सवाल ये है कि जब दो काँग्रेस में से एक को चुनना हो तो दग़ाबाज़ों की जमात को चुनें या वफ़ादारों के कुनबे को! दग़ाबाज़ नेता तो अपनी निर्वाचक जनता के साथ भी दग़ा क्यों नहीं करेगा! वैसे भी उत्तराखंड में चोटी के सियासी ब्राह्मण ख़ानदानों में दग़ाबाज़ी की रवायत रही है।

हेमवती नन्दन बहुगुणा और गोविन्द बल्लभ पन्त के बाद नारायण दत्त तिवारी का परिवारवाद भी अपना दग़ाबाज़ डीएनए लेकर कमंडलधारी भगवा बन चुका है। इन सभी को अपने घर में उपेक्षा बर्दाश्त नहीं हुई, इसीलिए नागपुर जाकर झाड़ू-पोंछा लगाने और थाली में छोड़ी जूठन तक खाने के लिए तैयार हो गये!

भारत की ब्राह्मणवादी सनातनी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था में ऐसा बदलाव तो मध्यकाल के मुसलिम शासकों और अँग्रेज़ों के राज भी नहीं दिखा! जिनके पुरखे कल तक बीजेपी और संघ को देश के लिए विध्वंसकारी बताकर समाज का मार्गदर्शन करते रहे उनकी सन्तति आज येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाने की चाहत में इस क़दर पतित हो जाएगी कि साम्प्रदायिक ताक़तों की गोद में जा बैठेगी, रोहित बेमुला के हत्यारों की पैरोकार बन जाएगी, अख़लाक़-हन्ताओं और गुजरात में उना के दलितों पर ज़ुल्म करने वालों की हिमायती बन जाएगी! इस सबकी कल्पना शायद ही किसी बुद्धिजीवी ने कभी की हो। इस मिसालों से तो राजनीति की अवसरवादिता भी शर्मसार हो जाएगी! ये तो चोटी के ब्राह्मणों का ही धर्मान्तरण है!

इसीलिए अबकी बार के चुनाव में ये भी तय हो कि क्या दग़ाबाज़, चरित्रहीन, बेईमान, जाति और धर्म-भ्रष्ट ब्राह्मणों का भी हुक्का-पानी बन्द नहीं होना चाहिए! क्या इन्हें जाति की महापंचायत से बहिष्कृत नहीं किया जाना चाहिए! आख़िर वो कौन सा कुकर्म होगा जिसके बाद ऐसे ब्राह्मणों को दलित और अछूत का दर्ज़ा दिया जाएगा! मन्दिरों में इनका प्रवेश वर्जित किया जाएगा! ब्रह्म-भोज में इन्हें प्रतिबन्धित किया जाएगा! चुनाव तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन इस बार सबसे पहले ‘ब्रह्म सत्य’ परिभाषित होना चाहिए! विधर्मियों से ब्राह्मण-कुल का दर्ज़ा छीनना बहुत ज़रूरी है!