भारत में आत्महत्या करना या इसकी कोशिश करना अपराध है। मणिपुर की आन्दोलनकारी इरोम शर्मिला पर यही आरोप है कि वो आन्दोलन की आड़ में आत्महत्या करना चाहती थीं। अब शर्मिला का 16 साल चला अनशन ख़त्म हो चुका है। लेकिन उस प्रसंग में छिपा क़ानून इस मायने में विचित्र है कि आत्महत्या ऐसा अपराध है जिसे कर लेने वाले को कोई सज़ा नहीं दी जा सकती। अलबत्ता, जो आत्महत्या करने में नाकाम रह जाए, उसे सज़ा से नवाज़ा जा सकता है!

मोदी सरकार के सबसे प्रबुद्ध मंत्रियों में से एक युवा और खेल मंत्रालय के प्रभारी महामाननीय विजय गोयल अब ये जाँच करवाएँगे कि देश की मैराथन धाविका ओपी जैशा के साथ रियो में ऐसा सलूक़ क्यों हुआ जिससे वो मरते-मरते बचीं! दूसरे शब्दों में कहें तो जाँच दल ये पता लगाएगा कि अय्याशी करने रियो गये भारतीय एथलेटिक्स संघ (AFI) के कौन-कौन से ऐसे निकम्मे पदाधिकारी हैं, जिन्होंने ये सुनिश्चित नहीं किया कि पानी या इनर्ज़ी ड्रिंक के बग़ैर 42 किलोमीटर का मैराथन पूरा करने वाली जाँबाज़ जैशा आख़िर जीवित कैसे बच गयी? इन लोगों ने तो उसकी आत्महत्मा के लिए ज़रूरी किसी भी इन्तज़ाम में कोई कसर नहीं छोड़ी थी! फिर भी मन की मुराद पूरी क्यों नहीं हुई?

AFI में बेशर्म, क़मीने और भ्रष्ट पदाधिकारियों की कोई कमी कभी नहीं रही! ये सच्चाई कौन नहीं जानता। इस पूत के पाँव किसने पालने में नहीं देखे हैं। एथलेटिक्स का हमारा प्रदर्शन और उपलब्धियाँ ये बताने के लिए काफ़ी हैं कि एथलेटिक्स फैडरेशन ऑफ़ इन्डिया को कितने पतित लोग चलाते हैं। उन्हीं की उपलब्धियों पर इतराने के लिए खेल मंत्री विजय गोयल लाखों रुपये के सरकारी ख़र्च पर रियो गये थे। प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी के लिए इतने दिन रियो में रहना मुमकिन नहीं होता, इसीलिए उन्होंने विजय गोयल के अलौकिक तेज़ को देखते हुए उन्हें सेल्फ़ियाँ खिंचवाने के लिए रियो भेज दिया। ज़ुमलेबाज़ों की ये जमात इसी मुग़ालते में जीती है कि निक्कमें लोगों की महज़ मौजूदगी से ही देश की तस्वीर बदल जाएगी! भारत में तो बदल पा नहीं रही, रियो में क्या ख़ाक़ बदलती!

Vijay Goyal_Jaisha

जैशा के प्रसंग से पहले भी देश के महाज्ञानी खेल मंत्री विजय गोयल की हरक़तों की वजह से भारतीय दल को बेहद गम्भीर चेतावनी से भी नवाज़ा जा चुका था। कल जैसे ही जैशा का ये बयान मीडिया पर वायरल हुआ कि वो रियो में मरते-मरते बची। तब पहली प्रतिक्रिया स्वरूप विजय गोयल ने कहा, “ये फैडरेशन का काम था। उसे इस बात का ख़्याल रखना चाहिए था।” अब गोयल से भला ये कौन पूछे कि जब आपका कोई काम ही नहीं था, न आपकी कोई ज़िम्मेदारी है और न ही जवाबदेही तो फिर आप रियो करने क्या गये थे? सेल्फ़ियाँ खिंचवाने ही न? यही काम करने के लिए हरियाणा के खेल मंत्री अनिल विज़ भी रियो गये। लेकिन जब साक्षी मलिक अखाड़े में जूझ रही थी, तब अनिल विज़ रियो के एक पुरुष पार्लर में अपना सौन्दर्य निखरवा रहे थे। साफ़ है कि बीजेपी के इन दोनों नेताओं ने रियो का चक्कर इसलिए काटा कि वहाँ राम नाम यानी अय्याशी की लूट है, लूट सके तो लूट!

