long-que-in-banks-1  नोटबन्दी से यदि आप परेशान हैं तो छह महीने तक तकलीफ़ झेलने के लिए तैयार रहिए Long Que in Banks 1

रिज़र्व बैंक की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2016 तक भारतीय अर्थव्यवस्था में 500 और 1000 के कुल 16.24 लाख करोड़ रुपये के नोट थे। इन्हें ही 9 नवम्बर से बन्द किया गया है। देश में प्रचलित हरेक तरह के कुल नोटों में से बन्द किये जा चुके 500 और 1,000 रुपयों की हिस्सेदारी क़रीब 86 प्रतिशत है। यानी भारतीय अर्थव्यवस्था में 100, 50, 20, 10, 5, 2 और एक रुपये के जितने भी नोट और सिक्के प्रचलन में हैं उन सभी की घरेलू मुद्रा उपलब्धता के लिहाज़ से हिस्सेदारी सिर्फ़ 14 फ़ीसदी रुपयों के बराबर है। इसीलिए नोटबन्दी के बाद बाज़ार और अर्थव्यवस्था में जो मायूसी दिख रही है वो मुख्यरूप से इसी 86% मुद्रा के अचानक अवैध ठहराये जाने और नदारद होने की वजह से है। राष्ट्रव्यापी सरगर्मी, परेशानी और किस्म-किस्म के सच्चे-झूठे प्रचार की दूसरी वजह है पुराने नोटों की जगह लेने वाले नये नोटों की भयंकर क़िल्लत।

वित्त मंत्री अरुण जेटली भले ही ये कहकर अपना और मोदी सरकार का बचाव करें कि नोटबन्दी की नीति को इससे बेहतर ढंग से लागू नहीं किया जा सकता था, लेकिन ज़मीनी सच्चाई ये है कि नये नोटों की भयंकर क़िल्लत है। इसका सबसे सीधा-साधा सबूत है कि बैंकों के पास भी नये नोटों की माँग को पूरा करने की क्षमता नहीं है। ATM के बाहर लम्बी क़तारें भी इसीलिए हैं कि अचानक नये नोट की माँग बेतहाशा बढ़ गयी है। जितनी माँग है उतने नोट उगलना देश भर में फैले 2.2 लाख ATMs के बूते का है ही नहीं। इसकी दो वजह हैं पहला नये नोटों की क़िल्लत और दूसरा सभी ATMs को नये नोटों के अनुरूप बनाना यानी उनका Recalibration करना। मुमकिन है कि Recalibration का काम तो महीने भर में हो भी जाए, लेकिन नये नोटों की क़िल्लत तो तब तक बनी ही रहेगी जब तक कि कम से कम 10 लाख करोड़ रुपये के नये नोट बाज़ार में यानी प्रचलन में नहीं आ जाते!

नये नोटों की भयंकर क़िल्लत आम जनता को ही नहीं बैंकों को भी झेलनी पड़ रही है। इसीलिए बैंक भी हमें 24 हज़ार रुपये तक नहीं दे पा रहे हैं। कई जगहों पर वो एक दिन टोकन देते हैं तो दूसरे दिन रक़म या छोटे नोट और सिक्के देकर अपनी लाज बचा रहे हैं। बाज़ार में ग्राहक इसलिए नहीं पहुँच रहे हैं क्योंकि उनके पास पर्याप्त नयी मुद्रा नहीं है। जिनके पास थोड़ी-बहुत वैध मुद्रा है भी, वो भी फ़िलहाल बेहद ज़रूरी चीज़ों को ही ख़रीद रहे हैं और नये नोटों को तब तक बचाये रखना चाहते हैं, जब तक कि नोटों की क़िल्लत दूर नहीं हो जाती। ये माहौल उस बदहवाश ख़रीदारी (Panic buying) के बिल्कुल उल्ट है, जो उस वक़्त होता है जब कोई ज़रूरी चीज़ अचानक बहुत महँगी होने लगती है। Panic Buying में सामान्य लोग भी चाहते हैं कि थोड़ा अधिक ख़रीदकर रख लें। लेकिन अभी नये नोट की तंगी की वजह से लोग उतनी ही ख़रीदारी कर रहे हैं, जिसके बग़ैर उनका काम चलाना मुश्किल होता है।

