नरेन्द्र मोदी सरकार के सबसे प्रतिभाशाली और विद्वान मंत्री नितिन गडकरी ने शनिवार को नागपुर में कहा कि देश में क़रीब 30 फ़ीसदी ड्राइविंग लाइसेंस फ़र्ज़ी हैं। मुमकिन है इससे ज़्यादा भी हों। उनका अगला चमत्कारी ख़ुलासा ये था कि भारत में सड़क हादसों में जान गँवाने वाले कम से कम आधे मामलों के लिए सड़क इंज़ीनियरयों की घटिया, ग़लत और भ्रष्ट डिज़ाइन ज़िम्मेदार हैं। भारत में हर साल डेढ़ लाख मौतें सड़क हादसों की वजह से होती हैं। इसलिए गडकरी के दोनों ख़ुलासे सही हैं। वैसे भी उन्होंने ये बातें एक बेहद ज़िम्मेदार, कर्मठ और जवाबदेह राजनेता के रूप में कही हैं। लिहाज़ा, इसमें किसी शक़-शुबहा की गुंज़ाइश हो ही नहीं सकती!

लेकिन मज़े की बात ये है कि फ़र्ज़ी ड्राइविंग लाइसेंस और ग़लत डिज़ाइन वाली सड़कों की महामारी के बारे में इस देश की आम जनता को सब कुछ पता है। क्योंकि जनता का हर वक़्त इन्हीं मुसीबतों से वास्ता पड़ता है। इसीलिए असली मुद्दा तो ये है कि गडकरी को ये चमत्कारिक ज्ञान कब प्राप्त हुआ? अब तक कितने फ़र्ज़ी ड्राइविंग लाइसेंसों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करके उन्हें रद्द किया गया है? इसके लिए ज़िम्मेदार कितने कर्मचारियों और अफ़सरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गयी है? बीते दिन साल में फ़र्ज़ी ड्राइविंग लाइसेंसों के ख़िलाफ़ कितनी बार सर्ज़िकल हमले हुए हैं और उनका क्या नतीज़ा रहा है?

उपरोक्त सवालों का जवाब गडकरी के पास है ही नहीं क्योंकि उनके सड़क और परिवहन मंत्रालय को भी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मालूम है। अब यदि आप इनसे इसकी वजह पूछेंगे तो जवाब मिलेगा, ये विषय राज्यों के क्षेत्राधिकार का है। लिहाज़ा, केन्द्रीय मंत्री से ये सवाल नहीं पूछा जा सकता। बिल्कुल सही। लेकिन गडकरी जी लगे हाथ यही बता दीजिए कि 30 फ़ीसदी फ़र्ज़ी ड्राइविंग लाइसेंसों में से कितने बीजेपी शासित राज्यों में बीजेपी के शासनकाल में जारी हुए हैं? क्या बीजेपी के राज में हुए कुकर्मों के लिए उसे जबाहदेह होना चाहिए या इसके लिए भी बीजेपी से पहले वाली सरकारों पर ठीकरा फोड़ना उचित होगा?

इन प्रश्नों का उत्तर मोदी सरकार की टॉप रेटिंग वाले ये मंत्री महाशय नहीं दे सकते। माँगी गयी ऐसी जानकारी का कोई संकलन उनके पास मिल भी नहीं सकता। क्योंकि उनका मंत्रालय करता ऐसे गतिविधि के लिए न तो कोई अभियान चलाता है और न ही कोई आँकड़ा संकलित किया जाता है। अलबत्ता, पूरी समस्या से उबरने के लिए गडकरी ने एक नया ऐलान ज़रूर किया है कि अब देश में ड्राइविंग लाइसेंस का इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्रेशन ई-गवर्नेंस के तहत किया जाएगा। RTOs को तीन दिन में नया ड्राइविंग लाइसेंस जारी करना होगा, वर्ना कार्रवाई होगी। लेकिन ड्राइविंग टेस्ट के बग़ैर कोई लाइसेंस जारी नहीं होगा। अभी देश में 28 ड्राइविंग टेस्ट केन्द्र हैं। लेकिन जल्द ही दो हज़ार और केन्द्र खोले जाएँगे।

ग़लत डिज़ाइन वाली सड़कों की राष्ट्र-व्यापी महामारी से निपटने के लिए गडकरी जैसे सिद्ध-पुरुष के पास कोई आइडिया नहीं है। सड़क इंज़ीनियरों का भी गडकरी कुछ बिगाड़ नहीं सकते। नोटबन्दी के वक़्त भी इन्होंने कई वादे किये थे। ख़ासकर, राष्ट्रीय राजमार्गों के टोल प्लाज़ा के डिजीटलीकरण की बातों को याद करें, हरेक वाहन में सेंसर के प्रति संवेदनशील स्मार्ट कार्ड लगाने की बातें भी ख़ूब हुई थी। लेकिन वो कारवाँ अब तक कहाँ तक पहुँचा, किसी को मालूम है क्या? माना कुछ काम हुआ भी होगा उस दिन में, लेकिन कितना हो गया, कितना बाक़ी है और पूरा कब तक हो जाएगा? क्या इस बारे में देश को बताया नहीं जाना चाहिए?

नागपुर में ही चलते-चलते नितिन गडकरी ने एक और लुभावना ऐलान कर दिया कि देश में ट्रैफिक सिग्नलों पर कैमरे लगाये जाएँगे। अरे भाई, ऐसे ऐलान तो पिछली सरकारों के ज़माने में भी ख़ूब सुने थे। उनकी अदा थी कि वो सौ दिन में अढाई कोस चलते थे, इसीलिए तीन साल पहले भारतवासियों ने तेज़ी से निर्णय लेने और 70 साल जितना काम दो साल में करके दिखाने वालों की सरकार बनायी थी। इन्हें तो ये बताना चाहिए कि कब तक हमारे देश के कितने ट्रैफिक सिग्नलों पर कैमरे फिट हो जाएँगे? फिर वही मज़े की बात कि इन्हें पता होगा तब न बताएँगे। ये तो जमात ही जुमलेबाज़ों की है, जो देशवासियों को सफलतापूर्वक झाँसे की अफ़ीम चटा रहे हैं!