Anil Viz

विजय गोयल के कल के बयान के बाद जब ख़ूब थूका-फ़ज़ीहत हुई तो आज उन्होंने जाँच का ऐलान कर दिया कि ज़रा पता लगाया जाए कि भारतीय मैराथन धाविका ओपी जैशा की प्रतिस्पर्धा के वक़्त भारतीय सपोर्ट स्टॉफ़ मौक़े से नदारद होकर कहाँ रंगरेलियाँ मना रहा था? विजय गोयल की ऐसी जाँच के ऐलान का हश्र क्या होगा, इसकी बानगी भी कल उसी वक़्त मिल गयी, जबकि जैशा के साथ हुए बर्ताव के बारे में AFI के सचिव सीके वाल्सन ने कहा कि “जैशा या उनके कोच की ओर से रास्ते भर पानी और इनर्जी ड्रिंक मुहैया करवाने की कोई माँग नहीं की गयी थी। इसका इन्तज़ाम आयोजकों की ओर से किया जाना था।”

अब इस महा-निखट्टू वाल्सन को क्या ये अलग से बताया जाना ज़रूरी था कि खिलाड़ियों से ये अपेक्षित होता है कि वो अपने देश के स्टॉल की ओर से उपलब्ध करवाया गया पानी और इनर्जी ड्रिंक ही इस्तेमाल करें क्योंकि किसी और की ओर से मुहैया करवाने गये पानी और इनर्जी ड्रिंक की वजह से डोप टेस्ट में फँसने का ख़तरा हो सकता है। लेकिन खेल संघों में बैठे अय्याशों को यदि अपनी फ़र्ज़ याद रखने की आदत होती तो आज देश में खेलों और खिलाड़ियों की ऐसी दुर्दशा ही क्यों होती? चौकीदार सही हो और अपना काम करे तो चोरी कैसे हो सकती है!

हमारे खेलों से जुड़े अफ़सर कितने पतित हो सकते हैं, इसका नज़ारा भी ओपी जैशा के मामले में दिख गया। अफ़सरों को ये कहने में कोई शर्म नहीं आयी कि जैशा ही झूठे इल्ज़ाम लगा रही हैं। इससे आहत जैशा ने कहा कि मैंने अपने पूरे खेल करियर में कभी किसी के बारे में कोई शिकायत नहीं की। लेकिन हमारा तो समाज ही ऐसा है, इसने तो सीता पर भी आरोप लगाने में कौन सा संकोच किया था। धूर्तों की जमात ने जैसे त्रेता युग में सीता को अग्नि-परीक्षा देने के बाद भी नहीं बख़्शा, वैसे ही ये जैशा के शील-स्वभाव को भी तार-तार करने पर आमादा हैं।

दलील दी जा सकती है कि खेलों की दुर्दशा कोई अकेले मोदी राज की देन तो है नहीं। बिल्कुल सही। ये कोढ़ तो पिछली सरकारों में भी था। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि पहले कभी देश की क़मान नरेन्द्र मोदी जैसे ओजस्वी महापुरुष के पास नहीं थी! अब यदि बड़ी-बड़ी ज़ुमलेबाज़ी करके सत्ता में आये महानुभावों का हाल पहले वालों से भी गया-बीता है तो क्या ये साबित नहीं होता कि मोदी निज़ाम का असली मक़सद जनता को उल्लू बनाकर सत्ता हथियाने के सिवाय और कुछ नहीं था। इसीलिए यदि मोदी राज में ज़रा भी ग़ैरत बची है तो इसे फ़ौरन विजय गोयल और अनिल विज़ जैसों को सरकार से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। साथ ही, महासंघ के पदाधिकारियों के ख़िलाफ़ आपराधिक लापरवाही का मुक़दमा चलाकर उन्हें इतनी सख़्त सज़ा देनी चाहिए कि वो मिसाल बन जाए। वैसे कहना मुश्किल है कि ढपोर-शंखों की इस जमात से ऐसी उम्मीदें पालना कितना मुनासिब होगा!