रिज़र्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़, नोटबन्दी के लागू होने वाले दिन यानी आठ नवम्बर तक देश में 500 रुपये वाले 1650 करोड़ नोट और 1000 रुपये वाले 670 करोड़ प्रचलन में थे। इसे मूल्य के हिसाब से देखें तो रक़म क्रमशः 8.25 लाख करोड़ रुपये और 6.70 लाख करोड़ रुपये बैठती है। दोनों को जोड़ें तो कुल नोट जहाँ 2320 करोड़ थे वहीं इनका क़ीमत 14.95 लाख करोड़ रुपये बैठती है। अब यदि रिज़र्व बैंक के छापाख़ानों की रोज़ाना की अधिकतम छपाई क्षमता दस करोड़ नोट छापने की है तो इस दर से उसे 2320 करोड़ नोट छापने में 232 दिन लगेंगे। वो भी तब जबकि लगातार पौने आठ महीने तक छपाई पूरी क्षमता पर ही होती रहे। ये इस बात पर भी निर्भर करेगी कि इस दौरान नोट छापने वाले काग़ज़ की कोई क़िल्लत सामने न आये और छपाई करने वाली मशीनों में कोई बड़ी ख़राबी पैदा नहीं हो। यदि दुर्भाग्यवश भी ऐसा हो गया तो नये नोटों की छपाई का वक़्त और बढ़ जाएगा। साफ़ है कि किसी भी सूरत में नये नोट की क़िल्लत कम से कम छह महीने तक तो बनी रहेगी। छह महीने में भी ज़्यादा से ज्यादा 1,800 करोड़ नये नोट ही प्रचलन में आ पाएँगे। ये भी पुराने नोटों के मुक़ाबले 22 फ़ीसदी कम होगा। अर्थव्यवस्था के लिए इतनी तंगी बहुत मायने नहीं रखेगी। लेकिन मज़े की बात ये भी है कि यदि इसी दौरान रिज़र्व बैंक ने यदि 500 रुपये की जगह100 रुपये का नोट छापने का निर्णय लिया तो फिर उसमें पाँच गुणा ज़्यादा वक़्त भी लगेगा।

नये नोट की कमी की वजह से फल-सब्जी जैसे जल्दी ख़राब होने वाले सामानों की बिक्री सबसे अधिक प्रभावित हुई है। इससे किसानों की हालत सबसे ख़राब हो गयी है। वो नये नोट की तंगी की वजह से रबी की बुआई के बाद खाद-कीटनाशक वगैरह नहीं ख़रीद पा रहे हैं। इसी तरह असंगठित क्षेत्र में लगे दिहाड़ी मज़दूरों को भी काम इसलिए नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि लोगों के पास उन्हें मज़दूरी के रूप में देने के लिए नयी करेंसी नहीं है। नोट की तंगी की वजह से सकल माँग ख़ासी गिर गयी है। इसने कामगारों की छँटनी के हालात बना दिये हैं। शुरुआती ख़बरें आने भी लगी हैं। जो लोग नये कारोबार से जुड़ना चाहते थे, वो उसे टाल रहे हैं। इसीलिए नोटबन्दी के फ़ैसले और ख़ासकर इसके लिए अपनाये गये तौर-तरीक़ों के आधार पर इसके नफ़ा-नुकसान का सही अन्दाज़ा लगाना अभी जल्दबाज़ी होगी!

 

