NITI Aayog  ‘मेडिकल आयोग’ को छोड़ नीति आयोग की क़वायद में लफ़्फ़ाज़ी ही छायी रही…! NITI Aayog

ज़रूरी नहीं कि ‘नीति’ में ‘योजना’ हो ही, जबकि ‘योजना’ में ‘नीति’ हमेशा समाहित रहेगी! वैसे, ‘नीति’ का मतलब भी कोई कम भ्रष्ट नहीं! क्योंकि NITI का मतलब है National Institute for Transforming India. अब ज़रा सोचिए कि Institute का मतलब क्या होता है? ऐसा संस्थान जहाँ शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध और चिन्तन वग़ैरह हो सके। जैसे AIIMS, IIT, IIS, IIM आदि। ऐसी हरेक जगह पर शिक्षार्थी भी होते हैं और शिक्षक-प्रशिक्षक भी। लेकिन मोदी सरकार के नीति आयोग में तो सिर्फ़ अफ़सर और चहेते ‘विशेषज्ञ’ हैं। उनका शिक्षाटन से क्या लेना-देना?

बहरहाल, नेहरू के ज़माने से चली आ रही पंचवर्षीय योजनाएँ अपने 13 इपीसोड के बाद इतिहास बन गयीं। पंचवर्षीय योजना से क्या हासिल हुआ और क्या नहीं? ये देश के सामने है। अभी इसके विस्तार में जाने का वक़्त नहीं है। लेकिन मौजूँ सवाल ये है कि नीति आयोग ने बीते तीन साल में देश को क्या दिया? क्या से महज इत्तेफ़ाक़ है कि इस यक्ष-प्रश्न के बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सिवाय और किसी को कुछ भी नहीं पता! नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पनगढ़िया को भी कुछ नहीं मालूम! मालूम होता तो देश को भी तो बताया जाता! सूचना और प्रसारण मंत्रालय का काम ही है सरकार का गुणगान करना। लेकिन वो भी अब तक बता नहीं पाया है कि नीति आयोग की बीते तीन साल में देश के लिए क्या-क्या अमूल्य देन रही! पौने दो साल बाद अबकी राष्ट्रपति भवन में नीति आयोग की तीसरी बैठक हुई। इसे नाम दिया ‘टीम इंडिया!’ प्रधानमंत्री, उनके तमाम मंत्रियों और ढेर सारे मुख्यमंत्रियों ने बैठक में हाज़िर रहने की रस्म अदायगी की। तरह-तरह के पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन्स हुए। चाय नाश्ता हुआ। खाना-पीना हुआ। लेकिन बैठक से निकला क्या?

सरकार की ओर से बताया गया है कि नीति आयोग की तीसरी बैठक में भारत में बदलाव लाने का अगले 15 साल का रोडमैप (Vision Document) पेश हुआ। इसमें 7 साल का रणनीतिक दस्तावेज़ (Strategic Document) तथा तीन साल का एक्शन प्लान (कार्य योजना) शामिल है। इसमें से भी काम की बात सिर्फ़ Action Plan में हो सकती है। बाक़ी सब लफ़्फ़ाज़ी है! क्योंकि कौन नहीं जानता कि अगले तीन से सात वर्षों के दरमियाँ गंगा साफ़ हो चुकी होगी, सबको शौचालय मिल चुके होंगे, घूसख़ोरी का सफ़ाया हो चुका होगा, ग़रीबों को मिलने वाली सारी सब्सिडी सीधे उनके बैंक खातों में पहुँचने लगेगी, किसानों की आमदनी दोगुनी हो चुकी होगी, हर खेत को बीज-खाद-पानी मिलने लगेगा, सबको आवास मिल जाएगा और सबको 24 घंटे बिजली मिलने लगेगी! अलबत्ता, सबको शिक्षा-स्वास्थ्य-रोज़गार मिलने में मामूली सी कसर रह जाएगी, काले धन को विदेश से लाने वाला काम भी थोड़ा सा बचा रह जाएगा, क़ानून-व्यवस्था की मामूली सी चुनौतियाँ बनी रहेंगी, थोड़ा सा हाईवे और बन्दरगाह का काम भी बकाया रह सकता है! ट्रेन में भीड़ भले ही बनी रहे, लेकिन वो इस क़दर वक़्त की पाबन्द होंगी कि आप उनसे अपनी घड़ी मिला सकेंगे!

