इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी सरकार की कश्मीर, पाकिस्तान और विदेश नीति के उन सारे दावों की हवा निकाल चुकी है, जिसकी ब्रान्डिंग संघ और बीजेपी ने अपने हिन्दू हृदय सम्राट और देश के प्रधान सेवक के लिए 2014 में की थी। और, अब तो नरेन्द्र मोदी की छवि उनके ही मंत्री राजनाथ सिंह के आगे भी पिट चुकी है। कौन भूला होगा कि नरेन्द्र मोदी ने बातें तो की थीं कि वो काँग्रेसयों की तरह पाकिस्तान को ‘लव लेटर’ नहीं लिखेंगे बल्कि उसे, उसी भाषा में जवाब देंगे जैसी वो समझता है। तो क्या अब इसे महज़ इत्तेफ़ाक है कि देश का सर्वोच्च चौकीदार बनने के बाद मोदी का ऐसा स्मृति-लोप हुआ कि वो पाकिस्तान को समझाने वाली भाषा, शब्दावली, व्याकरण, लिपि और रस-अलंकार वगैरह, सब कुछ एक साथ भूल गये! सार्वजनिक जीवन में ऐसे उदाहरण बहुत मुश्किल से मिलेंगे।

वैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अब इस बात का अहसास होने लगा है कि कश्मीर और पाकिस्तान के मोर्चे पर उनके हाथ के तोते उड़ चुके हैं। इसीलिए मोदी एक ओर तो खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे की तर्ज़ पर कहते हैं कि जितनी ग़ुलाम भारत में काँग्रेस ने मुसीबतें झेंली, उससे ज़्यादा आज़ादी के बाद बीजेपी ने झेली है! जबकि सच्चाई तो ये है कि 1947 में संघियों से अँग्रेज़ों की चापलूसी और जी-हुज़ूरी का सुख छिन गया था। ये ऐतिहासिक तथ्य जगज़ाहिर हैं कि आज़ादी के लिए भारतवासियों ने जो संघर्ष किया, उसमें संघ परिवार का योगदान नगण्य था। संघियों के पैर के नीचे से ज़मीन तो तब खिसकी, जब उन्होंने देखा कि अँग्रेज़ों ने भारत छोड़ने की तारीख़ तय कर दी। इसके बाद, काँग्रेस के सबसे बड़े नेता महात्मा गाँधी पर संघियों ने इसलिए निशाना साधा कि वो दिल पर पत्थर रखकर ही सही, लेकिन देश के विभाजन के लिए तैयार हो गये थे। गाँधी की तो हत्या के पीछे भी संघी ही थे।

दूसरी ओर, सत्ता में आने के बाद मोदी ने ख़ूब ढोल पीटा कि 60 साल में काँग्रेस ने कुछ नहीं किया। लेकिन जब देश को उनकी बातों पर यक़ीन नहीं हुआ तो अब पैतरा बदल लिया है कि वो पिछली सरकार की योजनाओं को आगे बढ़ाते रहेंगे। साफ़ है कि मोदी, किसी ग़लत या ख़राब योजना को क्यों आगे बढ़ाना चाहेंगे? मोदी को अब अहसास हो रहा है कि 2014 का जनादेश जितना उनके पक्ष में था, उससे कहीं ज़्यादा काँग्रेस के विरोध में था। तब जनता काँग्रेस को सत्ता से बाहर करना चाहती थी। बीजेपी और मोदी उसे एकलौते विकल्प के रूप में दिखे। जनता के इनके वादों-इरादों पर यक़ीन किया। 30 साल बाद उस पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनवा दी, जो संघ के रूप में 1925 से ही राजनीतिक शीर्ष पर पहुँचने की लगातार नाक़ाम कोशिशें कर चुकी थी।

