बीजेपी की जूठन खाने से पहले कई उम्दा फ़िल्मों में उम्दा अभिनय करके परेश रावल अपनी एक मज़बूत पहचान बना चुके थे। यही कहानी न सिर्फ़ बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा की रही है, बल्कि हर उस नेता भी, जो समाज के दूसरे पेशों से राजनीति में आये। राजनीति में तिर्यक मार्ग यानी Lateral Route से दाख़िल होने वाले कलाकारों की फ़ेहरिश्त ख़ासी लम्बी है। अभिनेता-अभिनेत्री से नेता बनने वाले लोगों ने तक़रीबन सभी राजनीतिक विचारधारा वाली पार्टियों में जगह बनायी। लेकिन फ़िल्मी पृष्ठभूमि से बीजेपी में आने वाले लोगों में अब चरमपन्थियों को प्रधानता मिल रही है। अनुपम खेर के बाद अब परेश रावल भी इसी ‘चरमपन्थी उप-वर्ग’ का हिस्सा बन चुके हैं!

Image result for anupam kher hate tweet  गर्व कीजिए, जश्न मनाइए कि अब आप बाक़ायदा ‘हिन्दू तालिबान’ की छत्रछाया में हैं! anupam kher

Social media is outraged over Anupam Kher’s tweet sharing disturbing picture

रुपहले पर्दे से नेतागिरी में आये परेश रावल को सबसे नौसिखिया चरमपन्थी माना जा सकता है। हालाँकि वो तीन साल से बतौर बीजेपी सांसद सक्रिय राजनीति में हैं। लोकसभा में अहमदाबाद पूर्व संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधि हैं। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे शीर्ष भगवा नेताओं के चहेते हैं। इसी वजह से परेश ने वाजपेयी सरकार में राज्यमंत्री रहे और लाल कृष्ण आडवाणी के वफ़ादार हीरेन पंड्या का टिकट काटकर बीजेपी में धमाकेदार दाख़िला पाया। लेकिन फिलहाल वो अपने उस मूर्खतापूर्ण ट्वीट से सुर्ख़ियों में हैं जो उन्होंने वामपन्थी लेखिका अरुन्धति राय के बारे में लिखा है। परेश ने लिखा कि ‘अरुन्धति को कश्मीर में सेना की जीप में बाँधकर घुमाना चाहिए।’

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Tweets from actor and BJP MP Paresh Rawal’s account against Arundhati Roy

अब सवाल ये है कि परेश किस हैसियत से भारत सरकार को ऐसा मशविरा दे रहे हैं। क्या बीजेपी का सम्मानित सांसद होने के नाते वो पार्टी की ओर सरकार की कश्मीर नीति को बेपर्दा कर रहे हैं! यदि नहीं तो पार्टी ने अभी तक उनके बयान से पल्ला क्यों नहीं झाड़ा? इसकी निन्दा क्यों नहीं की? और यदि हाँ, तो देश की इस सबसे बड़ी समस्या के लिए अरुन्धति को जीप में बाँधकर अवश्य घुमाना चाहिए। कहीं, गृहमंत्री राजनाथ सिंह ऐसे ही नुस्ख़ों से कश्मीर मसले का ‘स्थायी’ हल निकालने की बातें तो नहीं कर रहे! वैसे, बीजेपी में एक और दिग्भ्रमित मंत्री हैं। उनका नाम है डॉ जीतेन्द्र सिंह। वो प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री हैं। जम्मू-कश्मीर से ही पहली बार सांसद बने हैं। 7 मई को रियासी में इन्होंने ऐलान कर दिया कि “कश्मीर मुद्दा सुलझ चुका है। अब इस पर किसी बहस की गुंजाइश नहीं है। सवा अरब भारतीयों के लिए यह मुद्दा अब एक बन्द अध्याय है।”

अब ज़रा कोई बताये कि देश को कौन उल्लू बना रहा है? डॉ जीतेन्द्र सिंह या राजनाथ सिंह या फिर कार्यवाहक रक्षा मंत्री अरुण जेटली, जिन्होंने 17 मई को श्रीनगर में सेना को नसीहत दी थी कि “पाकिस्तान को उसी की ज़ुबान में जवाब दें!” वैसे बीजेपी के ‘परम ज्ञानी’ नेताओं में शीर्ष पर बैठे राजनाथ सिंह ने भी इसी दिन कहा था कि “कश्मीर की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।” और “कश्मीर हमारा है, कश्मीरी और कश्मीरियत भी। इसीलिए इस मुद्दे पर पाकिस्तान नहीं बदला तो हम उसे ही बदल देंगे।” कश्मीर पर ज्ञान देने की गम्भीर बीमारी से बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी कोई कम संक्रमित नहीं हैं। 21 मई को उन्होंने कहा है कि “कश्मीर की वास्तविकता और जो पेश हो रहा है, उसमें काफ़ी अन्तर है।”

