मैंने दो लघु फ़ेसबुक पोस्ट लिखे:
हरेक पार्टी अपने आन्तरिक सर्वे से चलती है! इसी ने तो बीजेपी में बौखलाहट भर दी है!
मोदी-शाह बेचैन हैं, 11 मार्च के बाद पार्टी के आन्तरिक-विद्रोह पर कैसे क़ाबू पाएँगे…!

कई दोस्तों ने इसे पढ़ा और मुझे फ़ोन किया। और ब्यौरा जानने के लिए! इन दोस्तों में कई ऐसे हैं जो जानते हैं कि क़रीब एक दशक तक मैंने उन मीडिया घरानों के लिए सर्वोच्च स्तर पर बीजेपी की कवरेज़ की है जिनके मालिकों की संघ से जगज़ाहिर नज़दीकी रही है। लेकिन वो दौर सच्ची, प्रमाणिक और खाँटी ख़बरनबीसी का था। इसलिए मुझे कभी अपनी और मीडिया संस्थान या सम्पादक की विचाराधारा सम्बन्धी द्वन्द में नहीं उलझना पड़ा! तब के सम्पादक भी आजकल की तरह मूर्ख नहीं होते थे! ख़बर की इज़्ज़त थी! रिपोर्टर की अपनी प्रतिष्ठा बहुत मायने रखती थी! रिपोर्टर की पहुँच, प्रयास और क़ाबलियत पर संस्थान गर्व करता था! पीठ पीछे तारीफ़ होती थी! ख़ैर… फ़ोन करने वाले मित्रों का ये भी आग्रह रहा कि मैं ये समझाऊँ कि आख़िर ये आन्तरिक सर्वेक्षण क्या बला है? इससे मैं अपने उस पेशेवर फ़र्ज़ तले दबने लगा, जिसका प्रतिफल आपके समक्ष है।

चुनाव जीतने के लिए हरेक पार्टी को बूथ स्तर पर समर्पित कार्यकर्ताओं की ज़रूरत होती है। ज़मीनी सियासत की क़मान इन्हीं अदृश्य रहने वाले कॉडर या वर्कर में होती है। इन्हीं लोगों को वैचारिक, राजनीतिक, आपराधिक, आर्थिक हठकंडों से हरेक पार्टी और उसके सफल-विफल नेता बाँधकर रखते हैं! यही लोग किसी भी पार्टी की असली पूँजी होते हैं! ये न तो आसानी से जुड़ते हैं और न ही आसानी से भागते हैं! ये लोग अपनी पार्टी या कई बार नेता के लिए भी किसी भी हद्द तक चले जाते हैं। बदले में बढ़िया किस्म के नेता इन लोगों पर जान छिड़कते हैं! इस तरह ताली दोनों हाथों से बजती है!

देश में समर्पित कार्यकर्ताओं या स्वयंसेवकों की सबसे बड़ी फ़ैक्ट्री संघ है। संघ का अचूक तंत्र मन्द-बुद्धि हिन्दुओं को कट्टरवाद, मुसलिम-घृणा, छद्म राष्ट्रवाद, जातिवाद जनित हिन्दुत्व, धार्मिक पाखंड जैसे विषयों में दीक्षित करता है। ऐसे हरेक दीक्षित का दायित्व है कि वो अपने जैसे ही ज़्यादा से ज़्यादा कूप-मंडूक तैयार करें। ताकि जैसा इशारा नागपुर से मिले, वैसा अपने-आप होने लगे। चुनाव के मौसम में इन दीक्षित स्वयंसेवकों को प्रचार करने, अफ़वाहें-फ़ैलाने, हिंसा-उन्माद या दंगा फ़ैलाने जैसे हरेक काम के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जो-जो विशेषताएँ किसी इस्लामिक आतंकवादी, किसी खालिस्तानी, किसी हमास वाले, किसी लिट्टे वाले, किसी नागा, किसी नक्सली उग्रवादी में होती है, वो सारी इन स्वयंसेवकों में भी होती है! इसीलिए यक़ीन कीजिए कि संघ से ये इशारा हो जाए कि ‘भारत के संसद भवन को ध्वस्त कर दो’ तो स्वयंसेवक ऐसा करके भी दिखा देंगे! जैसे उन्होंने 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मसजिद ढहायी थी या जैसे 21 सितम्बर 1995 को पूरी दुनिया में गणेश जी को दूध पिलाकर दिखा दिया था! दरअसल, ये मतान्ध लोगों का विशाल कुनबा है!

