देश के 14वें  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन दिनों एक अज़ब सपना देख रहे हैं कि जिस तरह से उत्तर प्रदेश के लोगों ने उन्हें 30 साल बाद पूर्ण बहुमत वाली केन्द्र सरकार का मुखिया बनाया, काश! उसी तरह से उनकी पार्टी का सूबे में 14 साल से जारी वनवास भी ख़त्म हो जाए। 2014 में प्रदेश की जनता ने काँग्रेस और यूपीए को पटखनी देने को तरजीह दी, इसीलिए नरेन्द्र मोदी इतिहास रचने में सफल हुए। तब यूपी के लोगों को मालूम नहीं था कि ब्रॉन्डिंग के शहंशाह नरेन्द्र मोदी झूठे विज्ञापनों या वादों-नारों के भी सर्वश्रेष्ठ सौदागर हैं। लेकिन अब जनता के सामने सच्चाई है। वादों-नारों की हक़ीक़त को परखने का मौक़ा है। झूठ को बेनक़ाब करने का अवसर है। चन्द महीने में ही उत्तर प्रदेश के लोग ये साबित कर देंगे कि अब भी मोदी का जादू किस क़दर उनके सिर चढ़कर बोल रहा है या फिर बिहारियों की तरह यूपी के लोगों की आँखें भी खुल चुकी हैं और उन्होंने भगवा राजनीति का असली चेहरा परख लिया है!

वैसे तो कोई भी सियासी पार्टी झूठे वादों और लुभावनी बातों से मुक्त नहीं है। लेकिन भगवा ख़ानदान की टक्कर का झूठ बोलने, गढ़ने और फ़ैलाने का माद्दा और किसी में कभी नहीं रहा। झूठ की खेती से सबसे अच्छी पैदावार लेने के लिहाज़ से बीजेपी और उसके संघ परिवार का कभी कोई मुक़ाबला नहीं रहा। राष्ट्रीय मंच पर नरेन्द्र मोदी के अभ्युदय ने तो संघ की इस उपलब्धि पर चार चाँद लगा दिया। आज आलम ये है कि अपने ढाई साल के कार्यकाल में ही, झूठ बेचने के लिहाज़ से नरेन्द्र मोदी ने बीते 13 प्रधानमंत्रियों को भी कोसों पीछे छोड़ दिया है। मोदी का अब तक कार्यकाल भाँति-भाँति के जुमलों, नारों, खोखली नीतियों और योजनाओं से भरपूर रहा है। अपने ऐसे ही अन्दाज़ का एक और शानदार प्रदर्शन मोदी और उनकी टीम ने 2 जनवरी को लखनऊ में करके दिखाया।

लखनऊ रैली को किसी ने महारैली तो किसी ने महारैला और किसी ने महा-जन-समुद्र कहा। इसमें कोई शक़ नहीं कि रैली बड़ी थी। इस लिहाज़ से सफल भी थी। लेकिन जिन दस लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया, वो निपट झूठ था। रैली के मैदान की अधिकतम क्षमता ही बमुश्किल एक-डेढ लाख लोगों की थी। इसका हिसाब-क़िताब भी मुश्किल नहीं है। आमतौर पर एक व्यक्ति क़रीब दो वर्ग मीटर ज़मीन घेरता है। ये आधार कभी ग़लत साबित नहीं होता। रैली के मैदान के क्षेत्रफल में कितने लोगों को जुटाया जा सकता है? ये अंकगणित का सीधा का सवाल है। यहीं विरोधियों की ये दलील भी थोथी है कि वो भाड़े पर लाये गये लोगों की भीड़ थी। कोई भी पार्टी चाहे जितना पैसा खर्च कर ले, लेकिन भाड़े के समर्थकों के बूते कभी भी और कहीं भी बड़ी रैली नहीं कर सकती। अलबत्ता, दूरदराज़ से लोगों को लाने-ले जाने का ख़र्च हमेशा आयोजकों को उठाना पड़ता है। ऐसा हरेक पार्टी के साथ और हमेशा होता है!

