कैसे तय होगा कि किसी शख़्स पर सनक सवार हो गयी है? या किसी लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री ही सनक गया है? या फिर किसी देश का बहुसंख्यक जनमानस अपनी सुध-बुध गँवाकर बदहवास हो चुका है? उस जनतंत्र का क्या हश्र होगा जिसके मीडिया की दशा विवेक-शून्य, तर्क-विहीन और सत्ता के चारण-भाट जैसी बन जाए? और, जहाँ इन सारे तत्वों के सम्मिश्रण से देश-भक्ति और राष्ट्रवाद के पकवान बनाकर जन-जन को परोसे जाएँ? कर सकते हैं तो गर्व कीजिए कि आज अपना अनुपम भारत ऐसे ही अद्भुत दौर से गुज़र रहा है!

सनकी किसे कहते हैं? जो ऊपर से देखने में तो स्वस्थ लगे, लेकिन जो बिना पहले तो सोचे-विचारे ऊटपटाँग फ़ैसले और फिर उसे ही सही ठहराने के लिए किसी भी सीमा तक चला जाए! नोटबन्दी के बाद ये साफ़ हो गया है कि भारत के प्रधानमंत्री पर सनक सवार हो चुकी है इसीलिए वो सनकी बन चुके हैं! क्योंकि कोई सनकी व्यक्ति ही काला धन निकालने नाम पर ढोंग के साथ अपनी घोषणा कर सकता है और फिर अपने ढोंग को सही ठहराने के लिए एक के बाद एक दर्जनों बदलाव लाकर आये दिन अपनी नीति में बदलाव ला सकता है। जो व्यक्ति आगा-पीछा सोचकर फ़ैसले लेता है उसे इतने सारे बदलाव करने की नौबत नहीं आ सकती, जैसा मोदी ने नोटबन्दी के मामले में किया है!

ज़रा याद कीजिए कि किसने कहा था कि सारी तकलीफ़ सिर्फ़ दो दिन यानी नौ और दस नवम्बर की है! फिर किसने जापान में उन लोगों का मज़ाक उड़ाया था जो चार हज़ार रुपये बदलवाने के लिए लाइनों में खड़े थे! फिर किसने चार को साढ़े चार हज़ार किया और एक दिन बाद ही उसे दो हज़ार कर दिया! किसने काला धन निकालने की क़वायद को कैश-लेस अर्थव्यवस्था का नाम दे दिया! किसने अचानक एक हज़ार के नोट को रोक दिया! किसे ये समझने में भी कई दिन लग गये कि ATMs को 500 और 2000 के नये नोटों को पहचानने लायक बनाने में ही तीन हफ़्ते से ज़्यादा का वक़्त लग जाएगा!

ये ढोल बज ही रहा था तभी किसने उन कालाधनधारी देशद्रोहियों को न्यौता भेज दिया कि आओ, 53.33 प्रतिशत टैक्स देकर अपना सारा रुपया सफ़ेद करवा लो! ऐसा करोगे तो आपके ख़िलाफ़ न तो कोई कार्रवाई होगी और न ही कोई पूछताछ! तो भाई ज़रा इतना तो बता दीजिए कि जब यही करना था तो देश की 90 फ़ीसदी आबादी को क्यों इतना सताया और अभी और प्रताड़ित करने का इरादा है! इनसे क्या दुश्मनी है आपकी! इन्हीं लोगों के 31 फ़ीसदी वोट ने तो आपको 30 साल बाद ऐतिहासिक बहुमत की सत्ता दी थी। क्या इन्हें इसी क़सूर की ऐसी सज़ा देंगे जो आप उन दुश्मनों को भी नहीं दे पाये जिनके घर लाहौर में जाकर आपने बिरयानी खायी थी और न ही उनके उन गुर्गों के हौसले पस्त कर पाये जो पठानकोट और उरी के बाद अब नगरोटा में भी देश के सबसे सुरक्षित सैनिक शिविरों में अन्दर घुसकर हमारे बहादुर सैनिकों को अपनी गोलियों से छलनी कर रहे हैं! अब है आपका मुँहतोड़ जवाब, कहाँ है आपका ईंट के बदले पत्थर से दिया गया जवाब! क्यों आपका सर्ज़िकल हमला भोथरा साबित हो गया!

img_6130  जब देश का प्रधानमंत्री सनकी और जनता बदहवास होने पर आमादा हो तो… IMG 6130

