यदि नोटबन्दी के दौरान आपको मिले जख़्म अभी भी हरे हैं तो अब आप अपने बैंकों का एक और सितम झेलने के लिए कमर कस लें। हमारे बैंकों ने अब अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए आम आदमी की जेब को कतरने का जो तरीक़ा ईज़ाद किया है, उसका नाम है बैंकिंग लेन-देन शुल्क या बैंकिंग ट्रांजेक्शन चार्ज। यदि आप मध्यम और निम्न आय वर्ग से ताल्लुक रखते हैं तो जल्द ही आप अपने बैंक के शोषण का शिकार होने वाले हैं। लेकिन यदि आप समाज के सम्पन्न तबके से हैं तो आप पर आपके बैंक की मेहरबानी बनी रहेगी। क्योंकि अलग-अलग बैंकों ने अपने अलग-अलग किस्म के ग्राहकों के लिए अलग-अलग तरह के बैंकिंग लेन-देन शुल्क का खाक़ा तैयार किया है।

आमतौर पर सरकारी एजेंसियाँ कुछ सुविधाओं के लिए अमीर से अधिक पैसे या टैक्स लेती हैं, ताकि ग़रीबों को सहूलियत दी जा सके। कल्याणकारी देश (Welfare State) के लिए ऐसा करना लाज़िमी है। लेकिन मोदी सरकार के कैशलेस इंडिया के सपनों की आड़ में हमारे बैंकों ने अपनी आमदनी बढ़ाने और कैश के लेन-देन को हतोत्साहित करने की जो योजना बनायी है, उससे तो उनका बँटाढ़ार ही होगा। क्योंकि भारत आज भी एक ग़रीब देश है। ग़रीबों के पास इतना पैसा होता नहीं कि वो बैंकों में भारी रकम रखें और बार-बार पैसे जमा करें या निकालें। लिहाज़ा, बैंकिंग लेन-देन शुल्क की वजह से करोड़ों ग़रीबों की लघु बचत बैंकों में नहीं पहुँचेगी। वो अपनी रकम को नकद यानी कैश में ही रखना चाहेंगे। इससे जल्द ही बैंकों का कुल जमा (Total Deposits) प्रभावित होगा और उनकी माली हालत सुधरने के बजाय ख़राब ही होगी।

यही नहीं, जिस मनमाने ढंग से बैंकिंग लेन-देन शुल्क ऐंठने की तैयारी हुई है, उससे साफ़ है कि भारतीय रिज़र्व बैंक अब एक बेअसर संस्था बन चुकी है। रिज़र्व बैंक ही देश की मौद्रिक नीति और बैंकिंग क्षेत्र का नियंत्रक (Regulator) होता है। लेकिन उसके लचर प्रावधानों को तोड़मरोड़कर अलग-अलग बैंकों ने अलग-अलग बैंकिंग लेन-देन शुल्क लागू करने का ऐलान किया है। हालाँकि, पहले भी कई बैंक ग्राहकों से तरह-तरह की फ़ीस लेते वसूलते थे, लेकिन अब तो बात पूरी तरह से बेपर्दा है। बदकिस्मती से देश देख चुका है कि किस तरह से नोटबन्दी के दिनों में रिज़र्व बैंक को रोज़ाना अपने फ़रमान बदलने पड़ते थे और कैसे उसके कार्यक्षेत्र और शक्तियों का प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपहरण कर लिया था!

इसीलिए ये समझना मुश्किल नहीं कि रिज़र्व बैंक की रज़ामन्दी के बग़ैर कैसे सरकारी और निजी बैंकों ने एकरूपता और पारदर्शिता की अनदेखी करके मनमाने ढंग से बैंकिंग लेन-देन शुल्क वसूलने की ठान ली। इस बात का कोई ब्यौरा नहीं है कि बैंकों ने किस आधार पर एक ही सेवा के लिए अपनी अलग-अलग फ़ीस तय की है? कोई ये नहीं जानता कि ऐसी शुल्क-वसूली से बैंकों की आमदनी में कितना इज़ाफ़ा होगा? कुछ बैंकों की बदनीयती भी हास्यास्पद है। वर्ना ये कैसे तय होगा कि कम्प्यूटरीकृत बैंकिंग के मौजूदा दौर में किसी ग्राहक को यदि उसके ही बैंक की ‘नॉन होम ब्रांच’ सेवाएँ देगा तो इससे उस बैंक की लागत कैसे बढ़ जाएगी? ये वो सवाल हैं जिसे रिज़र्व बैंक को अपने मातहत बैंकों से पूछने चाहिए। लेकिन लगता है कि नोटबन्दी पर हुई अपनी छीछालेदर से रिज़र्व बैंक अब भी सदमे में ही है।

बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े भारतीय आँकड़े ये बताने के लिए काफ़ी हैं कि अभी हमें बहुत लम्बा सफ़र तय करना है। देश में क़रीब 80 हज़ार बैंक शाखाएँ हैं। क़रीब सवा दो लाख एटीएम हैं। नोटबन्दी से पहले औसतन 80 फ़ीसदी एटीएम ही हर वक़्त काम कर पाते थे। अभी तो इसकी सक्रियता उस दौर के मुकाबले आधी ही है। ये सब मिलकर देश के क़रीब 40 करोड़ लोगों को ही बैंक-खाताधारक बना सके हैं। इन खातों में कम से कम 75 फ़ीसदी ऐसे हैं, जिसका ‘बैलेंस’ बमुश्किल 20-25 हज़ार रुपये भी नहीं है। बदकिस्मती से इसी तबके पर नये बैंकिंग लेन-देन शुल्क की सबसे तगड़ी मार पड़ने वाली है।

बहुत पुरानी बात नहीं है, जब पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने ग्राहकों को किसी भी एटीएम से पाँच बार रुपये निकालने की सुविधा मुहैया करवायी थी। इसके पीछे सिर्फ़ इतना सा तर्क था कि हरेक बैंक के लिए अपने एटीएम का बड़ा नेटवर्क बनाना न सिर्फ़ कठिन होगा, बल्कि ख़ासा खर्चीला भी। लिहाज़ा, बैंकों को एक-दूसरे के ग्राहकों को एटीएम की सुविधा देने और बदले में बैंकों के बीच 50 रुपये बतौर ख़र्च लेन-देन की नीति लागू हुई। इसके बाद एक प्रस्ताव ये भी बना कि सभी बैंक मिलकर एक ऐसी संस्था बनाएँ जो देश के सारे एटीएम को संचालित करे और ग्राहकों के इस्तेमाल के मुताबिक़, बैंक उस संस्था को अपनी फ़ीस भरें। इससे एक ही इलाके में तमाम एटीएम की मौजूदगी के मौजूदा दशा बदल जाती और फ़ालतू एटीएम को अछूते इलाकों में तैनात किया जाता। लेकिन अफ़सोस कि रिज़र्व बैंक ने ऐसी नीति को धक्का देने में कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखाया।

अब देश में बैंकिंग से हरेक नागरिक को जोड़ने (Financial inclusion) के लिए सरकार डाकघरों और मोबाइल कम्पनियों की सेवाएँ लेने की बातें कर रही है। लेकिन जो लोग पहले से बैंकों से जुड़े हैं, उनकी बैंकिंग पर प्रस्तावित शुल्क निश्चित रूप से प्रतिकूल प्रभाव डालेंगे। मिसाल के तौर पर जो व्यक्ति महीने में पाँच-सात बार एटीएम से दस-दस हज़ार रुपये निकालता था, वो अब एक बार में ही 50 हज़ार रुपये निकालने के लिए अपने बैंक जाना चाहेगा। ताकि वो नयी फ़ीस से बच सके। इससे बैंक जाने में लगने वाला उसका धन-श्रम वापस उन्हीं दिनों जैसा हो जाएगा, जैसा हमने बैंकिंग क्रान्ति के पहले देखा था। यही ग्राहक अब अपने पास ज़्यादा कैश रखना चाहेगा और बैंक जाने की फ़ज़ीहत से बचने की कोशिश करेगा। देर-सबेर इस प्रवृति का असर बैंकों की सेहत पर भी पड़ेगा।

प्रस्तावित फ़ीस के ऐलान के वक़्त यदि बैंकों ने ये कहा होता कि हम ग्राहकों को बदले में खातों पर अधिक ब्याज भी देंगे, तो निश्चित रूप से बैंकों की लघु-बचत के इज़ाफ़ा होता। लेकिन नयी नीति से साफ़ है कि बैंक सिर्फ़ उन्हीं लोगों को प्राथमिकता देना चाहेंगे जो उसकी नज़र में मालदार आसामी हैं। ये नज़रिया उस सोच के विपरीत होगा, जिसे तहत 1969 में इन्दिरा गाँधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। उस दौर में हमारे बैंक मुख्य रूप से रईसों की ही सेवा करते थे। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद उन्हें आम लोगों को भी बैंकिंग सुविधाएँ देने के लिए मज़बूर होना पड़ा। लेकिन, न जाने क्यों, हमारा रिज़र्व बैंक बीते अनुभवों के आगे बुत बना बैठा है!