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Photo: Reuters

नरेन्द्र मोदी सरकार ने जैसी मूर्खता के साथ बूचड़खानों को बेचे जाने वाले गाय, बैल, बछड़े, साँढ, भैंस और ऊँट जैसे मवेशियों की ख़रीद-बिक्री पर रोक लगायी है, उसने फ़िलहाल तो सिर्फ़ इतना ही साबित किया है कि शायद इस सरकार में कोई भी समझदार व्यक्ति मौजूद नहीं है! इस सरकार को ये पता ही नहीं है कि मवेशियों को इस तरह के अव्यावहारिक नियमों से जोड़ने का हश्र क्या-क्या होगा? शायद सरकार के मंत्रियों और पर्यावरण मंत्रालय के आला अफ़सरों को पता ही नहीं है कि नये नियम कैसे लागू होंगे? कितना लागू हो पाएँगे? इससे किसको सहुलियत होगी? किसके लिए ये आफ़त बन जाएगी? क्या इससे वाक़ई, पशुओं के प्रति होने वाली क्रूरता पर नकेल कस पाएगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि नये नियमों की आड़ में भ्रष्टाचार और उगाही का नया नंगा-नाच शुरू हो जाएगा? पशुधन पर निर्भर करोड़ों किसानों और उनके परिवार पर ऐसे क़ानून से क्या गुज़रेगी? ये क़ानून कितने लोगों की रोज़ी-रोज़गार के लिए श्राप बन जाएगा? उनके लिए सरकार क्या कर पाएगी? माँस के कारोबार, चमड़ा उद्योग और इससे जुड़ी अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर होगा?

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Indian Leather Industry

नये नियम बनाने वालों और उसे बग़ैर कुछ सोचे-समझे लागू करने वालों ने मुट्ठी भर गौरक्षकों और संघ परिवार को ख़ुश करने के लिए भले ही ये नियम बना दिये हैं, लेकिन इन नियमों का प्रभाव इतना राष्ट्रव्यापी होगा कि यही मोदी सरकार के ताबूत की आख़िरी क़ील साबित होगा! इस फ़ैसले ने एक बार फिर उस ‘पाग़ल बादशाह’ मोहम्मद बिन तुग़लक की यादें ताज़ा करवा दीं जो रातों-रात राजधानी के दिल्ली से दौलताबाद ले जाने और फिर वापस लाने तथा सोने-चाँदी की कमी होने की वजह से चमड़े का सिक्का चलाकर इतिहास में अमर हो गया! वैसे, आगा-पीछा सोचे बग़ैर फ़ैसले लेने की अभ्यस्त मोदी सरकार ने ऐसी ही अदूरदर्शिता 2014 के अन्त में लाये गये उस भूमि अधिग्रहण अध्यादेश (Land Acquisition Ordinance) के मामले में भी दिखायी थी, जो अगस्त 2015 में अकाल-मृत्यु को प्राप्त हुआ!

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आदि-अनादि काल से भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान ही रही है। आज भी हमारी 70 फ़ीसदी आबादी कृषि और पशुपालन पर ही निर्भर है। पशुपालन, हमारी खेतीहर अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा स्तम्भ है। गाय-भैंस, भेड़-बकरी, सूअर और मुर्गीपालन इसके लिए रोटी-रोज़गार का सबसे बड़ा साधन है। हमारी सकल खेतीहर अर्थव्यवस्था में पशुपालन का योगदान क़रीब 30 फ़ीसदी है। कम ख़र्चे, कम निवेश, कम स्थान और कम मेहनत से आजीविका कमाने के लिहाज़ से पशुपालन का अहम योगदान है। इसीलिए कृषि क्षेत्र में जहाँ हम बमुश्किल एक से दो प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर को हासिल कर पा रहे हैं, वहीं पशुपालन की उत्पादकता 4 से 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।

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2014 में केन्द्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने 2012 में हुई 19वीं पशुगणना के आँकड़े जारी किये थे। तब पता चला था कि 2007 में हुई 18वीं पशुगणना की तुलना में हमारे पशुधन की आबादी 3.33 फ़ीसदी घट गयी है। हालाँकि, गाय-भैंस जैसे दुधारू मादा पशुओं की संख्या् 6.5 फ़ीसदी बढ़कर 12.29 करोड़ थी। इसमें से गायें जहाँ 3 करोड़ थीं, वहीं भैंसों की तादाद 9.3 करोड़ थी। लेकिन पर्यावरण मंत्रालय के नये नियमों का सबसे ख़राब असर गौवंश पर ही पड़ेगा। क्योंकि गायों के बूढ़ी होने पर भी उन्हें क़ानूनी तौर पर बूचड़ख़ानों को नहीं बेचा जा सकेगा। इसलिए किसान उन्हें पालना नहीं चाहेंगे। उनकी ख़रीद-बिक्री तरह-तरह से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगी। पशुपालन से जुड़े करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी पर संकट गहराएगा।

