संघ के चिन्तकों-विचारकों को इस बात की दाद तो मिलनी ही चाहिए कि शतरंज के ग्रैंडमास्टर की तरह उनकी चालें बेहद दूरदर्शी होती हैं। दीर्घकालिक रणनीतियाँ बनाने के लिहाज़ से देश में संघियों का सानी शायद ही कोई और हो! उत्तर प्रदेश के नये मुखिया के रूप में आदित्यनाथ योगी के चयन में भले ही देर लगी, लेकिन शुरुआती दिनों में ही इसकी क़तरा-क़तरा वजह का अघोषित खुलासा हो चुका है। बीजेपी के लिए संघ की रणनीति ये बनी कि जिस तरह से 2013 में नरेन्द्र मोदी को भारत में कट्टर हिन्दुत्ववादी वाला नेता बनाकर पेश किया गया, हूबहू उसी तर्ज़ पर योगी की उत्तर प्रदेश में ब्रॉन्डिंग की जाएगी।

इस असर दिखने भी लगा है। पेशेवर मीडिया घरानों, चैनलों और अख़बारों ने योगी के तेवरों को भी बिल्कुल वैसे ही पेश करना शुरू किया है, जैसा वो बीते तीन साल से नरेन्द्र मोदी के लिए करते आ रहे हैं। ‘मोदी-मोदी-मोदी’ की तर्ज़ पर ‘योगी-योगी-योगी’ का जयघोष बिल्कुल वैसे ही सुनायी दे रहा है जैसे विश्व के पालनहार भगवान विष्णु का एक और अवतार लेकर अवतरित हो गया हो! इसके पीछे मौजूद संघ की रणनीति का इरादा बिल्कुल शीशे की तरह साफ़ है। योगी को पहले ही क्षण से श्रेष्ठ प्रशासक, त्यागी-तपस्वी, जन-कल्याणक और कट्टर हिन्दुत्ववादी सियासी गुंडे के रूप में पेश करो। उसे सर्वगुण सम्पन्न बताकर वैसे ही महिमामंडित करो, जैसा तीन साल से नरेन्द्र मोदी को लेकर किया गया है।

यही वजह है कि पहले सोशल मीडिया में तरह-तरह के झूठ फैलाये जाते हैं और फिर औपचारिक मीडिया में उस पर चर्चा और बहस करके योदी का महिमामंडन किया जाता है। वर्ना, क्या ज़रूरत थी ये प्रचार करने की कि योगी, मुसलमानों से नफ़रत नहीं करते हैं! उनकी जैसी कट्टर हिन्दुत्ववादी छवि, मुसलमानों के बीच है उसे बदलने के पीछे क्या इरादा हो सकता है? सिवाय इसके कि वो खुलकर तथाकथित मुसलिम तुष्टिकरण पर हमला कर सकें और कोई उनके धार्मिक पूर्वाग्रह पर अँगुली तक नहीं उठा सके। ज़रा सोचिए कि वो कौन लोग हैं, जो पशुओं के क़त्लख़ानों को बन्द किये जाने पर बल्लियों उछल रहे हैं? वो कौन लोग हैं, जो योगी से जुड़े उस तरह के वीडियो को प्रचारित कर रहे हैं, जो अपशब्द उन्होंने मुसलमानों के सन्दर्भ में बोले हैं?

वो कौन लोग हैं, जो टुंडे के कबाब को लेकर झूठ फैला रहे हैं, जो मसजिद में जय श्रीराम के नारों के लगाये जाने की अफ़वाह फैला रहे हैं? वो कौन लोग हैं, जो यादवों में दहशत फ़ैलाने के लिए झूठ को परोस रहे हैं कि यादव पुलिस अफ़सरों ने अपनी नेम प्लेट को बदलना शुरू कर दिया है? वो कौन लोग हैं, जो बता रहे हैं कि योदी का ख़ानसामा, नौकरी, धोबी, चौकीदार, मैनेज़र, ग्वाला और यहाँ तक कि गुरुभाई भी मुसलमान रहे हैं? वो कौन लोग हैं, जो बताना चाहते हैं कि मोदी की तरह ही योगी को बकवास बर्दाश्त नहीं है, भ्रष्टाचारियों को बख़्शा नहीं जाएगा, गन्दगी की सफ़ाई सरकार में बैठे मंत्री-गण ख़ुद करेंगे, क्यों मोदी जी अपने सांसदों से कहते हैं कि वो किसी अफ़सर के ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए मुख्यमंत्री पर दवाब नहीं डालें?

