लगता है कि देश में अब ‘हिंसात्मक और उन्मादी गौ-रक्षा’ और इसे लेकर होने वाली मारपीट और हत्याओं का सिलसिला थम जाएगा! क्योंकि अब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कह दिया है कि “गौ-रक्षक समूहों को ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए, जो हिंसक हो। इससे ‘शालीन’ गौ-रक्षकों के प्रयासों की भी बदनामी होती है। गौ-रक्षकों को क़ानून और संविधान के दायरे में अपना प्रयास जारी रखना चाहिए लेकिन बग़ैर अहिंसक तरीक़े से, क्योंकि कोई भी क़ानून हमें हिंसा की इजाज़त नहीं देता।” भागवत के इस रूख ने देश की लाज़ रख ली है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी तक तो इतना भर कहने या ट्वीट करने तक के लिए भी अवसर नहीं निकाल पाये! हालाँकि, एक बार उन्होंने गौ-रक्षकों को अपराधी तत्व बताया था और राज्यों से उनका डोज़ियर बनाने को भी कहा था! लेकिन बीजेपी शासित राज्यों में भी मोदी की ख़्वाहिश को कोई तवज़्ज़ो नहीं मिली।

मोदी की ऐसी हिदायत का कभी कोई ज़मीनी असर नहीं दिखा। शायद इसलिए, क्योंकि खाँटी संघियों की नज़र में प्रधानमंत्री की भी कोई हस्ती नहीं होती। अलबत्ता, संघ प्रमुख ही उनके आराध्य होते हैं। इसीलिए, अब संघ प्रमुख की नाराज़गी के बाद मुमकिन है कि गौ-रक्षक समूहों के ‘पराक्रम’ को शान्ति को प्राप्त हो! वैसे मोहन भागवत की चाहत है कि गौ-रक्षकों का काम पूरे देश में बाक़ायदा क़ानून बनाकर राज्य सरकारें ख़ुद करें और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इस अभियान से जोड़ें। उनका मानना है कि गौ-हत्या जैसी बुराई को संविधान के दायरे में रहते हुए राष्ट्रीय क़ानून बनाकर दूर किया जाना चाहिए।

इस तरह मोहन भागवत ने इशारे ही इशारे में ये ज़ाहिर कर दिया कि अपने तीन साल के कार्यकाल के बावजूद मोदी सरकार ने गौ-रक्षा के मोर्चे पर उस तरह का क़ानून बनाने में भी कोताही दिखायी जिसे लेकर देश में शायद ही कोई विरोध हो। महावीर जयन्ती के मौके पर मोहन भागवत ने बहुत दुःखी मन से कहा कि “गौ-हत्या बन्दी सरकार के अधीन है। हमारी इच्छा है कि सम्पूर्ण भारत में गौ-हत्या बन्द हो। इस क़ानून को प्रभावी बनाना सरकार की ज़िम्मेदारी है।” वैसे भागवत ने स्वीकार किया कि भारत की विविधता की वजह से गौ-वंश को लेकर पूरे देश में एकसमान क़ानून को लागू कर पाने में दिक़्क़त आएगी, लेकिन जिन राज्यों में स्वयंसेवको की सरकार है वहाँ तो क़ानून बन ही जाना चाहिए।

लेकिन श्रीमान मोहन भागवत जी, क्या आपको लगता है कि सख़्त कार्रवाई के बग़ैर आपके पराक्रमी स्वयंसेवकों को होश ठिकाने आ सकते हैं? वो दिन कब आएगा, जब संघ परिवार अपने उन सदस्यों पर कार्रवाई करेगा, जो अपनी लक्ष्मण रेखा को तोड़ते रहते हैं? अब ज़रा आप तेलंगाना के अपने (बीजेपी) विधायक टी राजा सिंह के बयान का संज्ञान लें, जिसमें उसने 5 अप्रैल, रामनवमी के दिन हैदराबाद में बोला कि “उत्तर प्रदेश में अब दमदार सरकार आ चुकी है। अब अगले राम नवमी तक राम मन्दिर बन जाएगा। दुनिया की कोई ताक़त इसे रोक नहीं सकती। जो भी इसे रोकने की कोशिश करेगा हम उसका सिर क़लम कर देंगे।” विवादित बयान देना इस विधायक की आदत रही है। पिछले साल इसने कहा था कि गाय की हत्याओं को ज़िन्दा नहीं छोड़ा जाएगा।

उन्मादी बयान देने वाले स्वयंसेवकों में उत्तराखंड के नवनियुक्त शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने भी अपनी जगह बना ली है। 8 अप्रैल को देहरादून में उनकी जीभ ऐसे लपलपायी कि कहने लगे कि “उत्तराखंड में रहना होगा तो वन्दे मातरम् कहना होगा!” क्यों भाई, कौन कह रहा कि उसे ‘वन्दे मातरम्’ कहने से ऐतराज़ है? मंत्री जी, आपको ऐसा फ़तवा जारी करने का अधिकार किसने दिया? क्या देश में संविधान या किसी क़ानून में ऐसा कुछ लिखा है? यदि नहीं, तो पहले वहाँ लिखिए और फिर क़ानून से कहिए कि वो अपना काम करे। ख़ामख़्वाह, ख़ुदाई फौज़दार बनने की ज़रूरत नहीं है। आपको जो काम मिला है, उस पर ध्यान लगाइए। देवभूमि उत्तराखंड में शिक्षा क्षेत्र की अनन्त चुनौतियाँ हैं, वहाँ चमत्कार करके दिखाइए।

बीजेपी के ऐसे टुटपुँजिए नेताओं की जमात में उन्मादी और बहशी नेताओं की पहले ही कौन सी कमी रही है। लेकिन अब एक और उत्तराखंडी और पूर्व राज्यसभा सांसद तरुण विजय ने नस्लवादी बयान देकर सुर्ख़ियाँ बटोरी हैं। ये महाशय अल-जज़ीरा चैनल को समझाते हैं कि “भारत में काले-गोरे का भेद नहीं है। यदि होता तो क्या हम दक्षिण भारतीयों के साथ रहते!” तरुण विजय पैदाइशी स्वयंसेवक हैं। उनका बयान ये बताने के लिए काफ़ी है कि संघ से उन्हें कैसे संस्कार मिले हैं? वैसे तो तरुण ने माफ़ी माँग ली है, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इसकी नौबत ही क्यों आयी? इसी तरह, उत्तर प्रदेश से आये दिन बीजेपी के नेताओं की गुंडागर्दी की ख़बरें आ रही हैं। कोई कहीं, पुलिस को पीट रहा है तो कहीं किसी और तरह की मनमानी हो रही है। लगता है कि वहाँ समाजवादी गुंडों ने सुशासन का भगवा मुखौटा ओढ़ लिया है। भागवत जी, मेहरबानी करके अपने ऐसे बदमिजाज़ चेले को भी ज़रा नयी घुट्टी पिला दीजिए। समझाइए उनको कि वो अब सत्ता भी हैं, जिससे शालीनता की अपेक्षा हमेशा रहती है।