ऐसा इसलिए भी मुमकिन है क्योंकि नीति आयोग का सारा काम गोपनीय तरीक़े से किया जा रहा है। तीसरी बैठक में आयोग की पिछली दो बैठकों में लिये गये फ़ैसलों पर हुई कार्रवाई की विस्तृत समीक्षा की गयी। नवनिर्मित नीति आयोग की पहली बैठक 8 फरवरी 2015 को और दूसरी बैठक 15 जुलाई 2015 को हुई थी। हरेक बैठक की अध्यक्षता ख़ुद माननीय प्रधानमंत्री जी ने की है। दूसरी और तीसरी बैठक के बीच इतना लम्बा अन्तराल इसलिए हो गया क्योंकि नरेन्द्र मोदी की अन्य व्यस्तताएँ बहुत ज़्यादा रहीं। वैसे नीति आयोग की तीसरी बैठक में एक बात बहुत काम की भी हुई है। नीति आयोग ने सरकार को बताया है कि मेडिकल शिक्षा के नियंत्रण के लिहाज़ से मेडिकल काउन्सिल ऑफ़ इंडिया (MCI) एक नालायक और निकम्मा संगठन है। इसलिए उसे ख़त्म करके उसकी जगह लिए नैशनल मेडिकल कमीशन (NMC) बनाया जाना चाहिए। नीति आयोग ने इसके लिए सरकार को एक मसौदा विधेयक (Draft Bill) भी बनाकर दिया है। अलबत्ता, ये अभी साफ़ नहीं है कि मोदी सरकार प्रस्तावित ‘मेडिकल आयोग’ को कब तक प्रभावी बना देना चाहेगी?

बहरहाल, पहली बैठक में केन्द्र-राज्य सम्बन्ध को बढ़ावा देने और महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की निगरानी का फ़ैसला किया गया था। तब ये तय हुआ था कि नीति आयोग केन्द्र और राज्यों के बीच एक पुल और सरकारी थिंक टैंक की तरह काम करेगा। मज़े की बात ये भी है कि हुबहू यही ज़िम्मेदारी पुराने ‘योजना आयोग’ की भी थी! ख़ैर… नीति आयोग की पहली बैठक में ही मोदी जी ने मुख्यमंत्रियों के तीन समूहों और दो कार्यबलों का भी गठन किया था। पहले कार्यबल का गठन देश की ग़रीबी दूर करने के लिए योजना बनाने और दूसरे की संरचना कृषि-विकास के उपाय सुझाने के लिए की गयी थी। नीति आयोग की दूसरी बैठक में इन्हीं कार्यबलों के काम की प्रगति की समीक्षा की गयी। मज़े की बात ये भी है कि तब से अब तक ग़रीबी मिटाने और कृषि-विकास में इतना ‘सराहनीय’ काम हुआ है कि मोदी सरकार उसे देश के सामने पेश करने से भी झिझक रही है। सरकार को इस बात की परवाह है कि कहीं इसी वजह से विपक्ष उस पर ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने’ का आरोप न लगाने लगे!

बाक़ी सवा सौ करोड़ भारतवासी जानते ही हैं कि देश के किसान बीते तीन साल में जितने ख़ुशहाल हो चुके हैं, उतना तो बीते 70 साल में भी कभी नहीं रहे! कौन नहीं जानता कि किसानों की ख़ुदकुशी के सारे आँकड़े झूठे, मनगढ़न्त, दुर्भावनापूर्ण और राजनीतिक द्वेष की वजह से हैं। देश में ग़रीबी भी अब नाम मात्र को ही दिख रही है क्योंकि धन्ना-सेठों की तरह अब ग़रीब भी डिजिटल पेमेंट कर रहे हैं! इससे बड़ा सबूत किसी को और क्या चाहिए कि मोदी सरकार सिर्फ़ ग़रीबों के लिए काम कर रही है!