चुनाव के वक़्त इन्हीं स्वयंसेवकों को पोलिंग एजेंट बनाया जाता है। बीजेपी तो सिर्फ़ मुखौटा होती है। ये लोग पूरी तरह से संघ के पदाधिकारियों के मातहत होते हैं और पूरी तरह से उन्हीं से संचालित भी होते हैं। संघ-बीजेपी के लिए हरेक ख़ुफ़िया गतिविधि को अंज़ाम देना इन्हीं की ज़िम्मेदारी है। जहाँ समर्पित स्वयंसेवकों की संख्या ज़्यादा होती है, वहाँ सभी में थोड़ा-थोड़ा काम बाँट दिया जाता है, ताकि वो और कुशलता से हो सके! वर्ना, मुट्ठी भर स्वयंसेवक भी हरेक गतिविधि के लिए पर्याप्त हो सकते हैं। वोटिंग के दिन यही संघी पोलिंग एजेंट अपने वोटर लिस्ट में उन लोगों के नाम के आगे ख़ास निशान लगाते चलते हैं जो बीजेपी को वोट देते हैं या देने वाले होते हैं! शहरी इलाक़े में लोगों का मेल-जोल सीमित रहता है इसलिए इन संघी पोलिंग एजेंट्स के आँकलन में कुछ कसर हो भी सकती है। लेकिन छोटे शहरों, क़स्बों और गाँवों में इनकी जानकारी 99 फ़ीसदी तक सटीक होती है!

वोटिंग समाप्त होने के बाद पोलिंग एजेंट बने ये संघी स्वयंसेवक इस बात का हिसाब लगाते हैं कि जिस बूथ पर वो तैनात थे, वहाँ पड़े कुल कितने वोट बीजेपी के खाते में गये होंगे? हरेक बूथ से मिली ऐसी जानकारी को संघ की मंडल, ज़िला, प्रान्त जैसे स्तर पर जोड़ा जाता है। फिर विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से आँकड़े तैयार किये जाते हैं और संघ के आला पदाधिकारियों तक पहुँचाया जाता है। इन आँकड़ों के साथ ऐसी संक्षिप्त रिपोर्टें भी होती हैं, जिससे ये समझा जा सके कि कौन से तथ्य पार्टी के पक्ष में रहे और कौन से ख़िलाफ़! ये सारे आँकड़े बेहद गोपनीय ढंग से आगे बढ़ाये जाते हैं। कई दौर की पोलिंग वाले चुनावों में यही ख़ुफ़िया सर्वेक्षण जहाँ पार्टी में हौसला भरता है, वहीं इसी से पार्टी के कर्ता-धर्रा के होश भी फ़ाख़्ता हो जाते हैं!

उत्तर प्रदेश में अब तक तीन दौर का मतदान हो चुका है। हर दौर के बाद ख़ुफ़िया आँकड़ों का संकलन होता है और उसे आगे भेजा जाता है। यही संकलन आन्तरिक सर्वेक्षण कहलाता है। जिसके ग़लत होने की आशंका तक़रीबन नहीं के बराबर होती है! वैसे हरेक पार्टी की ख़्वाहिश रहती है कि उसके पास भी ऐसी ही आन्तरिक रिपोर्टें पहुँचें। पहुँचती भी हैं। लेकिन अपने समर्पित स्वयंसेवकों की वजह से संघ-बीजेपी का आन्तरिक सर्वेक्षण अन्य किसी भी स्रोत पर लाख दर्जे ज़्यादा प्रमाणिक होता है। संघियों के आँकलन में गच्चा खाने की आशंका तक़रीबन नहीं के बराबर होती है!

बाक़ी तमाम पार्टियाँ इतनी ख़ुशनसीब कभी नहीं होतीं। वैसे एक वक़्त था जब कम्यूनिस्टों ख़ासकर सीपीएम का कॉडर भी संघियों जैसी शिद्दत से ही काम करता था। लेकिन अब वो बात नहीं रही! काँग्रेसियों के पास तो कभी समर्पित कॉडर जैसी कोई चीज़ रही ही नहीं। सिवाय इसके कि आम लोग भी गर्व से कहते हैं कि भाई हम तो ख़ानदानी काँग्रेसी हैं, मेरे तो बाप-दादा सभी काँग्रेसी रहे हैं, मेरे घर ने हमेशा काँग्रेस को ही वोट दिया है, वग़ैरह-वग़ैरह! तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के साथ ऐसा नहीं है। उनके पास भी अपने समर्पित कार्यकर्ता होते हैं, लेकिन किसी में भी संघियों जैसी विशेषताएँ नहीं पायी जातीं!

आख़िरी बात! ये सवाल स्वभाविक है कि संघियों की जो आन्तरिक रिपोर्ट इतनी ख़ुफ़िया होती है, उसके बारे में किसी और को पता कैसे चल सकता है? जवाब है कि यही तो असली ख़बरनबीसी है। पॉलिटिकल रिपोर्टिंग का यही तो कौशल है कि आपको उन लोगों का भी विश्वसनीय बनना होता है जिनकी ख़ुफ़िया रिपोर्ट से बल्ले-बल्ले होने वाली है और उनका भी जो मौजूदा निज़ाम के पतन में ही अपने उत्थान की सम्भावनाएँ देख रहे होते हैं! यह पार्टी का अदृश्य और अघोषित ख़ेमा होता है। उम्दा पत्रकारों को सबकी फ़ितरत को पहचानना आना चाहिए। हरेक ख़ेमा ऐसे ही पत्रकारों से ख़ुद को जोड़ने और उससे ख़बरें प्लांट करवाने के लिए बेताब रहता है। इसके बावजूद, जब तक पत्रकार, नेताओं के निजी अहसानों तले नहीं दबते, तब तक उनकी ख़बरें आसानी से ग़लत साबित नहीं होतीं!