समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान के बारे में माना जाता है कि उन्हें ज़ुबानी दस्त यानी Verbal Diarrhoea की स्थायी बीमारी है! लेकिन कभी-कभी बीमार लोग भी पते की बात कह देते हैं! मिसाल के तौर पर 17 जुलाई को वाराणसी के अस्सी घाट पर हुए ‘गंगा की पुकार’ कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आज़म ख़ान ने बोला, “बादशाह कभी झूठ नहीं बोलता और जो झूठ बोलता है वो बादशाह नहीं होता!”

इसमें कोई शक़ नहीं कि देश में आज नरेन्द्र मोदी की हस्ती किसी बादशाह से कम नहीं है! बेशक़, इस बादशाह ने कभी झूठ नहीं बोला! न विधिवत बादशाह बनने से पहले और न ही अपनी ताजपोशी के बाद! कभी भी, हर्ग़िज़ नहीं…! अब ये बात अलग है कि देश की संवैधानिक संस्था CAG (भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) की एक रिपोर्ट अब मोदी-राज में झूठ बोलने लगी है! यही संस्था मनमोहन-राज में सच बोलती थी। बेशक़, पिछली सरकार के ज़माने में CAG ने 2G, कोयला, कॉमनवेल्थ और आदर्श जैसे घोटालों पर मनगढ़ंत आपत्तियाँ नहीं ज़ाहिर की थीं! इसीलिए तो तब CAG यानी कैग की रिपोर्टों के आधार पर विपक्ष में बैठे बीजेपी के विद्वानों ने ये मान लिया था कि रिपोर्ट में ज़ाहिर की गयी आपत्तियों का सीधा और सरल मतलब है ‘घोटाला!’

अब चूँकि मोदी-राज में कोई घोटाला हो ही नहीं सकता। क्योंकि नरेन्द्र मोदी बोल चुके हैं कि ‘न खाऊँगा और न ही खाने दूँगा’। इसलिए मौज़ूदा दौर में यदि कोई घोटाला, हेराफ़ेरी और ग़लतबयानी का भंडाफोड़ होगा तो भी उसे घोटाला माना नहीं जाएगा। क्योंकि मोदी सरकार को भगवान का ये वरदान प्राप्त है कि उसके किसी भी घोटाले को घोटाला माना ही नहीं जाएगा! ये बिल्कुल ऐसे ही है जैसे किसी खेल में जब तक रेफ़री किसी हरक़त को आपत्तिजनक यानी फ़ाउल (Foul) नहीं मानता तब तक उसे ग़लत नहीं माना जाता।

साफ़ है कि किसी फ़ाउल के होने से ज़्यादा अहमियत उसके बारे में रेफ़री के नज़रिये की होती है। रेफ़री को लगा कि फ़ाउल हुआ है, तभी फ़ाउल माना जाएगा। वर्ना सारी बेज़ा हरक़तें भी ‘सही क़दम’ ही मानी जाएँगी! फ़िलहाल, यही रेफ़री महाशय देश के बादशाह हैं! किसी की क्या मजाल कि ‘नहीं खाने’ के उनके फ़रमान के बाद एक निवाला भी मुँह में डाल ले! बादशाह के हुक़्म के बाद सारे बेईमानों और भ्रष्टों ने ख़ाना-पीना बन्द कर दिया है। सबका निर्जल उपवास चालू है! ये कम से कम 2019 तक या फिर जब तक मोदी-राज रहेगा, तब तक क़ायम रहेगा। इसी से ये सिद्ध हो जाता है कि ‘बादशाह कभी झूठ नहीं बोलता!’

इसका मतलब ये हुआ कि CAG की वो रिपोर्ट सिरे से झूठी है जो ये कहती है कि मोदी सरकार झूठ बोल रही है कि उसने 21 हज़ार करोड़ रुपये की एलपीजी सब्सिडी की चोरी को ख़त्म किया है। कैग रिपोर्ट कहती है कि हक़ीक़त में ये बचत 2000 करोड़ रुपये भी नहीं है! कैग की रिपोर्ट, मौज़ूदा मॉनसून सत्र के दौरान ही संसद में पेश होने वाली है। लेकिन रिपोर्ट थोड़ा पहले ही लीक हो गयी। इसमें कहा गया है कि सरकार के दावे के मुक़ाबले असली बचत महज 10 फ़ीसदी की ही रही है। वैसे तो 10 फ़ीसदी यानी 2000 करोड़ रुपये भी कोई मामूली रक़म नहीं है। इसकी बर्बादी को रोककर भी मोदी सरकार ने शाबाशी का काम किया है। तो फिर गौरैया को चील क्यों बताया जाता है? झूठ का ढोल क्यों पीटा जाता रहा?