अब यदि मान भी लिया जाए कि विशाल परिवर्तन रैली में लाख-डेढ़ लाख लोग जुटे थे, तो भी इससे ये कैसे सिद्ध होगा कि यूपी में बीजेपी की लहर है। 24 करोड़ लोगों वाले राज्य में ये संख्या 0.01 फ़ीसदी से भी कम बैठती है। इसीलिए हवा के रुख की दुहाई देने वाले कितने सच्चे हैं, ये समझना मुश्किल नहीं है! अगला सच ये कि उत्तर प्रदेश में 14 सालों से ‘विकास’ वनवास पर था। कौन नहीं जानता कि कल्याण सिंह (24 जून 1991 से 6 दिसम्बर 1992 और 21 सितम्बर 1997 से 12 नवम्बर 1999), राम प्रकाश गुप्ता (12 नवम्बर 1999 से 28 अक्टूबर 2000) और राजनाथ सिंह (28 अक्टूबर 2000 से 8 मार्च 2002) की सरकारों के जमाने में उत्तर प्रदेश का कितना प्रचंड विकास हुआ था! उससे पहले यूपी ने जनता पार्टी के राज में मामूली सा विकास देखा था, क्योंकि तब जनसंघ भी सत्ता में हिस्सेदार थी! तब भी संघियों की देशभक्ति की वजह से ही राम नरेश यादव और बनारसी दास जैसे मुख्यमंत्री, यूपी में सुशासन की छटा बिखेर पाये थे!

कौन नहीं जानता कि बीजेपी के विशुद्ध नेताओं के पिछले राज में क़ानून-व्यवस्था और साम्प्रदायिक सौहार्द की दशा कितनी अद्भुत थी! किसान कितने सम्पन्न थे! ग़रीब-मज़दूर भी शाही ठाठ से रहते थे! बिजली हर वक़्त मिलती थी! गंगा जल तो अमृत-तुल्य था! अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, यूनिवर्सिटी, सड़क-नहर सभी जगह आदर्श स्थितियाँ थीं! सिर्फ़ एक कसर बाक़ी थी कि अयोध्या में विवादित ज़मीन पर भव्य राम मन्दिर नहीं बन पाया था! लिहाज़ा, ये विडम्बना नहीं तो और क्या थी कि इतनी अच्छाईयों के बावजूद उत्तर प्रदेश की अहसान-फ़रामोश जनता का दिमाग़ बौरा गया! दरअसल, राज्य की जनता वही सड़ी-गली जातिवादी, परिवारवादी, भ्रष्टाचारवादी व्यवस्था चाहती थी, इसीलिए उन्होंने निहायत ही सभ्य-सुशील, राष्ट्रभक्त और विकासोन्मुख बीजेपी को 14 साल के लिए वनवास पर भेज दिया! इतने तिरष्कार के बावजूद बीजेपी, यूपी पर न्यौछावर होने पर आमादा है! क्योंकि यही इकलौती पार्टी, सत्ता की भूखी नहीं है। बल्कि ये हिन्दू-राष्ट्र निर्माण के लिए अपमान का हरेक घूँट पी जाने वालों की जमात है!

बीजेपी को पूरा यक़ीन है कि 2017 में यूपी वाले अपने होशो-हवास से काम लेंगे! क्योंकि 2014 के बाद बीजेपी ने उत्तर प्रदेश को छोड़ पूरे देश में रामराज्य स्थापित किया है! अब यूपी को छोड़कर सर्वत्र सिर्फ़ खुशहाली ही खुशहाली है! केवल यूपी के चेहरे पर उभरे चेचक के काले धब्बों को भगवा मुखौटों से ढकना बाक़ी है! अबकी बार ये भी हो जाएगा! चुनाव तो बस औपचारिकता है! जनादेश तो लखनऊ की परिवर्तन रैली ने सुना ही दिया है! जैसे अयोध्या में वनवास से लौटने पर राम का राज्याभिषेक हुआ था, अबकी वैसा ही लखनऊ में बीजेपी का होना तय है! क्योंकि नोटबन्दी के यादगार क्रियान्वयन के ज़रिये ‘अच्छे दिन’ की छटा दिखाने वालों ने अपना हरेक वादा पूरा करके दिखाया है! जनता के खातों में 15-15 लाख रुपये पहुँच चुके हैं! सालाना दो करोड़ लोगों को रोज़गार मिल रहा है! अभी नोटबन्दी की वजह से जितने लाख लोग भी बेरोज़गार हुए हैं, उन्होंने नोटबन्दी के जश्न-स्वरूप अपनी रोज़ी पर लात मारी है, क्योंकि इसके बग़ैर ‘सबका साथ, सबका विकास’ कैसे होता!

