उत्तर प्रदेश के चुनावों में बीजेपी ने एक बार फिर से राम मन्दिर के मुद्दे को हवा दी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता विनय कटियार ने तो यहाँ कह दिया कि राम मन्दिर के बग़ैर विकास, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दे भी बेमानी हैं। कटियार ये भी कह चुके हैं कि राम मन्दिर नहीं बना तो प्रचंड आन्दोलन होगा। अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती है तो अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण ठीक उसी तरह से कराया जाएगा जैसे बाबरी ढाँचे को गिराया गया था। क़रीब महीने भर पहले विनय कटियार के बिगड़े होल थे कि प्रियंका गाँधी से कहीं ज़्यादा सुन्दर कई चेहरे बीजेपी के स्टार प्रचारक हैं। इसीलिए ये सवाल ज़्यादा मौजूँ है कि नेताओं के बिगड़े बोल के मायने क्या हैं?

उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार की शुरुआत ‘विकास’ की जिस डुगडुगी को बजाकर हुई थी, वो चुनाव के आगे बढ़ने के साथ ही फ़ाख़्ता क्यों हो गयी? परिवारवाद और गुंडाराज जैसे जिन मुद्दों को पहले दौर में गरमाया गया, वो चुनाव के आगे बढ़ने के साथ ही विरोधियों के चरित्र हनन और व्यक्तित्व मर्दन के रूप में क्यों तब्दील हो गयी? यदि नेताओं के ऐसे तेवर आपको अखरते हैं, यदि आपको लगता है कि मौजूदा चुनाव में नेताओं की बयानबाज़ी या भाषणबोली लगातार स्तरहीन और अमर्यादित होती जा रही है तो आप ख़ुद को सियासी तौर पर नादान, अबोध और अपरिपक्व मान सकते हैं, क्योंकि सच्चाई ऐसी कतई नहीं होती!

सच तो ये है कि तमाम नेतागण वही बोल रहे हैं जैसा वो बुनियादी तौर पर सोचते और समझते हैं तथा बोलना चाहते हैं। आप ये भी गाँठ बाँध सकते हैं कि किसी भी पार्टी के बड़े नेता या स्टार प्रचारक की ज़ुबान कभी नहीं फिसलती! दरअसल, नेता बनता ही वही है, और माना ही उसे जाता है जिसका उसकी वाणी पर संयम हो। इस लिहाज़ से कोई भी नेता अपरिपक्व या परिपक्व नहीं होता! सभी अपनी सियासी सहूलियत के मुताबिक ‘बुरा न मानो होली है’ की तर्ज़ पर असंख्य सच-झूठ गढ़ते एक-दूसरे का तियापाँचा करते हैं। इसीलिए चुनावी मौसम में नेताओं के बेसुरे राग वैसे ही स्वाभाविक बन जाते हैं, जैसे बरसात में मेढ़कों की टर्रटर्र!

इसमें कोई शक़ नहीं कि SCAM (समाजवादी, काँग्रेस, अखिलेश, मायावती), श्मशान-क़बिस्तान, गदहा और कसाब सभी ने मिलकर असली मुद्दों जैसे सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार वग़ैरह की आबरू लूट ली। लम्बे चुनाव प्रचार की वजह से नेताओं की लफ़्फ़ाज़ियाँ बहुत लम्बी खिंच जाती हैं। रोज़ाना एक के बाद एक रैली में बोलने के लिए नयी बातों का अकाल पड़ जाता है तो बेसिरपैर की बातों की पौ-बारह हो जाती है।

नेताओं के बिगड़े बोल की सबसे बड़ी वजह ये है कि वोटिंग के चरणों के आगे बढ़ने के साथ ही राजनीतिक दलों को जनता के रूझान का फ़ीडबैक मिलने लगता है। उनके पोलिंग एजेंट्स की रिपोर्टें बताने लगती हैं कि वोटरों ने ईवीएम मशीनों में किस चुनाव चिन्ह को तव्वज़ो दी है? अपने आन्तरिक सर्वेक्षणों के आधार पर हरेक नेता नतीज़ों की आहट भाँप लेता है। जनादेश का रुझान जिसके पक्ष में होता है उनकी भाषा संयत रहती है। जबकि विरोधी की बोली बौखलाहट, बदहवासी और चिड़चिड़ागट साफ़ दिखने लगती है। बड़ी रैलियों से हौसला तो बढ़ता है, लेकिन भीतर से मूड उखड़ा ही रहता है कि भीड़, वोटों में तब्दील क्यों नहीं हो रही?