लोकतंत्र में कोई सनकी मुखिया ही ये अपेक्षा रखेगा कि जनता उससे इन सवालों का जवाब नहीं पूछे! सनकी मुखिया को ही संसद में बैठकर आमने-सामने अपनी आलोचना सुनने का साहस नहीं होगा! सनकी मुखिया ही देश को बड़े गर्व से इस झूठ अफ़ीम चटाता फिरेगा कि निकाय चुनाव या फिर अन्य चुनाव के नतीज़ों की बदौलत देश की जनता उसे आशीर्वाद दे रही है कि आम जनता को ऐसे ही दिन-दिन क़तारों में खड़ा रखे और कालाधनधारियों के लिए एक और आय-घोषणा योजना को पिछले दरवाज़े से लाकर उन्हें ऐश करने का सन्देश दे! जब यही करना था तो ग़रीबों, लाचारों और कमज़ोरों का तमाशा क्यों बनाया! क्यों ये शिगूफ़ा गढ़ा कि वो लाइन में खड़े होकर राष्ट्र सेवा कर रहे हैं! उनके काम-धाम और रोज़ी-रोज़गार का तो सत्यानाश हुआ उसकी भरपायी कैसे होगी!

सच तो ये है कि नोटबन्दी की सनकपूर्ण योजना से आम जनता को हुए नुकसान की भरपायी कभी हो ही नहीं सकती! उल्टा, अर्थव्यवस्था को जो बेहद करारी चपत लग रही है, उसका भी सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा आम जनता को ही भुगतना पड़ेगा। वही लोग ख़ून के आँसू रोएँगे! क्योंकि देश-भक्ति, राष्ट्र-हित और राष्ट्र-सेवा के नाम पर दुनिया का सबसे बड़ा बहुरूपिया उनके सुध-बुध को लूट चुका है। उसने और उसके गुर्गों ने जनता में बदहवासी भर दी है कि जो कुछ हो रहा है उससे तुम्हें फ़ायदा होगा! ‘आज की बचत कल की सुरक्षा’ के तर्ज़ पर भयंकर अव्यवस्था को प्रसव-पीड़ा का भी नाम दिया है जिससे सन्तान और मातृत्व का अनूठा सुख प्राप्त होता है!

ऐसे फ़रेबी सुख की मार्केटिंग वो फ़र्ज़ी मॉडल कर रहा है जो ख़ुद सन्तान और मातृत्वहीन अभागा है, जिसे ख़ुद गृहस्थी और घर-परिवार चलाने का कोई अनुभव नहीं है! जो ख़ुद सारी सामाजिक व्यवस्था को पीठ दिखाकर भागा हो! जो स्वाँग तो करता हो रामराज्य लाने का, भारत को फिर से सोने की चिड़िया वाला देश बनाने का लेकिन जिसकी असली मंशा 21 सदी का ऐसा तानाशाह बनने की है, जिसकी भारत जैसे अनेकता में एकता वाले लोकतंत्र ने कभी कल्पना तक न की हो! इससे भी ज़्यादा अफ़सोस की बात ये है कि ऐसे पतित शख़्त की करतूतों को जनता में राष्ट्र-निर्माण दिख रहा है, क्योंकि किसी ने उसकी मति मार दी है और उसे जो पट्टी पढ़ाई जा रही है उसे ही वो रट्टू तोता की तरह बोलता जा रहा है!

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लोकतंत्र में झूठ की खेती के लिए रीढ़विहीन और चाटुकार मीडिया का होना भी अनिवार्य शर्त है। तभी तो तथ्यों को भ्रष्ट करके परोसा जा सकता है। कहा गया कि निकाय चुनाव नोटबन्दी पर जनता के समर्थन की मोहर है। लेकिन सच्चाई कुछ और है। महाराष्ट्र के निकाय चुनाव की 3705 सीटों में से बीजेपी ने 851 पर जीत पायी तो वो नोटबन्दी की जीत कैसे बन गयी! अरे, सदी के महान पत्रकारों और सम्पादकों ज़रा हिसाब तो लगा लीजिए कि इसी चुनाव में नोटबन्दी के तौर-तरीकों का विरोध करने वाली काँग्रेस, एनसीपी और शिवसेना ने कुल 1795 सीटें हासिल की हैं। यहाँ तक कि ‘अन्य’ का पलड़ा भी बीजेपी से भारी रहा। इसने 864 सीटें बटोरीं।

