यदि आपको सालाना दो करोड़ रोज़गार के अवसर पैदा करने वाला ‘प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी’ का कोई चुनावी वादा याद है तो कृपया उसे जुमला या मज़ाक या सियासी हवाबाज़ी समझकर भूल जाइए! क्योंकि जितना उसे याद करेंगे उतना ही पुराने ज़ख़्मों को कुरेदने जैसी नौबत पैदा होगी। लिहाज़ा, उसे एक बुरा सपना समझकर भूल जाने से कम से कम चित्त को तो शान्ति मिलेगी! इसके बाद रोज़गार सृजन की उपलब्धियों से जुड़ी निम्न रिपोर्ट को ज़रूर पढ़े और ख़ुश हों कि 30 साल के अन्तराल के बाद पूर्ण बहुमत से सत्ता में आयी दुनिया की सबसे सच्चरित्र, सबसे संस्कारित, सबसे सुयोग्य, सबसे कर्मठ, सबसे निष्ठावान, सबसे राष्ट्रवादी और सबसे ईमानदार सरकार ने भारतमाता के स्वर्ण मुकुट में कैसे दुनिया के बेशक़ीमती रत्नों और हीरे-जवाहरातों को जड़वा है। वैसे इस रिपोर्ट को पढ़कर यदि आपका मन इतना पुलकित न हो जाए कि आप अभी से ही 2019 में भी इसी यशस्वी सरकार को पुनः सत्ता में लाने का संकल्प न ले लें तो आपकी बौद्धिक सूझ-बूझ पर लानत है!

अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले साल अप्रैल से सितम्बर की छमाही के दौरान अर्थव्यवस्था के ग़ैर-कृषि क्षेत्र (Non-farm Sectors) में सिर्फ़ एक लाख से अधिक नये रोज़गार के अवसर पैदा हुए। ग़ैर-कृषि क्षेत्र में मैन्यूफ़ैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, आईटी/बीपीओ, शिक्षा और स्वास्थ्य शामिल है। भारतीय अर्थव्यवस्था का ये क्षेत्र दो करोड़ लोगों को रोज़गार देता है। लेकिन सितम्बर में ख़त्म हुई तिमाही तक दो लाख लोगों में महज़ एक लाख रोज़गार के इज़ाफ़े का मतलब है कि शुद्ध बढ़ोत्तरी सिर्फ़ 0.5 फ़ीसदी की ही दर्ज़ हुई है।

ये आँकड़े मोदी सरकार की ही तीसरी त्रैमासिक रोज़गार रिपोर्ट (The third quarterly employment report) के हैं। इन्हें जुटाने के लिए देश के 10 हज़ार से ज़्यादा संस्थानों/प्रतिष्ठानों का सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण के लिए इसे ख़ासा बड़ा नमूना (Sample Size) माना जाता है। रोज़गार-सृजन की उपलब्धियों से जुड़ी इस सरकारी रिपोर्ट के लिए आधार वर्ष, अप्रैल 2016 ही रखा गया है। इस तरह की पहली रिपोर्ट भी पिछले साल ही जारी हुई थी।

रिपोर्ट बताती है कि नये रोज़गार के अवसर विकसित करने के लिहाज़ से देश की वृद्धि-दर बहुत दर्दनाक बनी हुई है। मिसाल के तौर पर दिसम्बर में ख़त्म हुई तीसरी तिमाही तक कुल 1.09 लाख रोज़गार के अवसर पैदा हुए। इनमें से 82 हज़ार नये रोज़गार के अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र में रहे। जबकि ग़ैर-कृषि क्षेत्र की रीढ़ समझे जाने वाले मैन्यूफ़ैक्चरिंग में सिर्फ़ 12 हज़ार नये लोगों को ही रोज़गार दिया जा सका, जो मात्र 0.1% की नगण्य जैसी ही वृद्धि मानी गयी। हालाँकि, मैन्यूफ़ैक्चरिंग वो सेक्टर है जिसमें ग़ैर-कृषि क्षेत्र में कार्यरत कुल आबादी में से क़रीब आधे लोग रोज़गार में हैं। यही वो क्षेत्र है जिसमें ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसी मोदी सरकार की बहुप्रचारित और महत्वाकाँक्षी योजनाएँ और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भी धक्का लगाता है।

मज़े की बात ये है कि मोदी सरकार ने ऐसे मायूसी भरे हालात को देखते हुए ही नोटबन्दी का शिग़ूफ़ा छोड़ा था। ताकि आम जनता को भूल-भुलैया में भटकाकर रखा जा सके। इस लिहाज़ में मोदी सरकार और संघ-बीजेपी ने अपने झंडे गाड़कर दिखा चुकी है। हाल के विधानसभा चुनाव के नतीज़ों को नोटबन्दी की सफलता के रूप में ही पेश किया गया था। बेशक, जनता ने मोदी सरकार के उन झूठे वादों की सच्चाई को नज़रअन्दाज़ कर दिया जो दो करोड़ रोज़गार के अवसरों को विकसित करने के लिहाज़ से किये गये थे। मोदी सरकार की ख़ुशक़िस्मती से जनता पर फ़िलहाल, धार्मिक ध्रुवीकरण और हिन्दुत्व का भूत चढ़ा हुआ है। पाँच राज्यों के चुनाव नतीज़े साफ़ बताते हैं कि अव्वल तो जनता पर ज़मीनी हक़ीक़तों का पता ही नहीं है या फिर उसे मोदी की झाँसेबाज़ी में ही पर्याप्त लुत्फ़ आ रहा है। यहाँ तक कि विपक्षी पार्टियाँ भी इन मोर्चों पर जनता को सच्चाई बता पाने में विफ़ल रही हैं। इसीलिए इन सबसे बड़ी बात ये है कि उसे वादा निभाने की फ़िक्र क्यों हो जिसकी लफ़्फ़ाज़ियाँ ही ग़ुल ख़िलाती हों…!