सुप्रीम कोर्ट के उस ताज़ा आदेश से देश भर की राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय यानी नगर निगम वग़ैरह पशोपेश में हैं कि हाईवे से 500 मीटर की दूरी तक शराब की दुकानों को कैसे पहुँचाया जाए? सैकड़ों और हज़ारों दुकानों पर ताले लटक गये हैं। कहीं-कहीं दुकानों को हाईवे से हटाकर आसपास की रिहायशी बस्तियों में ले जाया जा रहा है। इसे लेकर स्थानीय महिलाएँ बेहद मुखर और उग्र विरोध भी कर रही हैं। हालात को देखते हुए मेरे पास एक आइडिया है जिससे सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है। वो ये कि देश में शराब की ख़रीद-फ़रोख़्त को पूरी तरह से ई-कामर्स कम्पनियों के हवाले कर देना चाहिए…!

Highway liquor ban  क्यों न शराब की सभी दुकानें बन्द हों और सारा धन्धा ई-कामर्स के हवाले हो जाए! Highway liquor ban

ये प्रस्ताव सभी Stake Holders के लिए Win-Win Situation जैसा होगा। इससे मोदी सरकार के सबसे बड़े विज़न Digital India, Digital Payment, New India, Black Money वग़ैरह के लिए वरदान साबित होगा। सरकार को राजस्व का कोई नुकसान नहीं होगा। बड़ी संख्या में Courier Boy का काम करने वालों के लिए रोज़गार के अवसर विकसित होंगे। जब किसी भी तरह की सड़क पर शराब की दुकान नहीं होगी तो व्यापारी समुदाय को भी किसी तरह का तकलीफ़ नहीं होगी।

जिसे शराब पीना होगा, वो उसे अपने घर या पीने वाले ठिकाने पर मँगवाएगा और शान्ति से तथा लिमिट में पीएगा। जो घर पर नहीं पी पाएगा वो अपने गली-मोहल्ले में ही यथा-सम्भव और यथा-स्वभाव लुक-छिपकर पीएगा। कहीं से शराब पीकर कहीं और जाने-आने वालों की संख्या घटेगी। सड़कों पर शराब पीकर चलने वाली संख्या घटेगी। शराब के सेवन की वजह से होने वाले सड़क हादसों में भी कमी आएगी।

शहरों में यदि 20 मिनट में पिज़्ज़ा घर पहुँच सकता है, आधा घंटे में नज़दीक के होटल से होम-सप्लाई पर खाना आ सकता है, तो शराब की सप्लाई के लिए भी तौर-तरीक़े विकसित किये जा सकते हैं। लोगों के पास विकल्प होगा कि वो अपनी मनपसन्द ई-कामर्स कम्पनी से मनपसन्द ब्रॉन्ड की शराब ख़रीद सकें। कैश ऑन डिलीवरी की भी सुविधा रहेगी। यदि सरकार चाहे तो वो ख़ुद भी अपनी ई-कामर्स कम्पनी बना सकती है। कुरियर सर्विस को भी आसानी से आउटसोर्स किया जा सकता है।

शराब के कारोबार से सरकार को होने वाले राजस्व को कोई नुकसान नहीं होगा। राज्यों में शराब का ठेका लेने वाले माफ़िया से मुक्ति पायी जा सकती है। शराब ख़रीदने वालों को भी प्रतिस्पर्धात्मक (Competitive) क़ीमत की सहुलियत मिल सकती है। मनमानी क़ीमत वसूलने वाले हतोत्साहित होंगे। शराब के ठेकों की ओर से पुलिस को नज़राने के रूप में जो मोटी रिश्वत चढ़ाई जाती है, उससे भी ई-कामर्स का सिस्टम मुक्ति दिलवा सकता है। इससे भ्रष्टाचार पर भी नकेल कस पाना मुमकिन होगा। ई-कामर्स कम्पनियाँ ही उन कारोबारियों से तालमेल बिठा सकती हैं, जो शराब के साथ इस्तेमाल होने वाला सामान बेचती हैं। मसलन, सोडा-पानी और तरह-तरह के स्नैक्स वग़ैरह। सरकार चाहे तो शराब की ख़रीद को आधार से जोड़कर ये भी जान सकती है कि कौन-कितनी शराब ख़रीद रहा है और उस पर क्या कोई अतिरिक्त टैक्स लगाने की ज़रूरत है?

