डेढ़ महीने से कश्मीर जल रहा है। वहाँ आग क्यों लगी? कैसे फैली? अब तक उसने क्या-क्या फूँक डाला? इसे तो सभी देख और जान रहे हैं। लेकिन महबूबा मुफ़्ती और नरेन्द्र मोदी की सर्वशक्तिमान सत्ताएँ भी अभी तक कश्मीर की आग पर काबू क्यों नहीं पा सकीं? ये सवाल बेहद मौजूँ हैं। ये किसी से छिपा नहीं है कि कश्मीर में आग लगाने और उसे लगातार भड़काये रखने की नापाक हरक़ते सीमापार पाकिस्तान से हो रही हैं। लेकिन पड़ोसी की ऐसी काली करतूतों का इतिहास भी उतना ही पुराना है, जितना कि वो ख़ुद है। लिहाज़ा, सिर्फ़ उसे ज़िम्मेदार ठहराने से बात नहीं बनेगी। हमें अपनी ख़ामियों को भी खंगालना होगा।

बीते 45 दिनों में जम्मू-कश्मीर की पीडीपी-बीजेपी सरकार ने सबसे बड़ी नादानी प्रेस और मीडिया को अप्रासंगिक बनाकर, अख़बारों पर सेंसर लगाकर और पत्रकारों पर अंकुश लगाकर दिखायी। केन्द्र और राज्य दोनों की सरकार का ये बेहद अदूरदूर्शी और बचकाना फ़ैसला रहा। सरकार में बैठे अनुभवहीन लोगों ने तय किया कि तब तक मीडिया का मुँह ज़बरन बन्द करवा दिया जाए, जब तक कि कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हो जाते। मीडिया के प्रति ऐसे रवैये ने आपातकाल की यादें ताज़ा करवा दीं। इन्दिया गाँधी की इमरजेंसी की न सिर्फ़ 1975 में ख़ूब निन्दा हुई बल्कि आज भी उस दौर का ज़िक्र करके काँग्रेस को दमनकारी बताया जाता है।

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नरेन्द्र मोदी सरकार की शोहबत में अपने बहुमत के आगे सबको कीड़ा-मकोड़ा समझने की बीमारी महबूबा मुफ़्ती को भी हो चुकी है। यही रवैया कश्मीर का सत्यानाश करवा रहा है। भक्त मीडिया तो इसे समझ ही नहीं सकता क्योंकि उसकी आँखों पर हर हाल में मोदी का गुणगान करने की ऐसी पट्टी बँधी है, जैसी गान्धारी ने अपनी आँखों पर बाँधी थी। मीडिया का दमन होने से न सिर्फ़ जनता से उसकी आवाज़ छिन जाती है, बल्कि जनता का दुःख-दर्द भी सत्ता तक पहुँचना बन्द हो जाता है। राजनेताओं को सिर्फ़ वही बातें पता चलती हैं, जो अफ़सरों की बदमिज़ाज़ फौज़ उन्हें बताती है।

मीडिया को निष्प्रभावी बनाने से जनता आधा-अधूरा सच भी जनता तक नहीं पहुँचता है। सही सूचना नहीं मिलने से उस झूठ और अफ़वाहों की चाँदी हो जाती है, जिससे भारत को आतंकित करने में पाकिस्तान को महारत हासिल है। लिहाज़ा, मीडिया और संचार साधनों पर बन्दिशें लगाकर हम पाकिस्तान को छद्म-युद्ध (Proxy War) की शर्तें तय करने का मौका दे देते हैं। पाकिस्तान की तो ख़्वाहिश ही यही है कि भारत उसके झूठों और अफ़वाहों से निपट न पाए। नतीज़तन कश्मीर जलता ही रहे। ताकि वो अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर कश्मीर को लेकर मातम मना सके। फ़िलहाल, पाकिस्तान को इस मक़सद में उम्मीद से ज़्यादा क़ामयाबी मिल रही है।

अब ज़रा कश्मीर की तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी ग़ौर करें। निःसन्देह वो भारत का ऐसा अभिन्न इलाका है, जहाँ डेढ़ महीने से कर्फ़्यू लगा हुआ है। सुरक्षा बल भी गहरे तनाव और दबाव में हैं। जान-माल का कितना नुकसान हुआ, इसकी तो बात ही करना फ़िज़ूल है। सरकारी कर्मचारियों की तो तनख़्वाहें पक्की हैं। लेकिन आम आदमी की अर्थव्यवस्था और रोटी-रोज़गार बुरी तरह चरमरा चुका है। लेकिन मीडिया की लाचारी देखिए कि वो जनता की आपबीती को सामने नहीं ला सकती। सरकार में अफ़सरों और नेताओं को यही डर खाये जा रहा है कि यदि मीडिया को उसका काम करने दिया गया तो उनके ख़िलाफ़ जनता का और गुस्सा फूट पड़ेगा।

