Modi-Mehbooba-27Aug2016  कैसे ‘बेपेन्दी का लोटा’ बन गयी है मोदी सरकार की कश्मीर नीति? Modi Mehbooba 27Aug2016

महबूबा मुफ़्ती ने रविवार को कहा कि ‘कश्मीर के जो लोग हिंसा का रास्ता छोड़कर शान्ति-बहाली में मदद के लिए तैयार हैं, उनसे बातचीत की जानी चाहिए। यदि अलगाववादी भी शान्तिपूर्ण समाधान चाहते हैं तो बातचीत की प्रक्रिया में उन्हें भी शामिल करने से कोई परहेज़ नहीं होना चाहिए।’ बतौर मुख्यमंत्री महबूबा के इस बयान का बहुत गहरा अर्थ है। इसमें कश्मीर और पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार के रवैये में एक और बदलाव की भनक मिल रही है।

अब सबसे अहम सवाल यही है कि क्या महबूबा मुफ़्ती ने बीजेपी से मशविरा करके उपरोक्त बयान दिया है? क्योंकि ये किसी से छिपा नहीं है कि कश्मीरी अलगाववादियों का सियासी चेहरा हुर्रियत कान्फ्रेंस ही है। यही पाकिस्तान के इशारे पर भारत में अलगाववाद की आग लगाता और फैलाता है। अभी कश्मीर में जारी उपद्रव और पत्थरबाज़ी के पीछे भी हुर्रियत और उसका अफ़वाह तंत्र ही है। हुर्रियत को उसकी औक़ात दिखाने के लिए मोदी सरकार ने 25 अगस्त 2014 को इस्लामाबाद में होने वाली भारत-पाक विदेश सचिव स्तरीय बातचीत को हफ़्ते भर पहले रद्द कर दिया था। इसकी वजह ये थी कि पाकिस्तान के दिल्ली स्थित उच्चायुक्त ने हुर्रियत नेताओं से  बातचीत की थी।

तब भारत ने हुर्रियत को कश्मीर समस्या का एक पक्षकार तक मानने से इनकार कर दिया था। इसी तेवर को उस वक़्त भी हवा दी गयी जब मोदी सरकार ने कहा कि पाकिस्तान के साथ सिर्फ़ सीमा पार से आ रहे आतंकवाद और पाक अधिकृत कश्मीर से उसकी बेदख़ली के अलावा और कोई बात नहीं की जाएगी। मज़े की बात ये भी है कि तब से अब तक पाकिस्तानी हुक़्मरानों के साथ हुर्रियत के नेताओं की भेंट-मुलाक़ात और उन्हें मिलने वाला आर्थिक, सैनिक और राजनीतिक समर्थन कोई नया नहीं है। पहले भी हुर्रियत के नेता अपने पाकिस्तानी आक़ाओं से भारत में और बाहर भी मिलते-जुलते रहे हैं। अभी पत्थरबाज़ी में लगे कश्मीरी युवाओं को हुर्रियत के ज़रिये ही रोज़ाना 300 से 700 रुपये की दिहाड़ी दी गयी। इस लिहाज़ से पाकिस्तान ने 51 दिन के कर्फ़्यू के लिए मोटी रक़म कश्मीर में ठेली है।

Rajnath-Mehbooba  कैसे ‘बेपेन्दी का लोटा’ बन गयी है मोदी सरकार की कश्मीर नीति? Rajnath Mehbooba

इन्हीं तथ्यों के मद्देनज़र ये सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या पीडीपी-बीजेपी सरकार ने अलगाववादियों से बातचीत की पेशकश करके फिर से अपना पैंतरा बदला है? क्या कश्मीर और पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार की देसी-विदेशी नीति में फिर से बदलाव लाने की कोशिश हो रही है? महबूबा मुफ़्ती को चंगू-मंगू नेता नहीं माना जा सकता। वो भारत के अभिन्न राज्य जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं। संवैधानिक पद पर आसीन हैं। और, सबसे बढ़कर केन्द्र में सत्तासीन बीजेपी की प्रादेशिक सहयोगी हैं। अभी शनिवार को ही उन्होंने प्रधानमंत्री से रूबरू बातचीत की है। मोदी की शान में बयान दिये हैं। उनसे एक मौक़े की मोहलत माँगी है। ज़ाहिर है, महबूबा-मोदी की बातचीत में हुर्रियत के प्रति रूख पर भी चर्चा हुई ही होगी।

