क्या कभी-कभी आपको नहीं लगता कि हमारे महान भाग्य-विधाता यानी नेतागण अपने बुनियादी काम पर ध्यान लगाने के बजाय फ़ालतू की बातों में उलझे रहते हैं! इससे भी ज़्यादा अफ़सोस की बात ये है कि जनता को उल्लू बनाने की राष्ट्रीय बीमारी और इसका लाइलाज़ संक्रमण लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अब देखिए कि गुड़गाँव (गुरुग्राम) में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर बीते 18 घंटों से 25 किलोमीटर से लम्बा जाम लगा है। पुलिस ने लोगों से हाईवे पर नहीं आने की अपील की है। जाम की वजह से स्कूलों को छुट्टी करनी पड़ी। दफ़्तरों में कर्मचारी नहीं पहुँच पाये। लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर कहते हैं कि जाम के लिए अरविन्द केजरीवाल ज़िम्मेदार हैं! ये विशुद्ध रूप से मसखरेबाज़ी है। शर्मनाक है!

कहीं ये जवाबी कव्वाली का नज़ारा तो नहीं! क्योंकि केजरीवाल अपनी पार्टी पर आने वाली हर आफ़त के लिए अपने कर्मों पर ग़ौर करने के बजाय मोदी सरकार पर ठीकरा फोड़ते हैं। पहले तो उन्हें मनोरोगी (Psychopath) कहा करते थे। अब कहते हैं कि उन्हें मोदी से जान का ख़तरा है। मुख्यमंत्री को जान का ख़तरा है, वो भी प्रधानमंत्री से। आज़ादी के बाद संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति ने शायद ही पहले कभी इतनी बेहूदा बात  की हो। वो भी ऐसे प्रधानमंत्री के लिए जिसे ख़ुद मुख्यमंत्री ने ही ‘पाग़ल’ होने का सर्टिफ़िकेट दिया हो।

उधर, केजरीवाल का एक जमूरा 2014 में इत्तेफ़ाक से सांसद बन गया है। नाम है भगवन्त मान। करतूत है संसद का अनधिकृत वीडियो बनाना। टोका जाए तो कहना कि आईन्दा भी बनाऊँगा। फिर माफ़ी माँग लेना। माफ़ी नहीं मिली तो ये कहना है कि मुझे सज़ा देनी हो तो पहले मनोरोगी प्रधानसेवक और चौकीदार नरेन्द्र मोदी को दो। क्योंकि उन्होंने पाकिस्तानी आतंकियों के सरगना आईएसआई को पठानकोट हवाई अड्डे का दौरा करवाकर राष्ट्र-विरोधी हरक़त की है, देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया है।Kejriwal-Khattar  हे नेतागण! जनता को उल्लू बनाना बन्द करें, हुक़ूमत पर ध्यान लगाएँ! Kejriwal Khattar 1

अब केजरीवाल और भगवन्त मान के सलाहकारों को ये भला कौन समझाये कि अलग-अलग अपराधों की न सिर्फ़ सज़ा अलग-अलग होती है। बल्कि सज़ा देने वाली संस्थाएँ भी। मसलन, सांसद भगवन्त मान का क़सूर उनकी व्यक्तिगत करनी से जुड़ा है। जबकि प्रधानमंत्री मोदी का कारनामा उनकी सरकार की नीति से सम्बन्धित है। मान के मामले में क़सूर और सज़ा तय करने का अधिकार लोकसभा और उसकी कमेटियों को है। स्पीकर सुमित्रा महाजन तो सिर्फ़ लोकसभा में निहित सत्ता की प्रतीक हैं। जबकि दूसरा मामला मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति से जुड़ा है। देश की जनता इस नीति की समीक्षा अगले जनादेश में करेगी। मोदी को ग़लत पाएगी तो उन्हें सत्ता से बाहर कर देगी। जैसे मनमोहन सिंह सरकार को किया था।

साफ़ है कि हर बात में नरेन्द्र मोदी को घुसेड़ने की फ़ितरत से अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के बौद्धिक दिवालियेपन का ही पता चलता है। इसी तरह, यदि केजरीवाल के विधायकों पर लगाये गये आरोपों और उसे लेकर उनकी होने वाली गिरफ़्तारियों के पीछे किसी की दुर्भावना है तो उसका फ़ैसला भी अदालत से हो जाएगा। अभी तो दिल्लीवासियों को रोज़-रोज़ की नौटंकियों से छुटकारा मिलना ही चाहिए। केजरीवाल ये कैसे भूल सकते हैं कि सत्ता में आने से पहले उन्होंने भी अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ असंख्य आरोप लगाये थे। लेकिन अभी तक हुआ क्या? क्या वो आरोप सिद्ध हो गये? दोषियों का पता चल गया? क्या जाँच और अदालतों ने अपना काम पूरा करके गुनहगारों का पता लगा लिया? क्या उन्हें जेल की हवा खिला दी गयी? अभी तक तो जितने दाग़ केजरी के दामन में लगे हैं, उतने तो विरोधियों पर भी शायद ही मिलें।