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अब नादान अफ़सरों को ये भला कौन समझाए कि जब किसी घाव में अत्यधिक मवाद जमा हो जाए तो उसे शरीर से बाहर निकलने का रास्ता देने में ही समझदारी है। जब तक ये मवाद जिस्म से बाहर नहीं निकलेगा, जब तक चाहे जितनी दवा दे दी जाए, घाव ठीक नहीं होगा। समाज के मवादों को जिस्म से बाहर निकालने और फिर मरहम-पट्टी करके घाव का उपचार करने में मीडिया और संचार माध्यम बेहद मददगार साबित होते हैं। बशर्ते, सत्ता में बैठे लोगों को मीडिया मैनेज़मेंट का हुनर आता हो।

मिसाल के तौर पर, 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त जेम्स माइकल लिंगदोह से कहा था कि जम्मू-कश्मीर के चुनाव बिल्कुल साफ़-सुथरे करवाइए। मतदाता सूची यथासम्भव दुरुस्त होनी चाहिए। चुनाव की निष्पक्षता पर कोई अंगुली नहीं उठनी चाहिए। कोई भी पार्टी चुनाव जीते या हारे, लेकिन चुनाव ऐसे हों कि पूरी दुनिया उसकी तारीफ़ करे। विदेशी पर्यवेक्षकों को भी दावत दीजिए कि वो देखें कि जम्मू-कश्मीर के चुनाव में कोई हेरा-फ़ेरी नहीं है। दरअसल, उससे पहले जम्मू-कश्मीर के चुनावों पर हमेशा बेईमानी की तोहमत लगा करती थी। 2002 के चुनाव में मतदान तो सिर्फ़ 44 फ़ीसदी हुआ, लेकिन चुनाव की निष्पक्षता पर कोई कलंक नहीं लगा। इसने लोकतंत्र को बहुत मज़बूती दी।

उस वक़्त वाजपेयी सरकार ने मीडिया घरानों को मैनेज़ करके कहा था कि वो कश्मीर के चुनावों की ख़ूब कवरेज़ करें। व्यवस्था की किसी भी ख़ामी को सामने लाने से कोई गुरेज़ नहीं करें। नौकरशाहों से कहा गया कि वो मीडिया की हरेक ख़बर को अपनी आँखें खोलने वाला समझें। मीडिया को जन-भावनाओं का दूत समझें, व्यवस्था का दुश्मन नहीं। वाजपेयी सरकार का ये रवैया रंग लाया। लिंगदोह साहब ने आतंक के साये में जी रहे कश्मीर में इतने साफ़-सुथरे चुनाव करवाये कि दुनिया में भारतीय लोकतंत्र और चुनावों की गरिमा बढ़ी। चुनाव का बहिष्कार करने और मतदान से दूर रहने की अलगाववादियों की सारी धमकियाँ बेकार साबित हुईं। इस तरह, भारतीय लोकतंत्र में साझेदार बनकर कश्मीरी जनता ने पाकिस्तान के चेहरे पर ज़ोरदार तमाचा जड़ा।

तब मीडिया को देश का अहम हिस्सा माना गया। जबकि आज के हुक़्मरान उसे देश का दुश्मन समझ रहे हैं। इसकी बड़ी वजह ये है कि मोदी सरकार का चरित्र ही है मीडियाकर्मियों का धर्म देखकर उनकी राष्ट्रीयता तय करना। बीजेपी का नज़रिया ये है चूँकि कश्मीर के ज़्यादातर मीडियाकर्मी मुसलमान हैं, लिहाज़ा जब वो सरकार के कामकाज़ की बखिया उधेरेंगे, तो भगवा सम्प्रदाय की पाखंडी राष्ट्रवादी छवि को नुकसान पहुँचेगा। लिहाज़ा, ‘न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी’ की तर्ज़ पर मीडिया को कश्मीर में लगी आग की रिपोर्टिंग मत करने दो। कर्फ़्यू पास देने के बावजूद मीडिया को जनता के बीच मत जाने दो, उन्हें जनता की आवाज़ मत बनने दो, उन्हें स्टोरीज़ सामने मत लाने दो। इसीलिए रोज़ाना तबाही का नया मंज़र झेल रही जनता न सिर्फ़ अपनी ही सरकार से बल्कि मीडिया से भी बेईन्तहा ख़फ़ा है। उसका गुस्सा सुरक्षाबलों पर फूटता है। जबकि सुरक्षाबलों की मज़बूरी है कि उन्हें उपद्रवियों पर सख़्ती दिखानी पड़ती है। वैसे भी जिनके हाथों में बन्दूकें हों, वो किसी को भी मरहम कैसे लगा सकते हैं! मरहम लगाने का काम तो किसी और को ही करना होता है। मीडिया भी उनमें से एक होता है।