तभी तो बैठक के बाद महबूबा ने हुर्रियत का नाम लिये बग़ैर कहा कि जो पत्थरबाज़ी करवा रहे हैं, उन्हें भी कश्मीरी लोगों को जवाब देना पड़ेगा। महबूबा का ज़ोर था कि बातचीत का दायरा पहले से बेहतर और उस ‘कड़ी’ को जोड़ने वाला होना चाहिए जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे छोड़ा था। वाजपेयी के ज़माने में तो सरकार ने इस बात का भी मन बना लिया था कि यदि पाकिस्तान राज़ी हो जाए तो नियंत्रण रेखा को ही अन्तर्राष्ट्रीय सीमा मान लिया जाए। लेकिन वो दाल गली नहीं। तो अब मोदी के पिटारे में नया क्या है? पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान से खाली कराने की बात वो कह चुके हैं। बलूचिस्तान का मुद्दा उछाड़कर उन्होंने नीतिगत बदलाव के संकेत दिया है।

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हालाँकि इसकी तैयारी ख़ासा पहले कर ली गयी थी। तभी तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपना पद सम्भालने से पहले फरवरी 2014 में कहा था कि पाकिस्तान के लिए एक और मुम्बई हमले का अंज़ाम बलूचिस्तान खोना हो सकता है। इससे पहले भारत ने बलूचिस्तान के मामलों से दूरी रखी थी। यदा-कदा मुद्दा उठा भी तो तेवर आक्रामक नहीं थे। पाकिस्तान हमेशा से भारत को बलूचिस्तान की अशान्ति के लिए ज़िम्मेदार ठहराता रहा है। साफ़ है कि विदेश नीति में अहम बदलाव के मुताबिक़ ही अब बलूचिस्तान को मुद्दा बनाने की दीर्घकालिक रणनीति बनी होगी। इसीलिए मोदी सरकार सोच-विचारकर ही नये पैंतरे अपना रही है।

ये पैंतरे सफ़ल होंगे या नहीं, या फिर इनका क्या अंज़ाम होगा? ये तो आने वाले दशकों में ही पता चलेगा। लेकिन इतना तो दिख ही रहा है कि मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति में पूरी कोशिश लीक से हटकर चलने की है। वो बात अलग है कि अभी तक लीक से हटने की जो भी कोशिशें हुईं, उससे मोदी सरकार की किरकिरी ही करायी। मसलन, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की बातें करने वालों की भाषा कैसी है? उसे ‘लव लेटर्स’ नहीं लिखने की बात करने वालों ने लाहौर जाकर क्या किया? पठानकोट में क्या हुआ? ISI की टीम ने कैसे भारतीय जाँच दल को गच्चा दिया? संयुक्त राष्ट्र में क्या-क्या हुआ? NSG की बैठक में कैसे पाकिस्तान को खुश करने के लिए चीन ने भारतीय कोशिशों में खुड़पेंच लगाये? ये सब कुछ देश देख चुका है।

Kashmir unrest  कैसे ‘बेपेन्दी का लोटा’ बन गयी है मोदी सरकार की कश्मीर नीति? Kashmir unrest

इस वक़्त सिर्फ़ एक ही हवा पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बह रही है और वो है अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते। बेशक, ये अपने सबसे ख़राब स्तर पर है। लेकिन चीन, बेशर्मी की हरेक हद्द पार करके तन-मन-धन से पाकिस्तान के पीछे खड़ा है। बेशक़, ऐसा बलूचिस्तान के इकोनॉमिक कॉरिडोर से जुड़े उसके आर्थिक और सामरिक हितों की वजह से है। लेकिन यही वजह दशकों तक मसले को उलझाये रखेगी। कुलमिलाकर, पाकिस्तान और कश्मीर के मोर्चे पर बुरी तरह से मुँह की खा चुकी मोदी सरकार, बलूचिस्तान को डूबते को तिनके के सहारे के रूप में देख रही है। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए ‘संघी अफ़वाह तंत्र’ की बदौलत झूठ फैलाया जाएगा कि पाकिस्तान के प्रति मोदी सरकार ‘जैसे को तैसा’ वाली नीति से चल रही है। यानी वो कश्मीर को हमसे ज़ुदा करने की फ़िराक़ में है तो हम भी बलूचिस्तान में लगी आग को भड़काएँगे।

लेकिन अफ़सोस कि बीजेपी का ख़याली पुलाव कभी पकता नहीं! लम्बी-लम्बी हाँकने के अलावा इस निज़ाम को शायद ही कुछ और आता हो! नया और बड़ा करने के चक्कर में इनकी अनुभवहीनता तथा दुराग्रह और बेपर्दा हो जाती है। इसी सोच के तहत अब जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एन एन वोहरा को बलि का बकरा बनाने की जुगत भी सोची जा रही है। लेकिन इन नादानों को अब ये कौन समझाये कि चिड़िया उनके उन खेतों को चुग चुकी है, जहाँ वो झूठ की खेती करते हैं। 51 दिन तक चला ऐतिहासिक कर्फ़्यू भी महबूबा-मोदी सरकार के लिए ताबूत की आख़िरी क़ील ही साबित होगा!