ये बीजेपी और ख़ासकर नरेन्द्र मोदी के विराट हृदय का ही क़माल है कि ये फ़क़ीर काला धन हटाने और भ्रष्टाचार मिटाने के लिए फ़नाँ होने पर आमादा है, जबकि ऐसे धर्मात्मा के ख़िलाफ़ सारे विपक्षी एकजुट होकर बोलते हैं कि ‘मोदी को हटाओ’! लोक-लाज़ का दवाब न होता तो मोदी अवश्य ये कह बैठते कि यदि इस बार यूपी ने उन्हें गच्चा दिया तो वो इसकी हालत पाकिस्तान से भी बदतर बनाकर दिखाएँगे, जैसा उन्होंने कश्मीर का करके दिखाया है! एक से बढ़कर एक झूठ गढ़ने का कीर्तिमान बनाने वालों का नया नारा ये है कि यूपी वालों आपने मुझे यूपी से जिता दिया इसलिए अब मैं यूपी वाला हो गया, गुजराती नहीं रहा! यानी, मेरी नागरिकता भी अब पंचवर्षीय चुनाव के आधार पर तय होगी। कल तक गुजरात के पाँच करोड़ लोग मेरे चाकर थे! अब यूपी के 24 करोड़ लोगों को भी मेरी ग़ुलामी करनी चाहिए, जो पूर्ण बहुमत के बग़ैर हो नहीं सकती! देश में सर्वश्रेष्ठ ‘राजनीतिक समझ वाले’ यूपी के लोगों ने यदि इसका ख़्याल नहीं रखा तो वहाँ के लोगों को मैं दाने-दाने के लिए तरसा दूँगा!

नरेन्द्र मोदी देश के ऐसे इकलौते नेता हैं जो जनता के हितों के साथ कभी किसी भी तरह की राजनीति नहीं करते! क्योंकि वो शानदार चमक-दमक में रहने के बावजूद दरिद्र में नारायण के दर्शन करते हैं! इसीलिए काँग्रेस और समाजवादियों में उन्हें परिवारवाद दिखता है तथा बीएसपी में जातिवाद! जबकि संघ-परिवार में आदर्शवाद-नीतिवाद-राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भरा पड़ा है! इसलिए यूपी को यदि अपनी ख़ैरियत चाहिए तो वो वैसा ही परिवर्तन करे, जैसा युगदृष्टा नरेन्द्र मोदी उससे कह रहे हैं! क्योंकि सिर्फ़ बीजेपी ही यूपी का भाग्य बदल सकती है, वहाँ विकास की आँधी पैदा कर सकती है! ज़रा सोचिए कि अखिलेश सरकार ने यदि उन ढाई लाख करोड़ रुपये का सही उपयोग किया होता जो मोदी सरकार ने उत्तर प्रदेश को बतौर ‘ख़ैरात’ दिये हैं तो आज मोदी और उनकी बीजेपी को उत्तर प्रदेश में क्यों पानी की तरह अपना ईमानदारी वाला पैसा विकराल रैलियों पर बहाना पड़ता! कुलमिलाकर, यूपी की शानदार समझ की दाद देनी चाहिए जो ऐसे तथ्यहीन भाषणों को झेलने के लिए सुलभ रहता है!