कुलमिलाकर, ये सिर्फ़ और सिर्फ़ तमाशा है। नेताओं की जमात सत्ता पाते ही दुश्मनों को ठिकाने लगाने का एकसूत्री कार्यक्रम अपना लेती है। हुक़ूमत करने जैसे जिस काम के लिए जनता ने उन्हें चुना है, वो गौण होकर नेपथ्य में चला जाता है। मोदी सरकार भी इसी बीमारी से पीड़ित है। कभी कभार कुछ सकारात्मक होता भी है तो उसे अपाहिज़ बन जाने में वक़्त नहीं लगता।

मसलन, केन्द्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री अनन्त कुमार ने 28 जुलाई 2016 को राज्यसभा में कहा कि सरकार ने तय किया है कि देश के सभी डॉक्टर अपने मरीज़ों के पर्चे में सिर्फ़ जेनेरिक दवाएँ ही लिखें। ब्रॉन्डेड दवाएँ नहीं लिखें क्योंकि वो महँगी हैं। हालाँकि दोनों का कच्चा माल यानी Salt एक ही होता है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार के मुकाबले मोदी सरकार ने जेनेरिक दवाईयों की बड़ी सूची को बहुत तेज़ी से तैयार किया है। लिहाज़ा, राज्यों से आग्रह किया जाएगा कि वो सरकारी डॉक्टरों को सिर्फ़ जेनेरिक दवाईयाँ लिखने के लिए कहें।

दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने इस काम को काफ़ी पहले तब चालू कर दिया था, जब उसने इस बात का ढोल पीटने की रणनीति बनायी कि दिल्ली सरकार की डिस्पेंसरियों, अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टर किसी भी सूरत में उन दवाइयों को मरीज़ों के पर्चों पर नहीं लिखेंगे जो अस्पताल में उपलब्ध न हों। ताकि केजरी सरकार की ढोल की पोल नहीं खुले कि उसके अस्पतालों में मुफ़्त इलाज़ होता है। केजरी-राज का ये फ़ैसला कितना वाहियात है, इसे समझने के लिए ज़रा किसी ऐसे डॉक्टर से सम्पर्क कीजिए जो दिल्ली सरकार में नौकरी करता हो। पहले ये होता था कि जो दवाईयाँ या मेडिकल उपकरण अस्तपाल की सप्लाई में नहीं होते थे, उन्हें मरीज़ की ज़रूरतों को देखते हुए डॉक्टर बाज़ार से ख़रीदने की हिदायत दे दिया करते थे। इसके पीछे असली मक़सद मरीज का हित होता था।

लेकिन जब से केजरी सरकार का तुग़लक़ी फ़रमान जारी हुआ है तब से डॉक्टरों पर अपनी नौकरी बचाने का दवाब कुछ इस क़दर हावी है कि उन्हें जानबूझकर मरीज़ के हित की अनदेखी करनी पड़ती है। कई बार डॉक्टर अपनी इंसानियत को दिखाने के नाम पर ग़रीब और लाचार मरीज़ों को उन दवाईयों की Spelling लिखवा देते हैं, जिसकी उन्हें बेहद ज़रूरत होती है। लेकिन डॉक्टर फ़ालतू के काग़ज़ (waste paper) पर भी अपनी हैंडराइटिंग में दवा का नाम लिखने से बचते हैं। क्योंकि न जाने केजरीवाल का कौन सा वॉलिंटियर उनकी शिकायत कर दे और उनके गले में मुसीबत आन पड़े। केजरी सरकार के ऐसे अतिवादी रवैये ने जिस तरह से दिल्ली के डॉक्टरों की नाक में दम कर रखा है, यदि ऐसा ही देश के अन्य राज्यों में होने लगा तो आम जनता के गले एक नयी आफ़त आ पड़ेगी।

इसीलिए सत्तासीन नेतागणों से आग्रह है कि वो अपना सारा ध्यान हुक़ूमत करने पर लगायें। जनता को उल्लू बनाने में अपना धन-श्रम बर्बाद नहीं करें। जनता को बेवकूफ़ मत समझें। वो सब समझती है। वैसा ही समझती है, जैसा उसे समझना चाहिए। आप यदि जनता को ग़लत पट्टी पढ़ाने लगेंगे तो आपका हाल भी वैसा ही होगा, जैसा 2014 में देश की सबसे पुरानी पार्टी यानी काँग्रेस का हुआ था। नेतागणों को ये भी नहीं भूलना चाहिए कि 2004 में इंडिया शाइनिंग का क्या हश्र हुआ था! ‘अब पछताये क्या होत जब चिड़िया चुग गयी खेत’ की तर्ज़ पर ग़ैर काँग्रेसी पार्टियों को ये भी याद रखना चाहिए कि ऐसी क्या वजह है कि देश की जनता ने केन्द्र से जब-जब काँग्रेस को सत्ता से बेदख़ल किया, तब-तब इसकी मियाद सिर्फ़ पाँच वर्षों तक ही रही? क्यों बदलाव के पाँच साल बीतते-बीतते जनता ये तय कर लेती है कि राज करना तो काँग्रेस को ही आता है!