नरेन्द्र मोदी के टक्कर का झूठा प्रधानमंत्री अभी तक देश में पैदा नहीं हुआ! महाशय, 27 जनवरी को जालन्धर में बेहद गर्व से पंजाबियों और 130 करोड़ भारतवासियों को बता रहे थे कि तीन महीने से उन पर ऐसे ज़ुल्म हो रहे हैं, जिसे वो बयाँ तक नहीं कर सकते! पहली बार किसी प्रधानमंत्री पर इसलिए ज़ुल्म हो रहा है कि वो कथित तौर पर भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं! ज़ुल्म की कहानी भी इतनी ख़ुफ़िया है कि उसे उन्होंने सिर्फ़ अपने कलेज़े में दफ़्न कर रखा है। मानों नीलकंठ महादेव ने विष को अपने गले में ही अटका लिया हो! वैसे, किसी गद्दीनशीं प्रधानमंत्री पर ज़ुल्म होने का सीधा सा मतलब है कि देश की संवैधानिक व्यवस्था चरमरा गयी है। वर्ना, जिसकी ज़िम्मेदारी 130 करोड़ भारतीयों को ज़ुल्म से बचाने की हो, उस पर कोई माई का लाल कैसे ज़ुल्म कर सकता है!

कहाँ गयीं वो वीर-रस की बातें जो दुश्मनों के दाँत खट्टे करने के लिए बोली जाती थीं! प्रधानमंत्री पर ज़ुल्म करने वालों को भी यदि देश का क़ानून सज़ा नहीं दे सकता तो आम जनता की क्या बिसात! अगर वो ख़ुद को ज़ुल्म से नहीं बचा सकते तो उन्हें अपने पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं हो सकता! लिहाज़ा, यदि प्रधानमंत्री इस्तीफ़ा देकर और ‘फ़क़ीर’ बनकर वनगमन करने से परहेज़ करते हैं तो साफ़ है कि वो सिरे से झूठ बोल रहे हैं। एक बार फिर से देश और दुनिया को उल्लू बना रहे हैं।

नरेन्द्र मोदी ने अगला सफ़ेद झूठ बोला कि वो ग़रीबों के हक़ में लड़ते रहेंगे। ऐसा नेता जो बुनियादी तौर पर अमीरों का ख़ैरख़्वाह हो, जिसकी मूर्खतापूर्ण नोटबन्दी की नीति ने करोड़ों ग़रीबों को बेरोज़गार कर दिया हो, जिसने करोड़ों ग़रीबों को मुम्बई, सूरत, गुरुग्राम, नोएडा, भिवंडी, मेरठ जैसी शहरों से अपना काम-धाम गँवाकर अपने गाँवों को लौटने के लिए मज़बूर कर दिया हो, वो ये दावा करे कि वो उसे ग़रीबों की परवाह है, तो इससे बड़ा झूठ और मज़ाक शायद ही कुछ और हो! सच तो ये है कि जिस बेवक़ूफ़ी भरे तरीक़े से नोटबन्दी को लागू किया गया उसका असली कहर तो ग़रीबों पर ही टूटा। अमीरों और खाते-पीते लोगों के पास तो इसे झेलने की ताक़त थी और उन्होंने झेला भी। लेकिन जो बेमौत मारे गये, वो सिर्फ़ औऱ सिर्फ़ ग़रीब ही थे! इसीलिए मोदी-राज ने देश की ग़रीब जनता पर ऐसा ज़ुल्म किया है, जिसकी दूसरी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती।

स्वान्तः सुखाय के लिए काँग्रेस पर बरसना नरेन्द्र मोदी का फ़र्ज़ और हक़ दोनों है। उन्होंने अपनी सहूलियत से ये झूठ भी गढ़ लिया कि काँग्रेस ‘डूबती नाँव’ और ‘इतिहास की बात’ है। सवाल ये है कि अगर काँग्रेस इतनी ही नकारा है तो फिर उन्हें काँग्रेस-फोबिया ने क्यों जकड़ रखा है! दरअसल, मोदी, संघ और बीजेपी को अच्छी तरह से मालूम है कि इस देश में यदि उन्हें कोई चुनौती दे सकता है तो वो काँग्रेस ही है। इसीलिए हमेशा काँग्रेस को निशाने रखा जाता है। राहुल और सोनिया का चरित्र-हनन किया और करवाया जाता है। मोदी को लगता है कि सबसे तगड़े विरोधी को ऐतिहासिक और डूबती नाँव बताने से जनता झाँसे में आ जाएगी और उनकी चतुर्दिक नाकामियों को नज़रअन्दाज़ करके उनकी गोदी में ही बैठने के लिए मचलती रहेगी। मोदी भूल रहे हैं कि 2014 बहुत दूर जा चुका है। तब झूठ की खेती लहलहा गयी थी। लेकिन अब वो मुँगेरी लाल के हसीन सपने देख रहे हैं! ज़ुल्म का उलाहना देकर घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं!

