हम अच्छी तरह से देख चुके हैं कि कैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबन्दी के बाद बार-बार गोल-पोस्ट बदलकर ख़ुद को विजयी घोषित करने का पराक्रम दिखाया है। बात शुरू हुई थी कालाधन के सफ़ाये, आतंकवादी का वित्तीय ढाँचा ध्वस्त करने और नक़ली नोटों से देश को मुक्ति दिलाने के लिए लाइन में खड़े होकर देशभक्ति प्रदर्शित करने की। लेकिन जैसे ही ये लक्ष्य खोखले साबित हुए वैसे ही कैशलेस इकोनॉमी की बात की जाने लगी और जैसे ही नादानों को ये समझ में आया कि कैशलेस इकोनॉमी नाम की कोई चीज़ मुमकिन ही नहीं है, वैसे ही लेसकैश का नया गोल-पोस्ट तैयार कर लिया गया।

इस सारी क़वायद का मक़सद सिर्फ़ एक है कि आम जनता को किसी न किसी तरह भँवर में फँसाये रखो। और, आम जनता की आड़ में उन पूँजीपतियों और धन्ना-सेठों को निहाल कर दो, जिन्होंने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाया था। अब ये समझना और जानना बेहद ज़रूरी है कि कालेधन को गोरा करवा देने के बाद कैसे अब लेसकैश की बदौलत आम जनता के ख़ून की बची-खुची बूँदों को भी निचोड़ लेने का नीति को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसीलिए भक्तगणों के लिए ये समझना बहुत उपयोगी होगा कि आख़िर ये लेसकैश या डिज़ीटल लेन-देन वाली अर्थव्यवस्था से किसको और कितना फ़ायदा होने वाला है?

यदि आप मोदी सरकार की कथनी और करनी का फ़र्क़ समझना चाहते हैं तो ये जान लीजिए कि रिज़र्व बैंक ने 16 दिसम्बर को डिज़ीटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए ऐलान किया कि 1000 रुपये तक के लेन-देन पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। लेकिन ये छूट सिर्फ़ पहली जनवरी से 31 मार्च तक के लिए है। अभी तक इस पर 5 रुपये लगते थे। इसी तरह डेबिट कार्ड के ज़रिये 1000 रुपये का लेन-देन करने पर 0.25% सर्विस चार्ज़ लगेगा। यानी, एक हज़ार रुपये पर 2.50 रुपये सर्विस प्रोवाइडर की जेब में जाएँगे। दो हज़ार रुपये के लेन-देन पर ये बोझ 5 रुपये का होगा। इसके ऊपर के लेन-देन पर सितम्बर 2012 से लागू 0.75% से लेकर 1% तक का सर्विस टैक्स पहले की तरह ही लागू रहेगा। फिलहाल, एटीएम को सर्विस टैक्स से मुक्त रखा गया है। यहाँ ग़ौर करने की बात ये है कि रिज़र्व बैंक ने सर्विस टैक्स पर इन रियायतों को नोटबन्दी के बाद से देना शुरू किया है। ये ट्रांज़ेक्शन चार्ज़ेज से पूरी तरह अलग है।

अब ये समझिए कि जब आप अपने डेबिट कार्ड से कोई भुगतान करते हैं तो बैंक उससे 0.5% से लेकर 2.5% तक कमीशन काट लेते हैं। इस रक़म को कोई भी दुकानदार या भुगतान पाने वाला अपनी जेब से नहीं भरता बल्कि वो वस्तु या सेवाओं के दाम में इसे जोड़कर हमसे-आपसे ही ये वसूली करता है। आम आदमी पर ये भी एक तरह का टैक्स ही है, जैसे हम आयकर, वैट वग़ैरह भरते हैं। लेकिन ये ट्रांज़ेक्शन चार्ज़ेज सरकार के पास नहीं जाता बल्कि ये डेबिट कार्ड देने वाले बैंक की कमाई होती है। इसी तरह, क्रेडिट कार्ड बेचने वाली कम्पनियाँ भी भुगतान पाने वाले से 1.5 % से लेकर 2.5% तक कमीशन लेती हैं। ये भी आख़िरकार हमारी-आपकी जेब से ही जाता है। इसी तरह Paytm/Freecharge/Jio Money/M-Paisa/Airtel Money जैसी डिज़ीटल वॉलेट वाली भारी-भरकम कॉरपोरेट कम्पनियाँ ग्राहकों को जो भी सहूलियत देती हैं, उसका बोझ भी हम पर ही पड़ता है। इन E-Wallets कम्पनियों का कमीशन 2.5% से 3.5% तक होता है।

