प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बात का ज़बरदस्त चस्का है कि वो कच्चा-पक्का, सच-झूठ, सही-ग़लत चाहे हो, रोज़ाना नयी बातें बोलें, नयी योजनाएँ चालू करें, नया शिगूफ़ा फोड़ते रहें, नये जुमले गढ़ते रहें और नये झाँसे देते रहें! इसी नया और ऐतिहासिक करने या बिगाड़ने की आपाधापी में न जाने कितनी बार बहक चुके हैं। लेकिन उनकी आदत है कि माइक को सामने देखते ही वो आपा खो बैठते हैं। वर्ना, आज तक कभी इस देश में ऐसा नहीं हुआ कि प्रधानमंत्री को देश की संसद में बोलने नहीं दिया गया हो! अरे, प्रधानमंत्री संसद का सर्वोच्च नेता होता है! पक्ष-विपक्ष सभी चाहते हैं कि प्रधानमंत्री ज़्यादा से ज़्यादा अपनी बातें सदन और उसके ज़रिये देश और दुनिया के सामने रखें। हरेक सरकार में विपक्ष ने जब कभी सरकार को घेरने या उस पर दवाब बनाने की कोशिशें कीं, हमेशा प्रधानमंत्री पर ही निशाना साधा। ख़ुद बीजेपी ज़िन्दगी भर यही करती रही है। आख़िर विपक्ष में बैठने का उससे लम्बा अनुभव किसी और के पास है भी नहीं!

लेकिन अब तो बेशर्मी की सारी हद्दें पार हो चुकी हैं। क्योंकि देश का सबसे वाचाल प्रधानमंत्री, नोटबन्दी को लेकर जनता से बारम्बार अपनी नाकामियों से छिपाकर उसे बरगलाना चाहते हैं। सरकार की जानी-समझी रणनीति थी कि संसद के मौजूदा सत्र को नोटबन्दी की भेंट चढ़ा दिया जाए, ताकि बीजेपी ये झूठ फैला सके कि विपक्षी दलों के पास अकूत कालाधन है। इसीलिए वो नोटबन्दी को लेकर बिलबिला रहे हैं। लेकिन संस्कृत की एक सूक्ति है – ‘सत्य किं प्रमाणं’ यानी सच्चाई को किसी प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती। देश के आम लोगों ने आठ नवम्बर को बाद से जैसी यातनाएँ झेली हैं, उसके बाद से उनका दिल ही जानता है कि नोटबन्दी से किसका और कितना भला हुआ है और कितना होने वाला है! जनता को अच्छी तरह से पता है कि ‘सच्चाई छिप नहीं सकती बनावट के उसूलों से और ख़ूशबू आ नहीं सकती कभी काग़ज़ के फूलों से!’

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नरेन्द्र मोदी संसद में बोलना चाहते थे और उन्हें बोलने नहीं दिया गया। इसका मतलब तो ये भी हुआ कि उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव के बग़ैर ही संसद का विश्वास गँवा दिया है!अरे, प्रधानमंत्री बोलने के ख़्वाहिशमन्द होते तो क्या उनके सांसद सदन में उन्हें संरक्षण देने के लिए आकाश-पाताल एक नहीं कर देते! यदि ऐसा होता तो वो भी उसी तरह संसदीय होता जैसा विपक्ष की माँग कि जब नोटबन्दी का फ़ैसला प्रधानमंत्री का था तो उन्हें सांसदों की उन भावनाओं को क्यों नहीं सुनना चाहिए जिसका ब्यौरा वो अपने भाषणों में देते! लेकिन जिस आदमी तो सिर्फ़ बोलना भाता हो, सुनना नहीं, वो भला संसद में विरोधियों की बातें कैसे बर्दाश्त कर पाता जो आँखों में आँखें डालकर मुँह दर मुँह अपनी बात कहते हैं और जिनकी हरेक बात संसद की कार्यवाही में अधिकृत दौर पर दर्ज़ होती है!

इसी तरह यदि सारा देश प्रधानमंत्री की नोटबन्दी की नीति का गुणगान कर रहा है, उनकी सर्वत्र जयजयकार हो रही है, तो लोकसभा में मौजूद मुट्ठीभर विरोधियों के आगे उनके पसीने क्यों छूटने चाहिए! इसमें कोई शक़ नहीं कि नरेन्द्र मोदी के पास प्रचंड बहुमत है और विपक्ष के छींकने-खाँसने से उनका बाल भी बाँका नहीं होता तो फिर ऐसा कौन सा भय था कि चर्चा उन नियमों के तहत नहीं हो सकती थी, जिसमें मत-विभाजन होता है। अरे, वोटिंग ही हो जाती तो कौन सा पहाड़ टूट जाता। पहले भी तो ख़ुद बीजेपी कई बार ऐसी चर्चाएँ करवा चुकी है। वोटिंग में किरकिरी तो तब होती जब सत्ता पक्ष के तमाम सांसद विपक्ष के प्रस्ताव के पक्ष में वोट दे देते। इसकी आशंका तो कहीं दूर-दूर तक भी नहीं थी। तो फिर क्या आफ़त सिर पर थी कि प्रधानमंत्री सदन में न तो मौजूद रहकर अपनी आलोचना सुनने को तैयार थे और न ही मत-विभाजन का सामना करने का साहस जुटा पा रहे थे!