इससे पहले चारण-भाट मीडिया ने देश को ज्ञान दिया था कि मोदी सरकार ने जो 2000 रुपये का नया नोट बनाया है उसमें ऐसा ‘चिप’ लगा है जिससे धरती ही नहीं यदि पाताल में भी उसे 120 मीटर नीचे तक छिपाकर रखा गया तो अंतरिक्ष में मौजूद जीपीएस (Global Positioning System) बताने वाले सेटेलाइट (उपग्रह) उसका पता लगा लेंगे! मज़े की बात देखिए कि सरकार को ऐसी बेसिरपैर की, अवैज्ञानिक और तथ्यरहित ख़बर दिखाने वालों में कोई राष्ट्र-द्रोह नज़र नहीं आता! वो तो जहाँगीर का घंटा बजाकर ऐसा न्याय करती है जिसमें एक ख़ास चैनल को राष्ट्र-हित के विरूद्ध प्रसारण करने का दोषी बताकर रोक लगाने का फ़रमान जारी हो जाता है!

ये नौटंकीबाज़ों की हुक़ूमत है। इसे आये दिन नयी-नयी नौटंकी का चस्का लग चुका है। हरेक नौटंकी को राष्ट्रवाद की फ़र्ज़ी चासनी में लपेटा जाता है। जेएनयू देशविरोधी नारे लगाने वाला कोई हाथ नहीं आया। दबोचा किसे गया, छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को, जिसने न तो नारेबाज़ी की थी और जो न ही कार्यक्रम का आयोजक था। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी और को पकड़ते तो राष्ट्रव्यापी हंगामा नहीं होता कि जेएनयू देशविरोधी तत्वों का अड्डा बन गया है। ऐसे अड्डे पर सर्ज़िकल हमला क्यों नहीं किया? बम गिराकर मटियामेट कर देते पूरे कैम्पस को! लेकिन मक़सद तो राष्ट्रप्रेम था ही नहीं। इसीलिए अब जी भरकर बवाल काट लेने के बाद वहाँ सब ठीक हो गया है। जेएनयू भी वहीं है। देश भी वहीं है। कश्मीर भी वहीं है। और, मरने-मारने पर आमादा देशभक्त भी वहीं हैं।

ऐसी ही नौटंकी है नोटबन्दी। सवाल काला धन का है जिसे 100 दिनों में विदेश से लाने की बातें की गयी थीं। वो तो आया नहीं तो सोचा कि देश में जिसके पास भी नक़द रुपया है उसे ही कालाधनख़ोर बता दो, ताकि कोई पूछ ही न सके कि कहाँ है काला धन! अब काले धन के नाम पर हर उस शख़्स को निशाना बनाया गया है जिसने सपने में भी कभी काला धन नहीं देखा है। इसके बाद दावा किया जाएगा कि हमने काले धन पर हल्ला बोला, इसीलिए सब चिल्ला रहे हैं। हैरानी इन दावों पर नहीं, बल्कि इन दावों के समर्थन में जुटे लोगों की समझ पर है, जिन्हें देश-भक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर विशुद्ध रूप से न सिर्फ़ ठगा बल्कि लूटा भी जा रहा है!

img_6127  जब देश का प्रधानमंत्री सनकी और जनता बदहवास होने पर आमादा हो तो… IMG 6127

जिन्हें अर्थशास्त्र की समझ है वो देशद्रोही हैं, क्योंकि समझा रहे हैं कि नोटबन्दी के लिए गोपनीयता की कतई ज़रूरत नहीं होती! इसका मक़सद काले धन और नक़ली नोट वाली समानान्तर अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करना होता है। लेकिन जब फ़ैसला गोपनीय हो तो रिज़र्व बैंक जैसी संस्था की गरिमा नष्ट हो जाती है। गोपनीय नोटबन्दी से आर्थिक आपातकाल लागू किया जाता है, जिसका एकमात्र मक़सद राजनीतिक विरोधियों को धनविहीन बनाकर चुनावी उल्लू सीधा करना होता है। इसके लिए जनता में काले धन के प्रति नफ़रत पैदा करना ज़रूरी है, जो तब तक पैदा नहीं होगी, जब तक कि जनता को ख़ुद दर्द न झेलना पड़े। यदि नोटबन्दी पूरी तैयारी से लागू होती तो आम जनता को तकलीफ़ नहीं होती और न ही अपेक्षित घृणा पैदा हो पाती! लिहाज़ा, राजनीतिक मक़सद ही पूरा नहीं होता! इसीलिए जनता को उल्लू बनाने के लिए सरकार ऐसे चालाकी भरे और भ्रामक सर्वे करवाती है, जो वही कहे जिसे सनकी प्रधानमंत्री सुनना चाहते हैं!