इन सारे सवालों का बस एक ही जवाब है कि संघ की रणनीति है कि किसी भी तरह से हर वक़्त सुर्ख़ियों में बने रहो। उसे ‘एक तीर से कई निशाने लगाने’ और ‘कहीं पे निग़ाहें, कहीं पे निशाना’ के लिहाज़ से महारत हासिल है। इसीलिए रणनीति है कि प्रचार, सकारात्मक हो या नकारात्मक, उसके केन्द्र में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी औऱ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही होना चाहिए। किसानों का क़र्ज़ा माफ़ होने की वादा ख़िलाफ़ी हो रही हो तो भी अफ़वाहों के माध्यम से ये बात फैलाओ कि योगी मज़बूर है, क्योंकि केन्द्र पैसा दे नहीं सकता और राज्य का ख़ज़ाना 14 साल के बीजेपी के वनवास के दौरान खाली हो चुका है। इस तरह, ‘अच्छे दिन’ का नया संस्करण इसके आगमन के बग़ैर गरमाये रहना चाहिए। जनता को ऊल-जलूल चीज़ों में भटकाये रखो ताकि उसे लगे कि हिन्दुत्व ख़तरे में है। पहले योगी हिन्दुत्व को बचाएँगे, तभी तो चुनावी वादों को पूरा करते हुए ‘विकास’ के नये युग की आधारशिला रखेंगे। संघ की रणनीति है कि हिन्दुत्व से जुड़े भावनाओं को कम से कम 2019 में होने वाले चुनावों तक तो गरमाकर रखा ही है।

अपनी इन्हीं रणनीतियों की बदौलत संघ और बीजेपी ने बीते तीन साल से सत्ता पक्ष के अलावा विपक्ष की जगह को भी घेर रखा है। वो टू इन वन बनकर दोनों छोर से ख़ुद ही बल्लेबाज़ी करना चाहती है। ऐसे माहौल में अचानक उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने शुरुआती ओवर में ही लगातार छह छक्के जड़ने वाले महान बल्लेबाज़ की छवि बना ली है। एक मोर्चे पर केशव ने अपने ही मुख्यमंत्री के स्कोर को पछाड़ दिया है। योगी सरकार के चार मंत्रियों को उपचुनाव का सामना करना है। ख़ुद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और डॉ दिनेश शर्मा तथा वक्फ़ मंत्री मोहसिन रज़ा, इन चारों को अगले छह महीने में उत्तर प्रदेश में विधायक बनना है। लेकिन बाक़ी तीनों को पीछे छोड़ते हुए केशव प्रसाद मौर्य ने अभी से ही अपनी सीट का जुगाड़ बिठा लिया है। इसीलिए इलाहाबाद की फाफामऊ सीट से चुने गये बीजेपी विधायक विक्रमजीत मौर्य ने अपनी विधानसभा सीट को उनके लिए खाली करने की पेशकश कर दी है।

विक्रमजीत मौर्य ने अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा देने की पेशकश वाली चिट्ठी प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य समेत पार्टी के दूसरे नेताओं को भी भेज दी है। विक्रमजीत ही वो इकलौते नेता हैं, जिन्होंने बीजेपी विधायक दल की बैठक से पहले ही सार्वजनिक तौर पर केशव को मुख्यमंत्री बनाने की माँग की थी। उत्तर प्रदेश में पहले भी मंत्री रह चुके विक्रमजीत मौर्य, हालाँकि, कई पार्टियों की ख़ाक़ झानते हुए महज दस महीने पहले ही बीजेपी में भर्ती हुए हैं, लेकिन जल्द ही उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से अपनी नज़दीकी बना ली। अब उनकी हैसियत केशव के बेहद क़रीबियों में है। केशव अभी इलाहाबाद ज़िले की उस फूलपुर सीट से सांसद हैं, जिसमें विक्रमजीत का विधानसभा क्षेत्र भी है।

दरअसल, विक्रमजीत को लगता है कि यदि सब कुछ अनुकूल रहा तो केशव उन्हें अपने बदले लोकसभा भेजने में मददगार साबित हो सकते हैं। ऐसे फार्मूले से केशव और विक्रमजीत दोनों का सियासी रौब बढ़ जाएगा। लिहाज़ा, इसमें हर्ज़ ही क्या है! वैसे ऐसा नहीं है कि योगी, दिनेश और मोहसिन को विधानसभा सदस्य बनने में कोई दिक़्क़त होगी, लेकिन इसमें भी कोई शक़ नहीं कि केशव उन तीनों से आगे निकल गये हैं! उधर, राहुल-अखिलेश खेमे से उठी ये आवाज़ भी बीजेपी के लिए सुखद नहीं हो सकती कि गोरखपुर और फूलपुर की लोकसभा सीट के उपचुनाव में भी दोनों नेता अपनी साझा चुनौती ही पेश करेंगे! यानी, ये मानना सही नहीं होगा कि काँग्रेस औऱ समाजवादी पार्टी के गठजोड़ की मियाद ख़त्म हो चुकी है। हालाँकि, ज़्यादातर उपचुनावों का नतीज़ा तक़रीबन हमेशा ही सत्ताधारी पार्टी के ही पक्ष में जाता रहा है। फिर भी राजनीति को अनन्त सम्भावनाओं वाला खेल यूँ ही नहीं कहा जाता!