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कौन राजनेता ऐसा है जो तरह-तरह के बयान नहीं देता, भाँति-भाँति के स्वाँग नहीं करता? देश का सियासी क्षितिज तो ऐसी असंख्य मिसालों से अटा पड़ा है! लेकिन यदि बात बदहवासी भरे बयानों की हो तो नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल दोनों ही एक ही चट्टे-बट्टे के साथी हैं। यहाँ तक कि केजरीवाल के प्रेरणा पुरुष भी नरेन्द्र मोदी ही हैं! केजरीवाल पूरी तरह से नरेन्द्र मोदी के ही नक्शे-क़दम पर चल रहे हैं। बल्कि केजरीवाल ने तो मोदी को काफ़ी हद तक पछाड़ भी दिया है। एक मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री को Psychopath यानी मनोरोगी कहकर बुलाने ने तो किसी मर्यादाएँ को छोड़ा ही नहीं।

ज़रा केजरीवाल के दो ताज़ा बयानों पर ग़ौर करें। 27 जुलाई को जारी अपने वीडियो सन्देश में केजरीवाल ने कहा था, “मोदी सरकार किसी भी हद तक जा सकती हैं। हमें ये मरवा भी सकते हैं। ये मुझे भी मरवा सकते हैं। ये कुछ भी कर सकते हैं।” इसके बाद 29 जुलाई को मजीठिया मानहानि केस में पेशी से पहले केजरीवाल ने अपनी अमृतसर रैली में कहा था, “मैंने मजीठिया को ड्रग माफिया कहा। पंजाब का बच्चा-बच्चा इस बात को जानता है। अगर मजीठिया और पंजाब सरकार में हिम्मत है तो मुझे गिरफ़्तार करे।” इसी दिन, चंडीगढ़ की जनसभा में केजरीवाल ने पंजाब के राजस्व मंत्री विक्रम सिंह मजीठिया को ललकारा, “मुझे छह महीने में अरेस्ट कर लो वर्ना छह महीने बाद मैं तुम्हें अरेस्ट करूँगा।”

अब ज़रा देखिए कि यदि केजरीवाल के ऐसे बयानों के लिए प्रेरणा कहाँ से प्रेरणा पायी! बात 20 फरवरी 2014 की है। उस दिन गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अहमदाबाद में हुए बीजेपी के विजय शंखनाद युवा संगम सम्मेलन में कहा था, “दिल्‍ली में बैठे लोगों को लगता है कि एक चाय बेचने वाले का बेटा हमारे ऊपर सवाल उठा रहा है। इसी वजह से वो डरे हुए हैं और मोदी को निशाना बनाने का मौका ढूँढ रहे हैं। काँग्रेस के लोग मौके की तलाश में रहते हैं कि कब मोदी को मारा जाए, कब मोदी को पीटा जाए।” साफ़ है कि केजरीवाल की आज वही शब्दावली है जो कभी मोदी की हुआ करती थी।

राजनीतिक जीवन में वाणी का संयम रखने वाली नस्ले तो न जाने कब से विलुप्त हैं! ख़ुद को सबसे संस्कारित बताने वाले संघ परिवार के लोगों के पास तो पतित बयानों का सबसे बड़ा ज़ख़ीरा हमेशा से रहा है। महात्मा गाँधी के हत्यारों की इस ज़मात की रगों में ही तरह-तरह का झूठ और स्वाँग भरा हुआ है। दशकों तक काँग्रेस से मुँह की ख़ाने वाले इन राष्ट्रवादियों को विदेशी मूल की सोनिया गाँधी का सांसद बनना तो बर्दाश्त हो गया। लेकिन उनका प्रधानमंत्री मंज़ूर नहीं था। मानो, सांसद चाहे तो ग़ैर-राष्ट्रवादी हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री को तो भारत का जन्मजात नागरिक ही होना चाहिए। क्या इसीलिए 2004 में सुषमा स्वराज ने सिर मुड़ाकर संन्यासिन का वेष धारण करने का ऐलान नहीं कर दिया था!