कुलमिलाकर, ऐसी कोई वजह नहीं नज़र आती जिससे ये लगे कि शराब के कारोबार को पूरी तरह से ई-कामर्स कम्पनियों के हवाले कर देने की नीति से देश या समाज को कोई भी नुकसान होगा। लिहाज़ा, ये वक़्त की माँग है कि GST के साथ ही मोदी सरकार को ये क्रान्तिकारी तरीक़ा अपना ही लेना चाहिए।

Liquor ban on highways  क्यों न शराब की सभी दुकानें बन्द हों और सारा धन्धा ई-कामर्स के हवाले हो जाए! Liquor ban on highways

यहीं, लगे हाथ ये भी जान लें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से राज्य सरकारों पर फ़ौरन अदालती फ़रमान का तोड़ निकालने का दबाव क्यों बनने लगा? क्यों नैशनल और स्टेट हाईवे के उन इलाक़ों को डिनोटिफाई करने की माँग ज़ोर पकड़ने लगी जहाँ शराब की दुकानें मौजूद हैं? और, क्यों राज्यों और नगर निगमों/पालिकाओं के लिए उनके इलाक़े से गुज़रने वाले हाईवे को डिनोटिफाई करने का इरादा उनके ही गले की फाँस बन चुका है? क्यों केन्द्र और राज्य सरकारें पूरे प्रसंग को लेकर ये तय नहीं कर पा रहीं कि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट से कुछ रियायत माँग ली जाए?

केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के जानकारों के मुताबिक़, केन्द्र सरकार के लिए अदालत से नरमी दिखाने की अर्ज़ी कर पाना बहुत कठिन है। उसे डर है कि इससे उसे कहीं लेने के देने न पड़ जाएँ। क्योंकि कभी सड़क मंत्रालय ने ख़ुद ही प्रतिबन्ध की पैरवी की थी। उसने शराब के नशे में होने वाले सड़क हादसों के लिए इन्हीं दुकानों को अहम वजह बताया था। मंत्रालय ने अक्टूबर 2007 में राज्यों सरकारों को मशविरा दिया था कि वो नैशनल हाईवे के किनारे मौजूद शराब की दुकानों पर हटाने की नीति बनाएँ। इससे पहले, मंत्रालय की राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा परिषद ने जनवरी 2004 में सुझाव दिया था कि नैशनल हाईवे के किनारे शराब की दुकानों के लिए लाइसेंस नहीं दिये जाएँ।

दूसरी ओर, नैशनल हाईवे को डिनोटिफाई करने की अर्ज़ी भी अभी तक किसी राज्य सरकार ने केन्द्र को नहीं भेजी है। क्योंकि इस विकल्प को आज़माने से राज्यों पर भारी वित्तीय बोझ आ जाएगा। क्योंकि नैशनल हाईवे का रखरखाव और मरम्मत का ख़र्च केन्द्र सरकार के ज़िम्मे है। लिहाज़ा, इसके जिस हिस्से को डिनोटिफाई करवाया जाएगा उसका बोझ राज्य या स्थानीय निकाय पर आ जाएगा। ये बोझ उस राजस्व के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा होगा जो शराब की दुकानों से राज्यों को मिलता है। इससे भी बड़ी दिक़्क़त ये है कि देश में तक़रीबन हरेक नैशनल हाईवे पर शराब की दुकानें हैं। सबको डिनोटिफाई करवाना मुमकिन नहीं है। इसके अलावा, ज़्यादातर नैशनल हाईवे को या तो चौड़ा किया जा रहा है या किया जाना है। ऐसे में हाईवे को डिनोटिफाई करते ही उससे जुड़ा सारा बोझ भी राज्यों पर आ जाएगा।