राजनीति में अंकगणित का खेल सबसे निराला है! इस क़दर कि 11 मार्च की मोदी लहर के बावजूद, दो महीने बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी के लिए अपने चहेते उम्मीदवार को राष्ट्रपति बना पाना आसान नहीं होगा! क्योंकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में शानदार जीत दर्ज़ करने और मणिपुर में ऐतिहासिक प्रदर्शन करने के बावजूद राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में एनडीए खेमे का संख्या-बल बहुमत से क़रीब दो फ़ीसदी दूर ही रह गया है। 2011 की जनगणना के मुताबिक़, राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल का कुल मत-मूल्य 10,98,882 है। ताज़ा विधानसभा चुनाव से एनडीए का मत-मूल्य जीत के लिए ज़रूरी बहुमत से 75,076 कम था। लेकिन अब सारे नतीज़ों के आ जाने के बावजूद क़रीब 20 हज़ार मतों की कसर बनी हुई है।

ऐसा नहीं है कि बीजेपी इस कसर की भरपायी नहीं कर सकती। राष्ट्रपति पद के अपने उम्मीदवार के लिए बीजेपी उन दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश करेगी जो अभी न तो एनडीए में हैं और न ही यूपीए में, जैसे बीजू जनता दल और अन्ना द्रमुक वग़ैरह। लेकिन देश के मौजूदा सियासी माहौल में ऐसा हो पाना आसान नहीं है। अलबत्ता, राजनीति में नामुमकिन कुछ नहीं होता। यहाँ जन्म-जन्मातर का विरोधी भी रातों-रात मित्र बना चाहता है और पुराने से पुराने दोस्त को भी विरोधी बनते देर नहीं लगती। इसीलिए, संख्या-बल की अहमियत हमेशा बनी रहती है।

अगले तीन महीने के दौरान देश में नये राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव होना है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का पाँच साल का कार्यकाल 24 जुलाई 2017 को समाप्त होगा। जबकि उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की दोहरी पारी 10 अगस्त 2017 को ख़त्म होगी। दोनों चुनावों में से जहाँ अपने पसन्द का नया उपराष्ट्रपति बीजेपी आसानी से बना लेगी, वहीं राष्ट्रपति के लिए उसे मनपसन्द उम्मीदवार को जीताने में नाकों-चने भी चबाने पड़ सकते हैं। दरअसल, संविधान के मुताबिक, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों का चुनाव अलग-अलग नियमों से होता है। उपराष्ट्रपति को जहाँ लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सांसद चुनते हैं, वहीं राष्ट्रपति को एक निर्वाचक मंडल यानी ‘इलेक्टोरल कॉलेज ऑफ़ प्रेसिडेंशियल इलेक्शन’ चुनता है।

देश के 786 सांसद और 4120 विधायक समेत कुल 4896 निर्वाचित जन-प्रतिनिधि राष्ट्रपति चुनाव के मतदाता होते हैं। यही राष्ट्रपति का निर्वाचक मंडल है। इसके हरेक मतदाता का मत-मूल्य एक ख़ास फ़ार्मूले के मुताबिक निर्धारित होता है। हरेक राज्य के विधायक का मत-मूल्य उस राज्य की कुल आबादी के समान-अनुपात में होता है। इसीलिए इसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाला निर्वाचक मंडल भी कहते हैं। इसमें देश भर के निर्वाचित विधायकों का जितना मत-मूल्य होता है, उतना ही सभी निर्वाचित सांसदों का भी होता है। फ़िलहाल, 2011 की मतगणना के मुताबिक, राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल सामूहिक मत-मूल्य 10,98,882 है।

राष्ट्रपति चुनाव के लिए हरेक राज्य के विधायक के मत-मूल्य की गणना उसके सम्बन्धित राज्य की कुल जनसंख्या को वहाँ के निर्वाचित विधायकों की संख्या से विभाजित करके और इसके भागफल को भी 1000 से विभक्त करके किया जाता है। मसलन, यदि राजस्थान की आबादी 6,85,48,437 और उसके विधायकों की संख्या 200 है। तो पहले 6,85,48,437 को 200 से विभाजित करेंगे। फिर भागफल 342742.185 को 1000 से विभक्त करेंगे। इस तरह राजस्थान के विधायक का मत-मूल्य 347 होगा। इस प्रक्रिया में बड़े और अधिक आबादी वाले राज्यों के विधायकों का मत-मूल्य छोटे और कम आबादी वाले राज्यों के विधायकों को मुकाबले काफ़ी अधिक होता है। अभी देश के कुल 4120 निर्वाचित विधायकों का सकल मत-मूल्य 5,49,441 है। इतना ही सामूहिक मत-मूल्य लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 243 निर्वाचित सांसदों का होता है। यानी एक सांसद का मत-मूल्य 699 होगा।