इसीलिए, ये सवाल पूछना लाज़िमी हो जाता है कि अमित शाह जी लगे हाथ ये भी बता दीजिए कि कश्मीर को लेकर झूठ और उन्माद फैलाने वाले से आख़िर कौन निपटेगा? आप ये नहीं बता सकते! क्योंकि आपको ये गाना गाते रहना कि कश्मीर समस्या काँग्रेस की नीतियों की देन है। चलिए मान लिया कि आप सही कह रहे हैं। लेकिन अब ये भी तो बताइए कि आपकी, बीजेपी की, नरेन्द्र मोदी और महबूबा मुफ़्ती सरकार की कश्मीर नीति क्या है? आप पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए कब तक उसकी भाषा सीखने की नौटंकी करते रहेंगे! अभी तो कश्मीर में भी आपकी ही सरकार है। फिर हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर ही क्यों होते जा रहे हैं? क्यों बीजेपी का सारे शीर्ष नेताओं पर ‘मोदी-रोग’ का वो भूत सवार है, जिसमें वो भी पाकिस्तान को लव-लेटर नहीं लिखने की बातें किया करते थे, एक के बदले बीस सिर लाने की बातें होती थीं।

अब क्या आप सभी लोगों का पाप धोने के लिए फिर से नितिन गडकरी को आगे आकर ये ख़ुलासा करना पड़ेगा कि कश्मीर को लेकर बीजेपी के किसी भी नेता की ओर से कही गयी हरेक बात सिर्फ़ और सिर्फ़ जुमलेबाज़ी है! ये पहलू बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि डॉ जीतेन्द्र सिंह, बहुत चतुराई से बीजेपी की सहयोगी महबूबा मुफ़्ती को अलगाववादियों की समर्थक भी बता चुके हैं। जीतेन्द्र कहते हैं कश्मीर कोई मसला ही नहीं है, जबकि महबूबा हमेशा कहती रही हैं कि कश्मीर एक पॉलिटिकल मसला है! अब यदि ये मान लें कि कश्मीर मसला सुलझ चुका है। इसमें बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। तो सवाल ये है कि कब सुलझा? किसने सुलझाया? अब 370 का क्या होगा? कश्मीर का अपना संविधान भी रहेगा या नहीं? और यदि कश्मीर कोई मसला नहीं है तो क्या वहाँ के ‘वास्तविक’ हालात, सीधे-सीधे क़ानून-व्यवस्था का मामला है? क्या वहाँ हालात ‘Breakdown of Constitutional Machinery’ वाले नहीं हैं? यदि हैं, तो फिर राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं लगा रहे? आख़िर कब लगाएँगे? लगाएँगे भी, या नहीं लगाएँगे?

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Md Naeem was the last of four people to be beaten to death on Thursday by villagers in Sobhapur, less than an hour’s drive from Jamshedpur, Jharkhand.

लगे हाथ ये भी साफ़ कर दीजिए कि क्या परेश रावल का बयान संविधान-सम्मत है? क्या किसी अफ़वाह की आड़ में झारखंड में उन्मादी भीड़ का सात लोगों को पीटते-पीटते मार डालना संविधान-सम्मत है? क्या गौरक्षा के नाम पर सारे क़ायदे-क़ानून को ताक़ पर रखकर सड़क पर ही इंसाफ़ करने की प्रवृत्ति संविधान-सम्मत है? क्या महाराणा प्रताप की जयन्ती मनाने के नाम पर दबंग ठाकुरों का दलितों के घर जला देना संविधान-सम्मत है? क्या रामपुर में पति के साथ मोटरसाइकिल पर जा रही पत्नी से सरेआम आठ लोगों का सामूहिक बलात्कार करना संविधान-सम्मत है? क्या इतने सारे सवालों का पूछा जाना संविधान-सम्मत है?