दूसरी वजह होती है जनता की तालियाँ बटोरना, जो छिछोरी बातों पर आसानी से मिल जाती है। यही छिछोरापन या स्तरहीनता, मीडिया में सुर्ख़ियाँ पाती हैं तो नेतागणों को लगता है कि उनकी फ़िल्न बाक्स ऑफ़िस पर अच्छा कलेक्शन कर रही है। फिर एक की लपलपाती जीभ को कतरने के लिए दूसरा भी उसी सुर का तीब्र स्वर थाम लेता है। इसी क्रम में अपने नेता के अमर्यादित होते शब्दों से

कार्यकर्ताओं को उसके दुस्साहसी होने का अहसास और ग़ुमान होने लगता है। लेकिन जनता पर ऐसी नौटंकियों का कोई असर नहीं पड़ता। उल्टा जो जीत रहा होता है, उसकी जीत और पुख़्ता होने लगती है, जबकि हार रही पार्टी का और बेड़ा गर्क हो जाता है।

मायावती अपने विरोधियों के लिए तू-तड़ाक वाली भाषा बोलने की अभ्यस्त रही हैं। इससे उनके सदियों से दबे-कुचले समर्थकों की हीन-भावना दूर होती है। उनके कलेज़े को ठंडक मिलती है कि ऊँची जाति वाले दबंगों को भी उसकी नेता ठेंगे पर रखती है। दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी जब मुसलमानों का सन्दर्भ देते हैं तो हिन्दुत्ववादियों की रूह को चैन मिलता है। तीसरी ओर, राहुल गाँधी जब समाज को जोड़ने और तोड़ने वालों की बात करते हैं तो मुसलमानों और प्रगतिशील लोगों का काँग्रेसी संस्कृति पर भरोसा बहाल होता है। इस तरह, हरेक नेता और पार्टी की कुछ न कुछ अलग पहचान है। बाज़ारवाद की शब्दों यही ‘यूनिक सेविंग प्वाइंट’ यानी यूएसपी होता है।

चुनावी भाषणों में नेताओं के बिगड़ते बोल अहसास कराते हैं कि उऩकी पार्टी का अन्दरुनी हाल क्या है? जब गम्भीर मुद्दों को व्यक्तिगत छींटाकशी से निपटाया जाए तो समझिए कि ऐसा करने वाला नेता अपनी खीज़ मिटाने के लिए परेशान है। मसलन, यदि कोई नोटबन्दी पर जनता को हुई परेशानियों का ज़िक्र करे और जवाब में दूसरा ये चर्चा नहीं करे कि परेशानी वास्तव में है भी या नहीं? है तो कैसी, कितनी और क्यों है? बल्कि मुद्दे को भटकाने के लिए कहा जाए कि नोटबन्दी की आलोचना करने वाले ख़ुद की तकलीफ़ का रोना रो रहे हैं। क्योंकि वो ख़ुद परिवारवाद और भ्रष्टाचार के पोषक हैं।

भ्रष्ट भाषा की शुरुआत ऐसी ही बातों से होने लगती है। इसके बाद वो कहाँ का रुख लेगी, ये भगवान भी नहीं जानते? व्यक्तिगत हमलों का खेल एक-दूसरे को ललकारने और हल्की भाषा के ज़रिये उकसाने के लिए किया जाता है। जैसे ही कोई यूपी वालों को अपना माई-बाप बनाता है, वैसे ही दूसरा याद दिलाता है कि उस गंगा मईया का क्या हुआ जिसके बुलाने पर आप आये थे, अब आपको उसकी दुदर्शा क्यों नहीं दिख रही? इसी बीच, किसी को किसी का ‘लेवल’ बेचैन कर देता है। ऐसे में रहीम के दोहे अच्छे-अच्छों का ‘लेवल फ़िक्स’ कर देते हैं –

1. जो बड़ेन को लघु कहै, नहिं रहीम घटि जाहिं। गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं।

अर्थात – बड़ों को छोटा कह देने से उनका बड़प्पन कम नहीं हो जाता। गिरिधर कृष्ण को जब मुरलीधर कहा जाता है तो क्या वो बुरा मानते हैं। इसीलिए औरों को कमतर आँकने से वो छोटे नहीं हो जाते।

2. बड़े बड़ाई ना करैं, बड़ो न बोलैं बोल। रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मम मोल।

अर्थात – जो सचमुच बड़ी हैसियत वाले होते हैं, वो अपनी तारीफ़ ख़ुद नहीं किया करते। जैसे हीरा कब कहता है कि उसका दाम लाख रुपया है। यानी, सिर्फ़ अहंकारी लोगों में ही मुँह मियाँ मिट्ठू बनने की बीमारी होती है।

3. जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय। पयादे सो फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय।

अर्थात – नीच प्रवृति के लोग जब जीवन में आगे बढ़ते हैं तो वो बहुत घमंडी हो जाते हैं। जैसे शतरंज के खेल में फ़र्ज़ी बनते ही प्यादे की चाल टेढ़ी हो जाती है। यानी, जिन्हें मामूली कामयाबी अहंकारी बना देती है वो व्यक्ति निहायत घटिया होते हैं।