार करें ताकि हरेक की पसन्द के लिए कोई न कोई आइटम सुलभ रहे। इसीलिए ‘कल्याण’ में भी सम्भावनाएँ टटोली जा रही हैं! वैसे इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। योद्धाओं को युद्ध में भरपूर तैयारी से जाना ही चाहिए। बाक़ी अब तो जनता ख़ुद तय करती है कि उसे किसके और किस हथियार के आगे घुटने टेंकने हैं! दिक़्क़त बस एक ही है कि हिन्दुस्तानियों को अपने नेताओं का झूठ आसानी से हज़म नहीं होता। उसका तो और नहीं जो सत्यवादी होने का नगाड़ा पीटता हो! जो एक तो राजनीति जैसे पाप के दरिया का श्रेष्ठ नाविक हो और दूसरी ओर दावा करे कि मैं पाप को छूऊँगा तक नहीं! ये झूठ के हलवाईयों का एक अलग और ताज़ा पकवान है। दूसरी पार्टियाँ भी अपनी बासी मिठाइयों पर चाँदी का वर्क लगाकर मुक़ाबले को रोचक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहीं। देखते जाइए कि कितने लोग इसके झाँसे में आते हैं!