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ऐसा नहीं है कि समाज को शर्मसार करने वाली ऐसी घटनाएँ पहले नहीं होती थीं। अवश्य होती थीं। लेकिन ज़रा ग़ौर कीजिए कि मौजूदा माहौल में ‘किस-किस तरह की’ वारदातों में इज़ाफ़ा हुआ है? फिर सोचिए कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों अचानक ऐसे असामाजिक तत्वों के हौसले बुलन्द हो गये हैं? क्यों हमारा संविधान, क़ानून और क़ानून का राज सुनिश्चित करने वाली हमारी संवैधानिक व्यवस्था ऐसे तत्वों के सामने बौनी साबित हो रही हैं? क्यों सत्ता परिवर्तन के बावजूद हमारी संस्थाएँ और पतनशील ही होती जा रही हैं, जबकि हम चुनावों के माध्यम से जो परिवर्तन लाते हैं, उसका असली मक़सद तो ख़राब को ख़त्म करना ही होता है! क्या नयी सत्ता और उसके संरक्षण से पनप रहा माहौल हासिल करना ही हमारा लक्ष्य है? क्या एक किस्म के शोषण का जवाब दूसरी तरह के शोषण और उत्पीड़न से दिया जा सकता है?

याद रखिए, इन्हीं सवालों के जवाब में भारतवर्ष का वजूद बसता है। यदि हम इन प्रश्नों का उत्तर नहीं ढूँढेंगे तो देश को नहीं बचा पाएँगे? अभी जो हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़वाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करना चाहते हैं, उन्हें ही कल को हिन्दुओं को हिन्दुओं से और उत्तर को दक्षिण से पूरब को पश्चिम से लड़वाना पड़ेगा। जब हम आपस में ही अच्छे से लड़ने लगेंगे तो टूट-फूट जाएँगे। भारत के हिन्दुओं ने यदि आँखें खोलकर रखी होतीं तो विदेशी यहाँ आकर कभी अपने पैर नहीं जमा पाते! इसीलिए, हमें वक़्त रहते ‘हिन्दू तालिबानियों’ का चोला पहनकर घूम रहे उन तत्वों को पहचानना होगा जो मदारी की तरह बातें तो जोड़ने की करते हैं, लेकिन उनकी हरक़तें देश को तोड़ने वालों जैसी हैं!

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सारा राष्ट्रवाद, सारा रामराज्य और स्वर्ण-युग का सोने की चिड़िया वाला भारत धरा का धरा रह जाएगा और आप भारत को एकजुट नहीं रख पाएँगे! ज़रा सोचिए कि पाकिस्तान कितनी ग़लत बुनियाद पर बना और चला कि वो महज 24 साल की उम्र में ही टूटने को मज़बूर हो गया! लिहाज़ा, सिर्फ़ बेहतरीन संविधान पाकर इतराने से ही बात नहीं बनेगी, उसकी आत्मा को भी आत्मसात करना होगा और उसे ईमानदारी से अपनाना भी होगा। ऐसा नहीं हो सकता है कि जो आफ़त आज आप पर है, वो कल मुझ पर नहीं आएगी! इतिहास में न ऐसा कभी हुआ है और न ही कभी हो पाएगा!

फिलहाल, बीजेपी में किस तरह की मानसिकता सिर चढ़कर बोल रही है, उस तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी ज़रा ग़ौर करते चलिए। बिहार में सुशील मोदी ने ताल ठोंककर वरिष्ठ सांसद और वाजपेयी सरकार में राज्यमंत्री रहे शत्रुघ्न सिन्हा को ‘ग़द्दार’ बताया है? सिर्फ़ इसलिए कि शत्रुघ्न मुखर हैं, उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं की आलोचना करके ‘लक्ष्मण रेखा’ पार कर दी! तो क्या बीजेपी में किसी से मतभेद रखने वाले वरिष्ठ नेता को अपनी बात कहने का कोई हक़ नहीं? क्या शत्रुघ्न को ‘ग़द्दार’ बताना मामूली बात है? क्या यही वो मर्यादित शब्दावली है जिसका प्रशिक्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर वाले गुरुकुल में दिया जाता है? क्या किसी इज़्ज़तदार राजनेता को ‘ग़द्दार’ कहने से बढ़कर कोई और ग़ाली दी जा सकती है? और हाँ, यदि शत्रुघ्न सिन्हा ग़द्दार है तो फिर उन्हें बीजेपी से क्यों देश से बाहर निकाल देने की माँग क्यों नहीं हुई? क्या ‘शत्रु’ सिर्फ़ बीजेपी के लिए कलंक हैं, देश के लिए नहीं! इसीलिए जैसे सत्ता के अहंकार में डूबे मोदी सरकार के मंत्रियों को पता नहीं है कि कश्मीर पर क्या बोलें? वैसे ही बीजेपी के बाक़ी छोटे-बड़े नेताओं में भी होड़ लगी हुई है कि कैसे न कैसे जल्दी से जल्दी भारत को ‘हिन्दू तालिबानियों’ का देश बना दिया जाए!