रिज़र्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़, नोटबन्दी से पहले तक देश के कुल आर्थिक लेन-देन का महज तीन फ़ीसदी इलेक्ट्रानिक तरीकों से होता था। अब मोदी सरकार की मंशा इसे कम से कम 50 फ़ीसदी तक पहुँचाने की है। ताकि आम जनता पर विकराल बोझ डाला जा सके और बैंकों तथा E-Wallets वाली कम्पनियाँ चाँदी काट सकें। इसे यूँ समझें कि नोटबन्दी से पहले देश के ATMs हर महीने क़रीब 2.25 लाख करोड़ रुपये और सालाना क़रीब 25 से 30 लाख करोड़ रुपये निकाले जाते थे। अब यदि इसमें बैंकों से होने वाले निकासी को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो कुल रक़म 75 लाख करोड़ रुपये से ऊपर की हो जाएगी।

मोदी सरकार ऐसे सारे रिकॉर्डेड लेन-देन को ही सफ़ेद धन मानना चाहती है। उसकी अपरिपक्व और भ्रष्ट परिभाषाओं के मुताबिक़ बाक़ी सारी रक़म और लेन-देन कालाधन समझा जाएगा। साफ़ है कि E-Wallets वाली कम्पनियों का धन्धा जितना बढ़ेगा उतना ज़्यादा चढ़ावा मोदी सरकार और बीजेपी को समर्पित किया जाएगा। कल्पना कीजिए कि यदि 75 लाख करोड़ में से 25 लाख करोड़ रुपये के लेन-देन का धन्धा भी यदि E-Wallets ने हथिया लिया और उन्होंने अपने कमीशन को गिराकर औसतन 2% भी कर दिया तो भी उनकी कमाई 0.5 लाख करोड़ रुपये होगी। ये पैसा आम जनता का ही होगा, जो व्यापारियों के माध्यम से E-Wallets वाली कम्पनियों की जेब में जा पहुँचेगा! आर्थिक विशेषज्ञों की नज़र में ये रक़म खुल्लम-खुल्ला घोटाला है!

इसके जवाब में सरकार की ओर से जनता को फिर से उल्लू बनाया जाएगा कि आप निजी कॉरपोरेट वाले E-Wallets इस्तेमाल नहीं करें बल्कि सरकार और बैंकों ने जो मुफ़्त वाले UPI App उपलब्ध करवाये हैं, उनको इस्तेमाल करें। कितनी अच्छी बात है न! लेकिन लगे हाथ ये भी जान लीजिए कि सालों-साल से रेलवे रिज़र्वेशन वाले सरकारी सर्वर की स्पीड क्या रही है? सरकारी UPI App वाले सर्वर भी IRCTC वाले सर्वर की तरह ही क्यों नहीं चलेंगे! उन्हें चलना ही पड़ेगा वर्ना E-Wallets वाली कम्पनियाँ कैसे मुनाफ़ा कमाएँगी।

इतिहास गवाह है कि बीजेपी नेता प्रमोद महाजन के चहेते नरेश चन्द्र की कम्पनी जेट एयरवेज़ ने कैसे सरकारी विमानन कम्पनी एयर इंडिया की कमर तोड़ डाली थी? आज कौन नहीं जानता कि BSNL और MTNL जैसी टेलीकॉम कम्पनियाँ किनकी मुट्ठी में हैं? इसीलिए जब सरकारी UPI App से पेमेंट नहीं होंगे तो लोग झख़ मारकर निजी E-Wallets पर निर्भर हो जाएँगे। अन्दाज़ा लगाइए कि इससे ये कम्पनियाँ कितनी ख़ुशहाल हो जाएँगी और फिर वो सरकार में बैठे आपने आकाओं का ख़ुश रखने में कोई भी कोर-कसर कैसे छोड़ेंगी! नोटबन्दी के पीछे की असली योजना यही है! मज़े की बात ये भी है कि नोटबन्दी का ये सारा आइडिया किसी नरेन्द्र मोदी, अरूण जेटली और उर्जित पटेल जैसे लोगों के दिमाग़ की ऊपज नहीं है। इनके पास इतनी खोपड़ी होती तो ये राजनीति नहीं व्यापार कर रहे होते! मोदी-जेटली-पटेल जैसे लोग से सिर्फ़ मुखौटा हैं। असली खिलाड़ी तो वो चार्टड एकाउंटेंट, बैंकर्स और वित्तीय विशेषज्ञ हैं, जो इन्हें कठपुतली की तरह नचा रहे हैं। सरकार तो सिर्फ़ उनके ‘रेडीमेड प्लान’ को ढो रही है!