Image result for मोदी-जेटली

देश के परम न्यायविद और वित्त मंत्री ने आज बहुत बड़े रहस्य से पर्दा उठाया है! उन्होंने कहा है कि ‘भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जीएसटी और नोटबन्दी जैसे बेहद साहसिक फ़ैसले युगान्तरकारी साबित होंगे! लगे हाथ जेटली ने सरकार की ओर से आयी तरह-तरह की सफ़ाईयों को लेकर एक और नयी किस्त भी पेश कर दी। उन्होंने कहा कि ‘नोटबन्दी का असर एक से दो तिमाहियों तक रह सकता है। लेकिन इससे दीर्घावधि में अर्थव्यवस्था को बहुत लाभ होगा। इससे देश के ईमानदार लोगों को लाभ मिल रहा है। डिज़ीटल करेंसी बढ़ रही है।’ इसी तरह ‘जीएसटी से देश में आर्थिक एकरूपता आएगी। आम जनता को सामान सस्ता मिलेगा।’

…तो नोटबन्दी को लेकर जो राष्ट्रव्यापी हाहाकार पसरा हुआ है उसे देखते हुए अरूण जेटली ने पूरे देश का ऐसा मार्गदर्शन किया है, जिसकी आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। देश की 95 फ़ीसदी आबादी को ये नये नोटों की किल्लत बुरी तरह प्रभावित कर रही है। जेटली का उपरोक्त बयान ऐसे लोगों के सामने से कम से कम ये धुन्ध तो मिटा सकता है कि आख़िर ऐसा कब तक चलेगा! क्योंकि ख़ुद जेटली भी अब तक इस मसले पर ग़लत बयानी करते रहे हैं। उनके हाल के हर बयान बस यही बता रहे थे कि जल्द ही यानी चन्द हफ़्तों में ही हालात सामान्य हो जाएँगे। लेकिन अब तीन हफ़्ता बीत चुका है। जनता का सब्र जवाब देने लगा है। सरकार के प्रति उन लोगों का गुस्सा बुरी तरह से फूट पड़ता है जो बैंकों की अनन्त लाइनों में अपना रुपया पाने के लिए भी भिखारी बना दिये गये हैं! ऐसे लोग कम से कम इतना तो समझ ही लें कि अगले छह महीने तक उन्हें भिखारी योनि में ही रहना होगा। उसके बाद ही अहिल्या उद्धार की उम्मीद पैदा होगी!

जेटली के उपरोक्त बयान की अहमियत इसलिए भी बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि उनसे पहले बेहद ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोगों ने भी जनता की आँखों में धूल झोंका है। मिसाल के तौर पर, पूर्ववर्ती योजना आयोग और मौजूदा नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पनगढ़िया ने कुछ दिन पहले बताया था कि नोट की उपलब्धता को सामान्य होने में कम से कम तीन महीने लगेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री अरूण जेटली के मुक़ाबले अरविन्द पनगढ़िया को अर्थशास्त्र की ख़ासी बेहतर समझ है। पनगढ़िया ने सीधा-सीधा हिसाब लगाया कि सरकार जिस रफ़्तार से नये नोट छाप रही है, उस हिसाब से तो रुपये की पर्याप्त उपलब्धता हासिल करने में तीन महीने तो लग ही जाएँगे। संसद में कई विपक्षी नेता बता चुके हैं कि हालात सामान्य होने में नौ महीने से लेकर साल भर तक लग जाएगा।

मज़े की बात ये है कि मोदी हों या जेटली या वेंकैया या बीजेपी का कोई और सूरमा, कोई ये नहीं बताना चाहता है कि नोटबन्दी ने 500 और 1000 के जिन पुराने नोटों को अवैध घोषित किया है, उनकी कुल संख्या 2320 करोड़ है। जबकि नोट छापने वाले चारों सरकारी प्रेस की अधिकतम क्षमता 10 करोड़ नोट रोज़ाना छापने की है। ये आँकड़े रिज़र्व बैंक के हैं। इस हिसाब से रद्द हुए नोटों को छपने में कम से कम 232 दिन लगेंगे। वो भी तब जबकि लगातार इतने दिनों तक सरकारी प्रेस अधिकतम छपाई का गिनीज़ रिकॉर्ड बनाने पर आमादा हो! जो अभी तक तो कहीं दिख नहीं रहा!

इसीलिए सरकार, यदि देश की 90 फ़ीसदी जनता को उल्लू नहीं बनाना चाहती तो फिर 8 नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्यों कहा था कि सारी तकलीफ़ सिर्फ़ दो दिन यानी 9 और 10 नवम्बर की है। 11 नवम्बर से ATM नोट उगलने लगेंगे। बैंकों में पुराने नोट बदले जा सकेंगे और कुछ शर्तों के साथ जनता अपने ही खातों से आराम से रुपये निकाल सकेगी। लेकिन हुआ क्या? सरकार ने बग़ैर पूरी तैयारी के, इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया जिससे देश का हर शख़्स प्रभावित हुआ है। काम-धन्धा, रोज़ी-रोज़गार सब चरमरा चुका है, लेकिन भगवा ख़ानदान ऐसे ख़ुश है जैसे जनता को सताना ही सरकार का असली लक्ष्य रहा हो! इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने फिर पैंतरा बदला। कहा, तीन हफ़्ते में सब ठीक हो जाएगा। फिर 50 दिन की मोहलत माँगी गयी। कुलमिलाकर, झूठ पर झूठ और झूठ पर झूठ, के अलावा और कुछ नहीं! क्योंकि यदि एक ही बार में सारा सच कह दिया तो जनता को रोज़-रोज़ बेवकूफ़ कैसे बनाएँगे!

सरकार और बीजेपी के इन योद्धाओं को बता ही नहीं है कि जंग क्या होती है और कैसे लड़ी जाती है! इनका पूरा तर्ज़ुबा सिर्फ़ और सिर्फ़ गाल बजाने का रहा है। गुजरात मॉडल, विकास और तमाम जुमले इसी फ़रेबी महाग्रन्थ के अलग-अलग अध्याय हैं। इन्होंने एक नया शब्द क्या सीख लिया ‘सर्ज़िकल हमला’, दिन-रात इसी को जहाँ-तहाँ फिट करने में लगे रहते हैं! नोटबन्दी आम जनता को जब फ़ायदा पहुँचाएगी, तब पहुँचाएगी, अभी तो जनता को तिल-तिलकर मारा जा रहा है। क्योंकि असली मक़सद अपने पूँजीपति दोस्तों को निहाल कर देने का है।

इसी तरह, जीएसटी को लेकर भी झूठ की दुकान सजा ली गयी है। ये सही है कि जीएसटी से देश का टैक्स प्रबन्धन बेहतर होगा। लेकिन जीएसटी से आम जनता की ज़रूरत की कोई भी चीज़ सस्ती नहीं होगी। क्योंकि उन चीज़ों पर न तो अभी कोई टैक्स है और न ही जीएसटी लागू होने के बाद लगेगा। बाक़ी रईसों को ज़रूर इससे ख़ासा फ़ायदा होगा। उनकी पसन्द की चीज़ें सस्ती हो सकती हैं। लेकिन सस्तापन ऐसा भी नहीं होगा कि किसी की आँख चौंधिया जाए। इसीलिए यदि आपके पास मोदी सरकार की हरक़तों का आलोचनात्मक विश्लेषण करने की क्षमता है तो आपकी आँखों पर ये पर्दा नहीं पड़ा रह सकता कि लाल बुझक्कड़ भी नहीं जानते होंगे कि बीजेपी में कितने बहुरूपिये हैं…!