ये सही है कि काँग्रेस ने अपनी ताक़त को बर्बाद नहीं होने देने के लिए बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी से और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से समझौता किया। ये भी सही है कि काँग्रेस इतनी मज़बूत नहीं है कि वो अपने बूते बीजेपी को हर जगह टक्कर दे सके। लेकिन ये भी सही है कि राजनीति में किसी भी पार्टी की मज़बूती या कमज़ोरी स्थायी नहीं होती। जनता समय-समय पर उसे बदलती रहती है। अब सवाल ये है कि जनता ऐसा करती किस आधार पर है? जनता देखती है कि राजनीतिक दल उससे जो-जो वादे करते हैं, उसे पूरा कैसे और कितना करते हैं! इतिहास गवाह है कि जनता को जब-जब ये लगा कि अमुक दल ने उसे उल्लू बनाकर सत्ता हथियाई है, तब-तब जनता ने झाँसा देने वालों को माकूल सज़ा दी। काँग्रेस को भी जनता ने ही सत्ता से बाहर किया था। क्योंकि इत्तेफ़ाक़ से संघ-बीजेपी उसके ख़िलाफ़ झूठ को ज़बरदस्त ढंग से फ़ैलाने में कामयाब हो गये थे।

वर्ना, काँग्रेस पर जितने बड़े-बड़े घोटालों के आरोप लगाये गये, यदि वो सच्चे थे तो अब तक काँग्रेस के नेताओं को जेलों में क्यों नहीं ठूँसा गया? मोदी-राज के पौने तीन साल हो चुके हैं। लेकिन घोटालों की सच्चाई आज तक देश के सामने क्यों नहीं आयी! इसका ये मतलब कतई नहीं कि देश में भ्रष्टाचार है ही नहीं। लेकिन यदि नेता और अफ़सर काग़ज़ों का पेट भरकर बेईमानी करने में सफल हो जाते हैं तो यक़ीन जानिए मोदी राज का कच्चा चिट्ठा भी जनता के सामने कभी नहीं खुल पाएगा। फिर ये कैसे तय होगा कि मोदी सरकार कितनी अच्छी या घटिया है? ये तय होता है, नेताओं के वादों की हक़ीक़त परखकर। कौन नहीं जानता कि नोटबन्दी की अन्तहीन कतारों में कभी कोई कद्दावर व्यक्ति खड़ा नहीं पाया गया। सारी मुसीबत आम लोगों के गले पड़ी।

अभी तक क्यों देश को ये पता नहीं है कि नोटबन्दी से कितने कालेधन का सत्यानाश हुआ? कुल कितनी रक़म बैंकों में पहुँची? ज़रा सोचिए कि घपला इतना बड़ा है कि अब तक सरकार आँकड़े तक सामने नहीं ला सकी। आख़िर सरकार कब साफ़ करेगी कि 70 साल की काली कमाई से हाथ धोने वाले लोग कौन हैं और उनका कितना कालाधन डूब चुका है? जुमलेबाजी का कहीं तो अन्त होना ही चाहिए। अब दावा किया जा रहा है कि मोदी ने राजनीतिक जीवन से भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का बेड़ा उठाया है। लेकिन ज़रा ये भी तो सोचिए कि क्या बीजेपी अपने चुनाव प्रचार में सारा सफ़ेद धन ही ख़पा रही है। मोदी, बड़े गर्व से ढोल पीटते हैं कि एक काँग्रेसी मंत्री के घर से सरकार को 150 करोड़ रुपये के नोट मिले। अच्छी बात है। पकड़िए ऐसों को। जमकर ख़बर भी लीजिए। लेकिन साथ ही ये भी तो बताइए मोदी जी कि नोटबन्दी के बाद आपकी शस्य श्यामला पार्टी के कितने परवानों, मस्तानों और दीवानों के पास से नये-पुराने नोटों की भारी बरामदगी हुई है? क्या आपको अपनी ही पार्टी की श्रेष्ठ हस्तियों के बारे में पता नहीं है या फिर बीजेपी शासित राज्यों की शर्मिन्दा करने वाली ख़बरें आप तक पहुँचती ही नहीं!

सही है कि काँग्रेसी, सत्ता के लिए छटपटा रहे हैं। लेकिन आप भी झूठ पर झूठ इसीलिए बोलते हैं कि कहीं जनता आपके झाँसे में नहीं आयी तो आपका हाल भी ‘बिन जल मछली’ वाला ही न हो जाए। सत्ता से दूर जाने की चिन्ता ने आपके मन-मस्तिष्क में भी छटपटाहट पैदा कर रखी है। आप पर भी ख़ौफ़ का साया है कि कहीं नोटबन्दी से पैदा हालात बीजेपी पर ही सर्ज़िकल हमला न साबित हो जाएँ। आसार तो इसी के ज़्यादा हैं! चुनाव में जनता साफ़ कर देगी कि उसे आप पर हुए फ़र्ज़ी ज़ुल्मों में सच्चाई दिखी या फिर आपकी नादानी और बेवक़ूफ़ियों से उसकी ज़िन्दगी दुश्वार हुई! सुबह से शाम तक झूठ बोलने वाले मोदी जी याद रखिए, जनादेश की लाठी जब सिर पर फूटती है तो आवाज़ नहीं करती!