संघ के संस्कारी कुलपतियों ने कभी ऐसे रवैये को अनुचित नहीं पाया! मनमोहन सरकार पर हमेशा ये इल्ज़ाम लगा कि उनका रिमोट कंट्रोल सोनिया गाँधी के निवास यानी 10 जनपथ में है। लेकिन क्या देश को ये नहीं मालूम कि नरेन्द्र मोदी सरकार का रिमोट कंट्रोल, दूर नागपुर में मौजूद संघ मुख्यालय में बैठे मोहन भागवत के पास रहता है! वैसे इसमें ग़लत भी क्या है? किसी भी पार्टी की असली सत्ता उसके सर्वोच्च नेता के पास ही रहती है। हमेशा ऐसा ही होता रहा है। भविष्य में भी ऐसा ही होगा। भारत ही नहीं, सारी दुनिया भर में ऐसा ही दस्तूर है।

अफ़सोसनाक सिर्फ़ इतना है कि संघियों का ये ख़ास चरित्र रहा है कि वो विरोधियों पर आरोप लगाते वक़्त किसी भी संयम का ख़्याल नहीं रखते। केजरीवाल भी संस्कारों से संघी ही हैं। ये बात अलग है कि राजनीति ने उन्हें मोदी विरोधी मुखौटा पहनने के लिए मज़बूर कर दिया। केजरीवाल के लघु संस्करण के रूप में ही दयाशंकर सिंह जैसे टुटपुंजियों का हौसला उफ़ान पर रहा है। बीजेपी में मौजूद तमाम टुटपुंजियों की बात छोड़िए, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कद्दावर नेता ने एक ओर तो अपने ही मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘राज-धर्म’ का पालन करने का उपदेश इसीलिए दिया था, क्योंकि 2002 में मोदी ‘राज-धर्म’ से विमुख हो गये थे। दूसरी ओर, 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ज़बरन ढहाने पर जहाँ वाजपेयी ने अफ़सोस जताया था, वहीं प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने कहा था कि ‘राम मन्दिर आन्दोलन, हिन्दुओं की भावनाओं का प्रकटीकरण है।’

काँग्रेस भी ऐसे रवैये से अछूती नहीं रही। काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर बैठे नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था। तो राहुल गाँधी ने कैसे अपनी ही सरकार के अध्यादेश को सरेआम कूड़ा बताते हुए फाड़कर फेंक डाला था! उनके पिता राजीव गाँधी ने देश का दुखड़ा रोने के लिए जो ऊपमा दी, उसका भी ख़ूब मज़ाक बना। मसलन, केन्द्र सरकार से जो एक रुपया चलता है, वो जनता तक पहुँचते-पहुँचते महज 15 पैसे रह जाता है! और, बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है! पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी की सांसद मीनाक्षी नटराजन की तारीफ़ में ‘टंच माल’ जैसे विशेषण का इस्तेमाल किया और ख़ूब खिंचाई झेली।

‘वैश्या’ शब्द को लेकर पैदा हुआ घमासान अभी जारी है। हमारी राजनीति कितनी ग़लीज़, लिज़लिज़ी और अस्वस्थ हो चुकी है कि इसे तय करना मुश्किल है। पतन का कोई ओर-छोर ही नहीं बचा! नेताओं के ऊटपटाँग बयानों की फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि शोधार्थियों का बड़ा ग्रन्थ तैयार हो जाए। समाज में फैले ऐसे सियासी कोढ़ का प्रकटीकरण पूरी तरह बेक़ाबू है। दिक़्क़त ये नहीं है कि  ऊटपटाँग बयानों की महामारी अभी कोई अचानक पैदा हुई है। इससे बड़ी चिन्ता की बात ये है कि पुराने और घिसे-पिटे लोगों की जगह देश ने जिन नये चेहरों को आज़माया, उनका भी सारा ज़ोर पराभव का नया इतिहास रचने पर ही है। ‘असली सुधार लाना’ उनकी प्राथमिकता में कहीं नज़र नहीं आता!