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दूसरी ओर, अर्थव्यवस्था से काले धन के सफ़ाये में नोट बन्दी को बहुत मामूली सफ़लता ही मिलेगी। क्योंकि 30 दिसम्बर तक ज़्यादातर लोग पुराने नोट के रूप में मौजूद अपने काले या सफ़ेद धन को ठिकाने लगा चुके होंगे। इसमें हरेक पार्टी के नेता, अफ़सर और हरेक तरह के धन्ना सेठ, सभी शामिल होंगे। इसलिए इस सरासर झूठ पर यक़ीन करने का कोई आधार नहीं है कि कालाधनधारी लोग किसी एक ही पार्टी या वर्ग के हैं। इसमें हरेक पार्टी से जुड़े लोगों की बराबर की साझेदारी है। इस लिहाज़ से ये समझना भी ज़रूरी है कि किसी ने भी, कभी ये नहीं कहा कि नोटबन्दी की नीति ग़लत है। सबने इसका स्वागत ही किया, चाहे सच्चे मन से या फिर झूठे! अलबत्ता, मोदी सरकार की आलोचना सिर्फ़ इसलिए हो रही है कि उसने बग़ैर पूरी तैयारी के इतना बड़ा क़दम उठाया है। सरकार की बद-इंतज़ामी की वजह से आम जनता पर मुसीबतों का पहाड़ आ गिरा। लाइनों में दिन-दिन भर खड़े लोग आम जनता वाले तबक़े के ही हैं। रईस और प्रभावशाली लोग आपको उनमें इसीलिए दिखायी नहीं देते क्योंकि वो अपने प्रभाव की बदौलत हालात से निपटना जानते हैं।

नोटबन्दी की वजह से आख़िरकार कितना कालाधन बाहर आएगा और कितना किसी और तरीक़े से ठिकाने लगा दिया जाएगा, इसके बारे में भी अभी से धारणा बनाना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन इसमें कोई शक़ नहीं कि इस क़वायद से नक़ली नोटों का अर्थव्यवस्था से तब तक तो सफ़ाया हो ही जाएगा जब तक फ़र्जी नोट छापने वाले अपने नये मंसूबों में कामयाब नहीं हो जाते। रिज़र्व बैंक का अनुमान था कि नोटबन्दी के ऐलान तक 500 और 1000 के क़रीब 400 करोड़ नक़ली नोट प्रचलन में थे। ये कुल प्रचलित मुद्रा का महज 0.028प्रतिशत था। नक़ली नोटों का सफ़ाया हर लिहाज़ से ख़ुशगवार है सिवाय इसके लिए इसकी लागत बहुत अधिक बैठेगी। क्योंकि बदले जाने वाले नोटों की जगह नये नोटों की छपाई की लागत ही क़रीब 16 हज़ार रुपये बैठने का अनुमान है। इसमें वो ख़र्च भी जोड़ना पड़ेगा जो नये नोट को देश के दूर-दराज़ के इलाकों तक भेजने और बैंकों के ख़र्च के रूप में जुड़ेगी। इसके बाद आम लोगों के धन-श्रम का ख़र्च तथा बाज़ार पर छायी मन्दी की भी एक क़ीमत तो है ही। अनुमान लगाया गया है कि नोट बन्दी की वजह से देश की विकास दर में तीन फ़ीसदी तक की गिरावट आ सकती है। अब कल्पना कीजिए कि प्रचलित नक़ली नोटों में 1000 रुपये वाले 80 फ़ीसदी हैं और 500 वाले 20 प्रतिशत, तो इनका कुल दाम 3.62 लाख करोड़ बैठता है। यानी मुमकिन है कि रिज़र्व बैंक को पहले जैसे हालत बनने तक क़रीब 5 लाख करोड़ रुपये की राहत मिल जाए, लेकिन तब तक देश इसकी कितनी क़ीमत अदा कर चुका होगा, उसके बारे में अभी से अनुमान लगा पाना भी मुश्किल है।

चलते-चलते: ज़रा नोटबन्दी के इतिहास को भी जान लें। पहली बार जनवरी 1946 में एक हज़ार रुपये वाला नोट बन्द किया गया था। आज के हिसाब से देखे तो उस वक़्त का हज़ार का नोट आज कम से कम लाख रुपये के बराबर बैठेगा। अगली बार जनवरी 1978 में मोरारजी सरकार ने सौ रुपये के नोट को बन्द कर दिया था। इन दोनों ही मौक़ों पर बन्द की गयी करेंसी की अर्थव्यवस्था में मात्रा ख़ासी कम थी। इसीलिए आम जनजीवन वैसे तबाह नहीं हुआ था, जैसे अभी 2016 में दिख रहा है। रोचक तथ्य ये भी है कि देश में सबसे ज़्यादा मूल्य वाला 10 हज़ार रुपये का नोट 1938 में छापा गया था। बाद में इसे 1954 में भी छापा गया। लेकिन इसे पहले जनवरी 1946 और फिर जनवरी 1978 में बन्द कर दिया गया।