Exit Polls में कभी कोई सांख्यकीय कौशल (Statistical Excellence) रहा होगा, लेकिन बीते डेढ-दो दशक से जितने छँटे हुए भड़ुए इस गणितीय विधा में नीम-हक़ीम ख़तरा-ए-जान की तरह घुसते गये, उससे कभी तो लगता है कि ये किसी Commercial Film में घुसा हुआ Item Number है, तो कभी अहसास होता है कि ये मुज़रेवालियों सरीखे न्यूज़ चैनलों का भजन-गायन समारोह है! इससे भी ज़्यादा दारूण-दुःख ये है कि Exit Poll अब ऐसा संक्रमण बन चुका है जिसने महामारी का रूप लेकर समूचे मीडिया को अपने बाहुपाश में बाँध लिया है!

वर्ना, तर्कशास्त्र का एक सिद्धान्त कहता है यदि बीजेपी के प्रदर्शन की तुलना 2014 के आधार पर करनी है तो ज़रा उसे भी समुचित गणितीय मॉडल से परखकर देखिए! ज़रा उत्तर प्रदेश का सन्दर्भ लें, जिसने नरेन्द्र मोदी और संघ-परिवार को प्रचंड अहंकारी बना दिया!

पहला परिदृश्य:
2014 में बीजेपी गठबन्धन को उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटों अर्थात 91.25 फ़ीसदी सीटों की सफलता मिली। निःसंकोच, बेहद शानदार! प्रदर्शन के उसी स्तर पर क़ायम रहने के लिए 2017 में बीजेपी को 403 में से 368 सीटें जीतनी होंगी। इस लिहाज़ से किसी Exit Poll ने कुछ बताया क्या?

दूसरा परिदृश्य:
2014 में बीजेपी उत्तर प्रदेश की 337 विधानसभा में अव्वल रही। साफ़ है कि यदि तब से अब तक बीजेपी की मिट्टी पलीद नहीं हुई है तो उसे कम से कम इतनी यानी 337 सीटों को तो पाना ही चाहिए। अन्यथा, ये क्यों न माना जाए कि अपूर्व धन-श्रम, बेईमानी-मक्कारी, झूठ और अफ़वाह फैलाने के बावजूद 2014 की तुलना में 2017 में बीजेपी की लुटिया डूब ही रही है। इस लिहाज़ से किसी Exit Poll ने कुछ बताया क्या?

तीसरा परिदृश्य:
2014 में बीजेपी ने दिल्ली की सातों सीटें हथिया लीं। ये सौ में सौ नम्बर लाने वाला प्रदर्शन था। निःसंकोच, बेहद शानदार! इसी स्तर को क़ायम रखने के लिए 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दिल्ली की 70 की 70 सीटें जीतनी चाहिए थी। तब तक तो नरेन्द्र मोदी सरकार भी साल भर की अपने जुमलेबाज़ी वाली पारी खेल चुकी थी। लेकिन इस लिहाज़ से किसी Exit Poll ने कुछ बताया क्या?

चौथा परिदृश्य:
2014 में दिल्ली की 70 सीटों में से 60 पर बीजेपी अव्वल रही। ये 86 फ़ीसदी अंकों वाला प्रदर्शन था। लेकिन 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी 70 में से सिर्फ़ 3 सीट जीत सकी, जो 4 फ़ीसदी की उपलब्धि पर जाकर टिक गयी! हालाँकि, तब तक नरेन्द्र मोदी सरकार भी साल भर की अपने जुमलेबाज़ी वाली पारी खेल चुकी थी। तो कभी किसी चैनल ने ये समझाया क्या कि साल भर पहले 86 फ़ीसदी अंक लाने वाला मेधावी साल भर में ही 4 फ़ीसदी पर क्यों और कैसे आ गया? इस लिहाज़ से किसी Exit Poll ने कभी कुछ बताया क्या?

पाँचवा परिदृश्य:
यहाँ दिल्ली का सन्दर्भ सिर्फ़ इसलिए लिया गया है क्योंकि दिल्ली में बहुत बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी रहते हैं। ये यहाँ के वोटर भी हैं। दिल्ली का तीसरा बड़ा समुदाय पंजाबियों का है। जिसके मूल राज्य पंजाब में 2014 के बाद अभी ही बीजेपी की परीक्षा हुई है। पंजाब में बीजेपी और अकाली की विदाई तय है। बिहार में बीजेपी का क्रियाकर्म हो चुका है। बस, उत्तर प्रदेश की बात तय होनी है। जो क्यों कोई अनहोनी करेगा? क्यों उसी लीक पर नहीं चलेगा जैसे उसके पूर्ववर्ती चले हैं? क्या किसी चैनल या Exit Poll ने कभी इसके बारे में कुछ बताया या समझाया है!

यदि नहीं, तो क्या आप इन तथ्यों से बेख़बर है!