नोटबन्दी की भेंट चढ़ चुके सवा सौ लोगों की मौत से जब देश का दिल नहीं दहला तो दिल्ली की इस घटना से भी क्यों दहलेगा! इसलिए इस पोस्ट का मक़सद साफ़ तौर पर आपको डराने और आगाह करने का है कि भले ही आप नोटबन्दी से बुरी तरह से पीड़ित औऱ प्रताड़ित हों, इसे सिरे से नापसन्द और ख़ारिज़ करते हों, लेकिन यदि आपको जान की ख़ैर प्यारी हो तो ग़लती से भी अपनी ज़ुबान से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ एक शब्द भी निकालिएगा, वर्ना आपका हाल कहीं लल्लन सिंह कुशवाहा जैसा या उससे भी बदतर न हो जाए!

लल्लन सिंह कुशवाहा पेशे से पेंटर है। दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के जैतपुर इलाके में रहने वाले लल्लन से 15 दिसम्बर को बहुत बड़ा ग़ुनाह हो गया। वो एक एटीएम के पास से गुज़र रहा था, जहाँ लोगों की बहुत लम्बी लाइन लगी थी। लाइन को देखकर उससे रहा नहीं गया और वो बोल बैठा, ‘ये लाइन सिर्फ़ मोदी की वजह से लगी हुई है। मोदी की वजह से ही जनता को इतनी परेशानी हो रही है।’ लल्लन की इस बात को नज़दीक के एक दुकानदार अंकित ने सुन लिया और उसने लल्लन का प्रतिकार किया जो देखते ही देखते इसलिए हिंसक बन गयी कि अंकित का साथ देने के लिए कई और मोदी भक्तों में राष्ट्र-प्रेम और देश-हित हिलोरें मारने लगा।

Lallan Singh Kushwaha  ख़बरदार, नोटबन्दी को लेकर मोदी के ख़िलाफ़ एक लफ़्ज़ भी बोला तो जान से जाएँगे! FullSizeRender

लल्लन सिंह कुशवाहा

कई भक्तों ने राष्ट्रद्रोही लल्लन को मौक़े पर ही सबक सिखाने के लिए मारपीट शुरू कर दी। अंकित की ओर से कई और भक्तों ने लल्लन पर अपना हाथ साफ़ किया। भक्तों ने उसके पास से छह हज़ार रुपये भी लूट लिये। ये पैसे भी उसके पास इसलिए थे, क्योंकि वो घर से टीवी ख़रीदने निकला था। इसी बीच, अंकित के हाथ में क्रिकेट का एक विकेट लग गया, जो उसने लल्लन के सिर पर दे मारा। पुलिस के आने तक लल्लन लहूलुहान हो चुका था। अस्पताल पहुँचने पर उसके सिर में 30 टाँके लगे। अंग-अंग में मारपीट की चोट और उसके दर्द से उबरने में लल्लन को हफ़्तों लगेंगे। पुलिस ने मामला तो दर्ज़ कर लिया लेकिन ये पता नहीं चला कि अंकित तक क़ानून के लम्बे हाथ अभी तक पहुँच भी पाये या नहीं।

अब आपसे गुज़ारिश है कि मेहरबानी करके इस घटना से सबक लीजिए कि जैसे ‘मथुरा में रहना है तो राधे-राधे कहना है’, वैसे ही यदि भारत में अपनी ख़ैरियत चाहते हैं तो मोदी-मोदी या नमो-नमो या हर-हर मोदी कीजिए और ख़बरदार, जो नरेन्द्र मोदी की नीतियों के ख़िलाफ़ चूँ तक भी किया तो! क्योंकि मौजूदा दौर ऐसे ही फासीवाद का है। आप चाहें तो उस मानसिकता का स्मरण भी कर सकते हैं जिसके तहत राष्ट्र-भक्त गौरक्षकों ने अख़लाक़ को मौत के घाट उतार दिया था। दोनों घटनाओं में सिर्फ़ इतना ही फ़र्क़ है कि अख़लाक़ मुसलमान था और लल्लन सिंह कुशवाहा हिन्दू है। दोनों मामलों में आतंकियों का राजधर्म एक ही है। राष्ट्र-भक्तों की ऐसी ही भीड़ ने गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई करके अपना पराक्रम दिखाया था।

ताज़ा मामला तो ख़ास दिल्ली का है। देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली की पुलिस भी सीधे नरेन्द्र मोदी के ही मातहत है। लिहाज़ा, वो भी अपने आक़ा की शान में हो रही किसी भी ग़ुस्ताख़ी को कैसे बर्दाश्त करेगी। वैसे रस्म अदायगी के नाम पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 323 और 341 के तहत मामला दर्ज़ किया है। लेकिन उसके पेशेवर रवैये को देखकर ये कहना मुश्किल है कि वो असली क़सूरवारों के गिरेबान तक क़ानून के राज को वाकई कभी पहुँचा भी पाएगी!

लेकिन ऐसी घटनाओं से आपकी सेहत पर न तो पहले कोई असर पड़ा है औऱ न ही अब पड़ने की कोई उम्मीद की जा सकती है। आप तो बस अपना ख़्याल रखिएगा। ध्यान रखिएगा कि नोटबन्दी को लेकर यदि आपके विचार आलोचनात्मक हों तो कृपया उन्हें सार्वजनिक जगहों पर ज़ाहिर करने से बचिएगा। वर्ना, भक्तों को आपको परलोक पहुँचाने में कोई क़सर शायद ही छोंड़े। बेहतर होगा, यदि आप भगवान या अल्लाह से अपनी सलामती की दुआ माँगने के बजाय मोदी-भक्तों से अभयदान की कामना करके अपना वक़्त काट लें। बहुत विकट दौर है ये। इसमें आपने जान-माल की हिफ़ाज़त इन्हीं राष्ट्र-भक्तों के हाथ में है!