ये आस्था भी अद्भुत चीज़ है। सारी कायनात ही आस्था के भरोसे है। सारे रिश्ते-नाते, धर्म-विधान सभी की जड़ों में आस्था ही तो होती है। आस्था का ही दोहन और शोषण होता है। तमाम विकारों की जड़ भी आस्था ही है। ये आस्था ही तो है कि आज भी कुछ लोगों को यक़ीन है कि चुम्बन लेने से बच्चे पैदा हो सकते हैं, सन्तानोत्पत्ति हो सकती है। ऐसे लोगों का दृढ़ विश्वास है कि नोटबन्दी यानी विमुद्रीकरण से भ्रष्टाचार, घूसख़ोरी और काले धन का सफ़ाया हो जाएगा। कैशलेस तथा डिज़ीटल ट्रांज़ेक्शन से देश की ग़रीबी, भुखमरी और बेरोज़गारी मिट जाएगी। ‘अच्छे दिन’ की तो छोड़िए रामराज्य आ जाएगा!

आस्था है ही ऐसी कि अक्सर लोग उसे चुनौती देने का दुस्साहस नहीं कर पाते। सच को जानने, समझने और भोगने के बावजूद अगर कोई उससे मुँह ही फेरता रहे तो जान लीजिए कि वो आस्था के दलदल में गिर चुका है। दलदल की प्रकृति ही ऐसी है कि कोई उससे निकलने की जितनी भी कोशिश करेगा, वो उतना ही उसमें धँसता जाएगा। अन्ततः सद्गति को प्राप्त होगा लेकिन आस्था तब भी मारीचिका ही बनी रहेगी!

तो क्या वजह है कि ज़िन्दगी के अन्तिम सत्य यानी मौत का ज्ञान होने के बावजूद लोग आस्था की बदौलत ये लोभ पाले रहते हैं कि वो अभी नहीं मरेंगे! ये कैसी तृष्णा है जिसे ये कहकर बुझाया जाता है कि शुरुआत में भले ही तकलीफ़ होगी लेकिन बाद में बहुत फ़ायदा होगा! बाद तो मृत्यु तक खिंच सकता है। फिर भी क्यों जनता को छलावा बेचा जाता है कि इस कष्ट को झेल लो, इसके बाद सुख ही सुख है। कोई नहीं बताता कि कष्ट की मियाद क्या है!

बेमियादी कहते ही उसे हैं जिसकी मियाद न हो! नोटबन्दी के अदूरदर्शितापूर्ण क्रियान्वयन से पनपे कष्ट की मियाद के बारे में उन्हें कैसे पता हो सकता है जिनके पिटारे से कभी जुमलेबाज़ी के सिवाय और कुछ नहीं निकला! जो वीर-रस में भाषण देने के अलावा अन्य किसी भी क्षेत्र में पारंगत नहीं हैं! जिनके आगे विडम्बना भी पानी भरती है! जो सत्याग्रह और दुराग्रह में भेद करना नहीं जानते! जो दिमाग़ की बातों को मन की बता देते हैं! जो जज़्बातों को दहकाकर आशा और उम्मीदों की तस्करी करते हैं! जो सर्वोच्च आसन पर बैठकर भी झूठ की खेती करते हैं! जिनके मनसा-वाचा-कर्मणा सभी में छल-प्रपंच के सिवाय और कुछ नहीं होता! लेकिन जो क़िस्मत के इतने धनी हैं कि आस्था की बदौलत जनता की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब हो जाते हैं!

बेशक, राजनीति में हरेक नेता यही सपना देखता है कि जनता का उसमें हमेशा आस्था का भाव ही बना रहे। लेकिन सत्ता के नशे में वो भूल जाता है कि आस्था हमेशा काल्पनिक ही रहती है और कल्पनाशीलता के ध्वस्त होने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता! इसीलिए 50 दिन के अन्तराल में जहाँ आस्था को भक्तों ने नित नयी ऊँचाईयों तक पहुँचाया, वहीं ज़मीनी हक़ीक़त का रसास्वादन हर उस व्यक्ति ने किया जिसे बैंकों और एटीएम के बाहर लगी अन्तहीन कतारों से जूझना पड़ा। जनता देख रही है कि कैसे नोटबन्दी की आड़ में उसे सताया गया है। जिन धन्ना सेठों और बेईमानों को सबक सिखाने के दावे किये गये, उनके चेहरों पर शिकन तक नहीं है। कालाधनख़ोर, रिश्वतख़ोर, कालाबाज़ारिए, जमाख़ोर, टैक्सचोर, तस्कर, रियल स्टेट के महारथी जैसे कितने ही पेशों से जुड़े लोगों पर नोटबन्दी का कोई असर क्यों नहीं पड़ा!

आम जनता तो अपने गाढ़े ख़ून-पसीने की कमाई वाले दो हज़ार रुपये को पाने के लिए बैंकों और एटीएम के बाहर भिखारियों की तरह खड़े होकर गिड़गिड़ाती रही, लेकिन बेईमानों के पास लाखों-करोड़ों रुपये के नये नोट पहुँचते रहे। कतारों में लगे लोगों की मौत होती रही और सरकार इससे बेख़बर होकर अपनी पीठ थपथपाती रही कि उसके रोज़ाना बदल रहे नुस्ख़ों से ग़रीबों का भला होगा! आस्थावान भक्त मंडली भी अपने आराध्य का गुणगान करती रही। मोदी राज के झूठ की पोल खुलती रही। लेकिन आस्था का जादू इतना तगड़ा था कि लोग विषधर साँप को भी जीवनदायी गाय मानने लगे! ये ढोंग का चरम है। इंडिया इसमें भी ख़ुशहाल है। लेकिन भारत को इसे समझना होगा। सत्य को आस्था की नज़र से नहीं बल्कि हक़ीक़त और अनुभव की नज़र से देखना होगा। वैसे नोटबन्दी ने जिन-जिन लोगों पर भी कहर बरपा किया, जिनकी-जिनकी भी रोज़ी-रोटी प्रभावित हुई, उन सभी ने अभी तक तो सिर्फ़ टेलर ही देखा है। पिक्चर तो अभी बाक़ी है, साथियों!