दिल्लीवालों की ख़ून-पसीने की कमाई को क्या अरविन्द केजरीवाल ने अपनी जेब में डाल लिया? है कोई सबूत? फिर हाय-तौबा क्यों? अब वो मुख्यमंत्री ही क्या जो अपने 80 चेलों को 11 लाख रुपये की दावत भी न खिला सके और जो अपने वकील राम जेठमलानी की 3.42 करोड़ रुपये की फ़ीस भी न भर सके! ज़रा सोचिए कि यदि केजरीवाल इतना भी न कर पाते तो दिल्लीवालों की क्या इज़्ज़त रह जाती! उन्हें तो गर्व होना चाहिए कि उन्होंने दो साल पहले ऐतिहासिक बहुमत से जिन आम आदमियों को चुना था, उनकी अय्याशी से तो बड़े-बड़े धन्ना सेठ में शरमा जाएँ! इसे कहते हैं, ‘साल तो दो ही हुए हैं, लेकिन काम ढेरों हुए हैं!’

अब जैसे-जैसे विपक्ष की ओर से उन ‘ढेरों’ का ब्यौरा जनता को मिलता रहेगा, दिल्लीवासियों का सीना गर्व से चौड़ा होता जाएगा! केजरीवाल की अहमियत को यूँ भी समझा जा सकता है कि क्या आप अपनी बहन-बेटी का हाथ किसी कंगाल के हाथ में देना चाहेंगे? नहीं ना…! तो आपका मुख्यमंत्री दरिद्र हो ये आपको कैसे अच्छा लगेगा! इसीलिए इन झाड़ूबाज़ों पर इत्मिनान रखिए, ये आपकी ग़रीबी को झाड़-पोंछकर और चमकाकर उसे शान-ओ-शौक़त में तब्दील करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

भरोसा रखिए, अगले तीन साल भी ये ऐसे ही पराक्रम दिखाते रहेंगे। वो भी तब, जबकि मोदीजी, इन्हें काम नहीं करने देते! सोचिए यदि इन्हें ख़ुलकर ‘काम’ करने को मिलता तो क्या इन्होंने दिल्ली को अब तक स्वर्ग न बना दिया होता! फिर इन्हें ‘दो साल बेमिसाल’ नहीं कहना पड़ता, बल्कि आप ही कहेंगे कि केजरीवाल की महिमा अपरम्पार है! इसीलिए अभी सटीक मौक़ा है, इन झाड़ूबाज़ों को ही दिल्ली के तीनों नगर निगम के सभी वार्डों में ऐसे बहुमत से जिताइए कि सारे विरोधी उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो जाए!

Party bill of AAP

80 लोगों को दी गयी 11 लाख रुपये की दावत का बिल…!

रही बात चुनाव बाद दिल्लीवालों का हाउस टैक्स माफ़ करके दिखाने वाले वादे की, तो उस वादे को निभाने की नौबत ही नहीं आएगी, क्योंकि दिल्ली की असली कमान तो बीजेपी शासित केन्द्र सरकार के पास ही रहेगी और वो झाड़ू के किसी भी प्रस्ताव को क्यों मानेगी? इसीलिए चुनाव बाद केजरीवाल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर हाउस टैक्स को ख़त्म करने का प्रस्ताव पारित करेंगे और फिर प्रस्ताव उपराज्यपाल अनिल बैजल के पास जाकर अटक जाएगी। बैजल फ़ाइल पर दस्तख़त नहीं करेंगे तो मामला सालों-साल के लिए दिल्ली हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जाकर फँसा जाएगा। तब तक अगला चुनाव आकर निकल भी जाएगा।

लिहाज़ा, हाउस टैक्स माफ़ का वादा वैसे ही खोखला साबित होगा। जैसे पानी का बिल माफ़ और बिजली का बिल हाफ़ हो चुका है! अगले चुनाव में केजरीवाल का वादा होगा कि दिल्लीवालों को बिजली-पानी मुफ़्त मिलेगा। हाफ़ तो मिल ही चुका है। अब बाक़ी वाला हाफ़ ही तो बचा है! एक और वादा है कि यदि महीने भर में दिल्ली के सरकारी अस्पतालों ने किसी मरीज़ को ऑपरेशन की डेट नहीं दी तो वो प्राइवेट अस्पताल में इलाज़ करना सकता है। इसका सारा ख़र्च दिल्ली सरकार भरेगी! हालाँकि, इतना तो तय है कि अरविन्द केजरीवाल सरकारी ख़ज़ाने से उन लोगों के प्राइवेट अस्पतालों का बिल नहीं भर सकते जिनका इलाज़ दिल्ली के सरकारी अस्पताल नहीं कर पाते। अलबत्ता, वो सारे प्राइवेट अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण ज़रूर कर सकते हैं! तो उन्हें यही वादा क्यों नहीं करना चाहिए? वैसे भी कौन सा नेता सारे वादे निभा देता है!

जब जनता को उल्लू बनाकर ही वोट लेना है तो व्यावहारिकता का थोड़ा लिहाज़ कर लेने में हर्ज़ ही क्या है! लेकिन झाड़ूबाज़ों को इससे क्या? उन्हें तो बस लम्बी-चौड़ी फेंकने से ही मतलब है। केजरीवाल कह चुके हैं, “हमने MCD वालों को ख़ूब पैसा दिया। सारा पैसा वो खा गये। 15 हज़ार करोड़ रुपये दिल्ली सरकार ने MCD को सफाई के लिए दिया। सारा पैसा खा गये। इस बार आम आदमी पार्टी को लाओ MCD में। वादा है, एक साल में पूरी दिल्ली साफ़ (या सफ़ाचट) कर देंगे।” अब इस मदारी को भला कौन समझाये कि देश में ऐसी कोई सत्ता कभी भी और कहीं भी नहीं रही जो किसी भी योजना का सारा का सारा पैसा खा गयी हो! खाने की भी कुछ न कुछ सीमा है। सारा कोई नहीं खा सकता! लेकिन देश के ‘छोटे मोदी’ अरविन्द केजरीवाल ने तो फेंकने के मामले में ‘असली मोदी’ को भी कहीं का नहीं छोड़ा है!

केजरीवाल ये भी फेंक चुके हैं कि उनके ‘हाउस टैक्स माफ़ कर देंगे’ वाले वादे से सारे विरोधियों को ‘मिर्ची’ लग गयी है। इसीलिए वो हर जनसभा में दोहराते हैं कि “वादा कर रहा हूँ कि एक साल में हाउस टैक्स माफ़ कर दूँगा और MCD को घाटे से निकाल दूँगा। यहाँ तक कि हाउस टैक्स का पुराना बकाया भी माफ़ कर दिया जाएगा।” बहरहाल, यदि आम आदमी पार्टी ने MCD चुनाव जीत लिया तो फिर केजरीवाल का वही राग ‘विधवा-विलाप’ सुनायी देता रहेगा कि ‘मोदीजी हमें दिल्लीवालों का हाउस टैक्स माफ़ ही करने दे रहे!’