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देश में क़रीब 4 हज़ार रज़िस्टर्ड बूचड़ख़ानों और 25 हज़ार मीट शॉप के ज़रिये 45 लाख टन माँस का उत्पादन होता है। इसमें से क़रीब 20 लाख टन का निर्यात होता है। क़रीब 25 लाख लोग चमड़ा उद्योग से जुड़े हैं। हमारे पशु उत्पादों का सालाना निर्यात साढ़े तीन सौ अरब रुपये से अधिक है। ‘पशु कल्याण की ख़ातिर’ लागू हुए नये नियम या तो इस पूरे क्षेत्र का सत्यानाश कर देंगे या फिर इनकी आड़ में बड़े पैमाने पर ग़ैरक़ानूनी कारोबार होगा! ये मुमकिन ही नहीं कि हमारी सरकारें नये नियमों को ठीक से लागू कर पाएँगी! लिहाज़ा, नियमों की आड़ में पशु-तस्करी के गिरोह और संगठित होंगे, गौरक्षक ही तरह-तरह की उगाही करेंगे तथा आये दिन शर्मशार करने वाली वारदातें सामने आएँगी। यदि ये मान भी लें कि इन्सानों के मामले में बेहद संवेदनहीन रहने वाली हमारी सरकारें पशुओं के अधिकार को लेकर चमत्कारिक काम करने लगेंगी, तो भी ये मुमकिन ही नहीं है कि इन सभी उपायों से उन गायों को बचाया जा सके, जिनका बुढ़ापे से कष्टकारी जीवन शायद ही किसी और प्राणी का हो!

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दरअसल, गाय अपनी जवानी से प्रौढ़ावस्था तक ही दूध देती है। इस दौरान भी उसकी प्रजनन प्रवृति भैंस जैसी नहीं होती। वो भैंस की अपेक्षा कम बार गर्भवती होती है। गाय के एक से दूसरे गर्भधारण के बीच में कई बार महीनों का फ़ासला भी आता है। इस दौरान उसका दूध उत्पादन बन्द हो जाता है। ऐसे समय में गौ-पालकों को ‘गाय-माता’ बोझ लगने लगती है। गाय के मालिक को उसे चारा-पानी देना भारी लगने लगता है। वो या तो उसे बेच देते हैं या फिर उसे सड़कों पर भटकने, कूड़ा-कचरा खाने और अपना पेट ख़ुद भरने के लिए छोड़ देते हैं। गाय का शारीरिक स्वभाव ऐसा है कि उसे अपना भोजन पचाने के लिए घूमना-फिरना ज़रूरी है। अन्यथा वो बीमार पड़ जाती हैं। इसलिए गौ-पालक उसे चाहकर भी खूँटे से बाँधकर नहीं रख पाते। वैसे, गायों का ये भी स्वभाव है कि वो दिन भर इधर-उधर घूमने के बाद साँझ ढले अपने खूँटे पर लौट भी आती हैं! बड़ी गौशालाओं में गायें, अपनी चारदीवारी में ही घूमने की ज़रूरत पूरी कर लेती हैं। लेकिन प्रौढ़ और बूढ़ी गायों के लिए गौशालाओं में भी उम्र काटे नहीं कटती। उन्हें वहाँ बड़ी मुश्किल से चारा-पानी नसीब होता है।

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बहरहाल, मोदी राज में बीजेपी शासित सरकारों की शह पर गायों का ऐसा साम्प्रदायीकरण हो चुका है, जैसा भारतीय इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया। अब केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने जो नये नियम लागू किये गये हैं यदि वो लागू हो जाएँ तो बमुश्किल कुछ ही दशकों में गायें भारतीय जनजीवन से ग़ायब हो जाएँगी। उन्हें कोई भी पालना नहीं चाहेगा। क्योंकि गाय पालना या तो बेहद घाटे का सौदा होगा या जान आफ़त में डालने का पेशा! लिहाज़ा, शरीफ़ आदमी गाय पालने से तौबा करेगा। इस तरह वो दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियों को गायों के बारे में बताने के लिए उन्हें चिड़ियाघर में सहेजकर रखना पड़ेगा। ऐसी हरेक कल्पना भारत की पारिस्थितिकी (Ecology) के लिए महाविनाशक साबित होगी। तब हमारे वंशज मोदी राज को एक और ‘पाग़ल बादशाह’ के रूप में देखेंगे!