मोदी सरकार ये क्यों नहीं समझती कि जनता को उल्लू बनाना मुनासिब नहीं है। अच्छी बात नहीं है। इससे लोकतंत्र कमज़ोर ही होता है। सरकार की विश्वसनीयता गिरती है। लेकिन सरकार की कोशिश अब देश को ये बताने की है कि CAG भले ही ग़लती करे, उससे तो ग़लती होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसीलिए, लीक सीएजी रिपोर्ट पर भी पेट्रोलियम मंत्रालय का सफ़ाई चटपट आ गयी। मंत्रालय की दलील है कि बीते दो साल में (2014-16) में 3.34 करोड़ फ़र्ज़ी और नक़ली गैर कनेक्शन्स की पहचान करके उन्हें रद्द कर दिया गया। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो साल में 12 सिलेंडरों पर औसतन 369.72 रुपये प्रति सिलेंडर के हिसाब से दो साल में कुल 21,261 रुपये की सब्सिडी देनी पड़ती। इसमें से पहले साल (2014-15) 14,818 करोड़ रुपये और दूसरे साल (2015-16) 6,443 करोड़ रुपये ख़र्च होते। मंत्रालय का मानना है कि 21 हज़ार करोड़ रुपये की ये बचत डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (DBT) की उस नीति के तहत हुआ है जिसमें सब्सिडी सीधे उपभोक्ताओं के बैंक खाते में भेजी जाती है। मंत्रालय का कहना है कि इस दावे की पुष्टि बग़ैर सब्सिडी वाले सिलेंडरों की बिक्री में हुए इज़ाफ़े से भी होती है।

CAG का कहना है कि सरकार का दावा 2014 में मनमोहन सिंह सरकार के वक़्त मौजूद कच्चे तेल और गैस की क़ीमतों पर आधारित है। जबकि ये है कि मोदी-राज के दो वर्षों में इनकी क़ीमतों में ज़बरदस्त गिरावट आयी है। सरकार के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) का अनुमान था कि बीते साल देश के एलपीजी आयात का बिल 25 हज़ार करोड़ रुपये रहा। जबकि इसके एक साल पहले ये 36 हज़ार करोड़ रुपये से ऊपर था। यानी, 11 हज़ार करोड़ रुपये का दावा तो सीधे-सीधे यही से झूठा साबित हो गया। वो भी तब जबकि इसी दौरान एलपीजी आयात में 7 फ़ीसदी से ज़्यादा का इज़ाफ़ा हुआ, जो 83 हज़ार ये बढ़कर 89 हज़ार मीट्रिक टन (TMT) हो गया था। जहाँ तक एलपीजी के आयात मूल्य का ताल्लुक है तो मई 2014 में ब्यूटेन (60%) दाम 825 डॉलर से गिरकर जुलाई 2016 में 310 डॉलर प्रति मीट्रिक टन हो गया था। इसी तरह, प्रोपेन (40%) का दाम इसी अवधि में 810 डॉलर से घटकर 295 डॉलर पर आ गया था।

मोदी सरकार का दावा है कि मौजूदा वित्त वर्ष की समाप्ति तक अवैध सिलेंडर सिब्सिडी और जनता की ओर से स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ने की वजह से सरकारी ख़ज़ाने को होने वाली बचत क़रीब 22 हज़ार करोड़ रुपये हो जाएगी। लेकिन कैग रिपोर्ट ने सारे दावे की हवा ये कहकर निकाल दी है कि मोदी जी की उस अपील से महज 2000 करोड़ रुपये की बचत होगी जिसे ‘Give It Up’ के रूप में पेश किया गया। लेकिन मोदी सरकार ने चतुराई दिखाते हुए नवम्बर 2014 से शुरू हुई DBT योजना के सारे फ़ायदे को 27 मार्च 2015 से शुरू हुए ‘Give It Up’ योजना में जोड़ दिया। जबकि ताज़ा स्थिति ये है कि अभी तक क़रीब एक करोड़ लोगों ने ‘Give It Up’ योजना को अपनाया है। ये कुल एलपीजी कनेक्शन का सिर्फ़ 6 फ़ीसदी है।

मज़े की बात ये भी है कि सिलेंडरों की संख्या की सीमा तय करने की योजना मनमोहन सरकार ने उस वक़्त अपनायी थी, जब पेट्रोलियम पदार्थों के भाव सर्वोच्च स्तर पर थे। इसे पहले नौ सिलेंडर पर सीमित करने और फिर 12 सिलेंडर कर देने की नीति पुरानी ही थी। पिछली सरकार ने आधार से सब्सिडी को जोड़ने की योजना तैयार की थी। तब सिर्फ़ आधार से जन-जन के जुड़ जाने का इंतज़ार किया जा रहा था। ये वही आधार है जिसका बीजेपी और नरेन्द्र मोदी ने ज़ोरदार विरोध किया था। लेकिन आज उसका ऐसे गुणगान किया जा रहा है। मानो, आधार इनकी ही उपलब्धि हो!

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