फ़िलहाल, राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में 15 स्थान ख़ाली हैं। इनमें तीन सीटें – जम्मू-कश्मीर की अनन्तनाग और श्रीनगर तथा केरल की मल्लापुरम, लोकसभा की हैं, तो बाक़ी विधानसभाओं की। ख़ाली तो पंजाब में अमृतसर की लोकसभा सीट भी थी। लेकिन वहाँ 4 फरवरी को विधानसभा चुनाव के साथ ही उपचुनाव करवा लिया गया। जिसमें ये सीट काँग्रेस के पास ही बरकरार रही। अब चुनाव आयोग की अगली प्राथमिकता इन सीटों पर उपचुनाव करवाने की होगी। संकेत हैं कि ये उपचुनाव अप्रैल-मई में होंगे। जून में राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी होगी। अबकी बार राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों चुनाव के निर्वाचन अधिकारी लोकसभा के महासचिव होंगे। अदला-बदली के नियम के मुताबिक़, 2012 में राज्यसभा के महासचिव ने ये ज़िम्मेदारी निभायी थी।

अब देश के 10 राज्यों (गुजरात, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, असम, उत्तर प्रदेश और अरूणाचल प्रदेश) में बीजेपी की सरकारें हो जाएँगी। जबकि 5 राज्यों (जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, नगालैंड और सिक्किम) में उसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। 11 मार्च की मोदी लहर के नतीज़े आने के बाद अब ताज़ा स्थिति ये है कि देश के कुल 4120 विधायकों में से एनडीए के विधायकों की संख्या 1531 (37%) से बढ़कर 1777 (43%) हो गयी है। इसमें बीजेपी के विधायकों की संख्या 1101 से बढ़कर 1474 हो गयी है। जबकि एनडीए के सहयोगी दलों के विधायकों की संख्या 430 से घटकर 403 हो गयी है।

उधर, लोकसभा की 543 सीटों में से बीजेपी के 281 सांसदों समेत एनडीए के कुल 339 सदस्य हैं। जबकि राज्यसभा की 243 सीटों में से बीजेपी के 52 सांसदों समेत एनडीए की कुल ताक़त 74 सदस्यों की है। इस तरह देश के कुल 776 सांसदों में से एनडीए के खेमे में 413 सदस्य (53%) ही हैं। इन सांसदों की बदौलत बीजेपी को अपना उपराष्ट्रपति बनाने में तो कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन राष्ट्रपति के चुनाव में उसके पास जहाँ 3 फ़ीसदी सांसदों का बहुमत होगा, वहीं 7 फ़ीसदी विधायकों की कमी से उसे जूझना होगा। ये पहलू बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिहार, बंगाल, उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे बड़े राज्यों में बीजेपी के विधायकों की मौजूदगी बहुत कम है। इसीलिए राष्ट्रपति चुनाव में जहाँ सांसदों का कुल मत-मूल्य बीजेपी के लिए उत्साहवर्धक होगा, वहीं विधायकों का कुल मत-मूल्य उसकी बाज़ी को पटल भी सकता है।

इस बात की अहमियत इसलिए भी बहुत ज़्यादा है कि 30 साल के अन्तराल के बाद जब मई 2014 में बीजेपी को पूर्ण बहुमत वाली अपनी पहली सरकार बनाने का सौभाग्य मिला, तभी से उसके मन में ये ख़्वाब उमड़ने लगा कि काश, राज्यसभा भी उसकी मुट्ठी में होती! इसीलिए दिल्ली में गद्दी-नशीं होने के बाद हुए हरेक चुनाव में बीजेपी समर्थकों ने ये अफ़वाह ख़ूब फैलायी कि उसका जीतना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इससे उसे राज्यसभा में बहुमत मिल जाएगा। जबकि सच्चाई तो ये है कि राज्यसभा की बुनियादी बनावट ही ऐसी है कि यदि 2014 से लेकर अब तक हुए और यहाँ तक कि 2019 तक होने वाले हरेक चुनाव को जीतने के बावजूद नरेन्द्र मोदी सरकार अपने पाँच वर्षों के कार्यकाल के दौरान राज्यसभा में कभी भी बहुमत नहीं पा सकेगी।

दरअसल, संघ-परिवार का अफ़वाह-तंत्र अपने हिन्दुत्ववादी समर्थकों में ये झूठ फैलाता रहता है कि यदि राज्यसभा में भी बीजेपी का बहुमत हो जाए तो वो न सिर्फ़ राम मन्दिर के लिए संविधान में संशोधन कर देगी, बल्कि समान नागरिक संहिता की बाधाएँ भी एक ही छलाँग में पार कर लेगी। यही नहीं, संविधान के उस अनुच्छेद 370 को भी मिटा डाला जाएगा, जो कथित रूप से कश्मीर समस्या की जड़ है। मज़े की बात ये भी है कि इन्हीं विवादित मुद्दों को दरकिनार करके वाजपेयी सरकार के जमाने में एनडीए बनी थी और उसी प्रतिबद्धता को नरेन्द्र मोदी सरकार ने भी क़बूल किया है। हालाँकि, इस लिहाज़ से बीजेपी को हमेशा शक़ की नज़र से ही देखा गया है!