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बेशक़, सत्ता परिवर्तन, भारतीय लोकतंत्र की ताक़त और महानता है। मोदी राज का अभी आधा वक़्त भी नहीं बीता कि संघ को अपने कार्यकर्ताओं के विशाल नेटवर्क से पता रहा है कि मोदी सरकार की प्रतिष्ठा में बहुत तेज़ी से गिरावट आ रही है। जनता को मोदी की ज़ुमलेबाज़ी की हक़ीक़त समझ में आने लगी है। मज़े की बात ये है कि जनता के बदलते मिज़ाज़ की नब्ज़ को मोदी सरकार के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बख़ूबी भाँप लिया। राजनाथ जान चुके थे कि प्रधानमंत्री का अचानक लाहौर जाना और बदले में पठानकोट हमले की सौग़ात मिलने से नरेन्द्र मोदी का वो गुब्बारा फूट गया कि वो पाकिस्तान के साथ जैसे को तैसा वाला सलूक करेंगे। ऐसे ख़ालीपन को भरने के लिए राजनाथ, इस्लामाबाद तो गये, लेकिन वहाँ की सरकारी दावत को ठुकरा दिया। अब उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए उन्हें मोदी से ज़्यादा पाकिस्तान विरोधी बनाकर पेश करने की तैयारी है। यही है राजनाथ के आगे मोदी की छवि का पिट जाना। अरूण जेटली ने भी यही भाँपकर अपना पाकिस्तान दौरा रद्द कर दिया था।

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साभार: नवभारत टाइम्स

संसद के मॉनसून सत्र के ख़त्म होते-होते नरेन्द्र मोदी के पास भी ये जानकारी पहुँचने लगी कि उनकी पाकिस्तान और कश्मीर नीति की नाक़ामी की वजह से जनता में उनकी सख़्त छवि का बहुत पतन हो चुका है। इसीलिए पहले सर्वदलीय बैठक में और फिर लाल क़िले के भाषण में बलूचिस्तान के उस मुर्दा मुद्दे में जान फूँकी गयी, जिसके बारे में जुलाई 2009 में बीजेपी के नेताओं ने मनमोहन सिंह सरकार की ज़बरदस्त फ़ज़ीहत की थी। तब लोकसभा में लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और यशवन्त सिन्हा ने और राज्यसभा में अरूण जेटली ने कहा था कि यूपीए सरकार ने शर्मल-शेख़ (मिस्र) के द्विपक्षीय बयान में ‘बलूचिस्तान’ का नाम लेकर देश-हित की धज़्ज़ियाँ उड़ा दीं। सुषमा ने तो यहाँ तक कहा, ‘मनमोहन सिंह जी, आपने तो शर्मल-शेख़ में देश की पगड़ी को ही गिरवी रख लिया।’

लेकिन अब वही बीजेपी और उसके आहत नेता नरेन्द्र मोदी, बलूचियों के मानव अधिकारों का मुद्दा ऐसे उठा रहे हैं कि काँग्रेस भी दाँतों तले अँगुली दबा ले। मज़े की बात है कि बीजेपी ऐसे यू-टर्न लेने में माहिर है। संघियों का रुख़ ऐसा बदलता है, जैसे महज़ एक पोशाक हो। काँग्रेस की विदेश निवेश (FDI) नीति का भी बीजेपी ने ज़ोरदार विरोध किया था। वैसे ही जैसे, वस्तु और सेवा कर (GST) में मामले में था। इसी तरह, आतंकवाद पर सख़्ती दिखाने वाले कन्धार जाकर इतिहास रचते हैं। भ्रष्टाचार की बातें करने वालों को मध्य प्रदेश का व्यापमं, छत्तीसगढ़ का आंगनवाड़ी और गुजरात के ज़मीन बाँटों घोटाले नहीं दिखते हैं। लेकिन जनता तो सब देख रही है। बहरहाल, तथ्य सिर्फ़ इतना है कि चाल, चरित्र और चेहरा की बातें-बनाने वालों का एकमात्र लक्ष्य है कि जनता को उल्लू बनाकर और साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़कर हिन्दू मतदाताओं को बरगलाना। ताकि, इन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता की मलाई खाने को मिलती रहे!