नरेन्द्र मोदी सरकार का झूठा गुणगान करने के लिए सुबह से ही देश के तमाम प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ये झूठ परोस रहे हैं कि ‘नोटबन्दी से भारत की अर्थव्यवस्था को 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा हुआ है।’ इस झूठ को फैलाने के लिए सरकार की किसी ‘उच्च स्तरीय आन्तरिक आंकलन रिपोर्ट’ का हवाला दिया गया है। मीडिया घराने ‘इंडिया टुडे’ के सहयोगी अख़बार ‘मेल टुडे’ ने ऐसी भ्रामक रिपोर्ट की कॉपी पाने का दावा किया है।

Image result for rahul kanwal aaj tak  सरासर झूठ है कि ‘नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को हुआ 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा’ jul15 11 rahul

Rahul Kanwal Aaj Tak

लेकिन ‘ख़बर’ लिखने वाले रिपोर्टर और उसे सम्पादित तथा प्रकाशित करने वाले सम्पादक ने ख़बर में इस बात का कोई ब्यौरा नहीं दिया कि आख़िर ये तय कैसे हुआ कि नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा हुआ है? मज़े की बात ये भी है कि भक्ति-भाव में डूबे तमाम मीडिया संस्थानों ने आव देखा न ताव और झूठ को फैलाने की भेड़-चाल में शामिल में गये! दर्जनों वेबसाइट्स ने इस ‘भ्रामक और झूठी ख़बर’ को कॉपी-पेस्ट करके अफ़वाह को फैलाने में अपना योगदान देना शुरू कर दिया!

भ्रामक ख़बर Modi@3: नोटबंदी है मास्टरस्ट्रोक, अर्थव्यवस्था को हुआ 5 लाख करोड़ का फायदा में कहा गया है कि ‘नोटबन्दी के फ़ैसले के वक़्त यानी 8 नवम्बर को अर्थव्यवस्था में क़रीब 17.77 लाख करोड़ रुपये मूल्य के करेंसी नोट प्रचलन में थे, जो मई 2017 आते-आते क़रीब 19.25 लाख करोड़ रुपये पर जा पहुँचे।’ आगे लिखा गया है, ‘अप्रैल के अन्त में भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से जारी आँकड़ों के मुताबिक, कुल 14.2 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नोट प्रचलन में हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि इस वक्त अर्थव्यवस्था में नक़दी की मौजूदगी नोटबन्दी से पहले के मुक़ाबले क़रीब 5 लाख करोड़ रुपये कम है।’

अब ज़रा ये समझने की कोशिश कीजिए कि आख़िर ये 5 लाख करोड़ रुपये हैं क्या? अर्थव्यवस्था को इतनी भारी रक़म का फ़ायदा कैसे हो गया? अरे, सरकार के आँकड़े तो चीख-चीखकर बोल रहे हैं कि नोटबन्दी के बाद अर्थव्यवस्था में मौद्रिक तरलता (Monetary Liquidity) बढ़ी है। ये आँकड़ा 17.77 लाख करोड़ से बढ़कर 19.25 लाख करोड़ हुआ है। यानी, मौद्रिक तरलता में 1.48 लाख करोड़ रुपये का इज़ाफ़ा हुआ है! ये तथ्य बहुत रोचक है क्योंकि अर्थशास्त्र का ये स्थापित सिद्धान्त है कि यदि उसमें मौद्रिक तरलता बढ़ेगी तो उसका सीधा मतलब है कि मुद्रास्फीति या महँगाई बढ़ेगी! दिलचस्प बात भी यही है कि नोटबन्दी के बाद से महँगाई की वृद्धि दर में कमी नहीं बल्कि और तेज़ी आयी है। किसी भी व्यक्ति से पूछिए, वो यही कहेगा कि चीज़ें लगातार महँगी की हो रही हैं और नोटबन्दी के बाद तो ये काफ़ी ज़्यादा हो गयी है!

आगे बढ़ते हैं ‘मूल ख़बर’ की दूसरी भ्रामक बात पर। इसमें रिज़र्व बैंक का वास्ता देकर कहा गया है कि अप्रैल के अन्त में कुल 14.2 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नोट प्रचलन में थे, जो मई में क़रीब 19.25 लाख करोड़ रुपये पर जा पहुँचे। यानी, एक महीने में अर्थव्यवस्था में 5 लाख करोड़ रुपये (25.97%) की मौद्रिक तरलता बढ़ गयी! ध्यान दें, ये कमी नहीं बल्कि इज़ाफ़ा है! इस इज़ाफ़े को अर्थशास्त्र की किसी भी परिभाषा के मुताबिक़ ‘नोटबन्दी के फ़ायदे’ के रूप में नहीं बताया जा सकता है। उल्टा, ये तो सरासर नोटबन्दी से पैदा हुआ नुकसान है!

लगे हाथ ये भी समझ लें कि यदि अभी नोटबन्दी से पहले के मुकाबले अर्थव्यवस्था में नक़दी की मौजूदगी ‘क़रीब 5 लाख करोड़ रुपये कम’ होती तो वास्तव में क़रीब 12.77 लाख करोड़ रुपये मूल्य के करेंसी नोट प्रचलन में होते। जबकि अभी क़रीब 19.25 लाख करोड़ रुपये के प्रचलन में होने की बात बतायी जा रही है। साफ़ है कि अख़बार ‘मेल टुडे’ की ‘मूल ख़बर’ में किया गया सारा दावा और उसमें दिये गये आँकड़े पूरी तरह से भ्रामक हैं। उसका सारा विश्लेषण भ्रष्ट है! शर्मनाक है! भर्त्सना योग्य है!